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Surah An-Naḥl for kids content
अल्लाह का इल्म और शक्ति
77आकाशों और धरती में जो कुछ अदृश्य है, उसका ज्ञान अल्लाह ही के पास है।
क़यामत की घड़ी का आना तो बस पलक झपकने जितना है, या उससे भी कम।
निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है।
وَلِلَّهِ غَيۡبُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَمَآ أَمۡرُ ٱلسَّاعَةِ إِلَّا كَلَمۡحِ ٱلۡبَصَرِ أَوۡ هُوَ أَقۡرَبُۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِير77
नेमत १७) इंद्रियाँ
78और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के पेट से निकाला, इस हाल में कि तुम कुछ नहीं जानते थे, और तुम्हें कान, आँखें और दिल दिए, ताकि तुम
शुक्रगुज़ार बनो।
وَٱللَّهُ أَخۡرَجَكُم مِّنۢ بُطُونِ أُمَّهَٰتِكُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ شَيۡٔٗا وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَٱلۡأَفِۡٔدَةَ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ78
अल्लाह की शक्ति
79क्या उन्होंने खुले आसमान में परिंदों को तैरते हुए नहीं देखा?
अल्लाह के सिवा उन्हें कोई नहीं थामे रखता।
यक़ीनन इसमें ईमान वालों के लिए निशानियाँ हैं।
أَلَمۡ يَرَوۡاْ إِلَى ٱلطَّيۡرِ مُسَخَّرَٰتٖ فِي جَوِّ ٱلسَّمَآءِ مَا يُمۡسِكُهُنَّ إِلَّا ٱللَّهُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ79
नेमत १८) घर
80और अल्लाह ने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए सुकून की जगह बनाया है, और तुम्हें चौपायों की खालों से तम्बू दिए हैं, जिन्हें तुम अपनी यात्रा के समय
और अपने पड़ाव के समय आसानी से उठा ले जाते हो।
और उनकी ऊन, रोएँ और बालों से उसने तुम्हें घरेलू सामान और एक मुक़र्रर मुद्दत तक के लिए फ़ायदे दिए हैं।
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنۢ بُيُوتِكُمۡ سَكَنٗا وَجَعَلَ لَكُم مِّن جُلُودِ ٱلۡأَنۡعَٰمِ بُيُوتٗا تَسۡتَخِفُّونَهَا يَوۡمَ ظَعۡنِكُمۡ وَيَوۡمَ إِقَامَتِكُمۡ وَمِنۡ أَصۡوَافِهَا وَأَوۡبَارِهَا وَأَشۡعَارِهَآ أَثَٰثٗا وَمَتَٰعًا إِلَىٰ حِين80
नियमत १९) पनाह
81और अल्लाह ने अपनी बनाई हुई चीज़ों से तुम्हारे लिए छाया बनाई है, और पहाड़ों में तुम्हारे लिए ठिकाने बनाए हैं।
और उसने तुम्हें ऐसे कपड़े दिए हैं जो तुम्हें गर्मी 'और सर्दी' से बचाते हैं, और ऐसे कवच जो तुम्हें युद्ध में बचाते हैं।
इसी तरह वह तुम पर अपनी नेमत पूरी करता है, ताकि तुम शायद 'उसके' प्रति समर्पित हो जाओ।
⁹
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّمَّا خَلَقَ ظِلَٰلٗا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلۡجِبَالِ أَكۡنَٰنٗا وَجَعَلَ لَكُمۡ سَرَٰبِيلَ تَقِيكُمُ ٱلۡحَرَّ وَسَرَٰبِيلَ تَقِيكُم بَأۡسَكُمۡۚ كَذَٰلِكَ يُتِمُّ نِعۡمَتَهُۥ عَلَيۡكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تُسۡلِمُونَ81
अल्लाह की नेमतों का इनकार करना
82परन्तु यदि वे शिर्क करने वाले मुँह मोड़ लें, तो हे नबी, आपका कर्तव्य केवल स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देना है।
83वे अल्लाह की नेमतों से अवगत हैं, फिर भी उनका इनकार करते हैं।
और उनमें से अधिकतर तो वास्तव में कृतघ्न हैं।
فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَإِنَّمَا عَلَيۡكَ ٱلۡبَلَٰغُ ٱلۡمُبِينُ82
يَعۡرِفُونَ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُنكِرُونَهَا وَأَكۡثَرُهُمُ ٱلۡكَٰفِرُونَ83
काफ़िरों का अंजाम
84उस दिन की प्रतीक्षा करो जब हम प्रत्येक समुदाय से एक गवाह बुलाएँगे।
तब काफ़िरों को बोलने या अपने रब से क्षमा माँगने की अनुमति नहीं होगी।
85और जब अत्याचारी सज़ा का सामना करेंगे, तो उनके लिए उसे हल्का नहीं किया जाएगा और न ही उसे टाला जाएगा।
86और जब मूर्ति-पूजक अपने झूठे देवताओं को देखेंगे, तो वे कहेंगे, 'हमारे रब!
ये हमारे वे देवता हैं जिन्हें हम तुझसे हटकर पुकारते थे।
' उनके देवता उन्हें जवाब देंगे, 'तुम निश्चित रूप से झूठे हो।
'
87उस दिन वे तुरंत अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण कर देंगे, और उनके गढ़े हुए सभी 'देवता' उन्हें धोखा देंगे।
88जो लोग इनकार करते हैं और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, हम उनकी सज़ा में और सज़ा जोड़ देंगे उस सारे फ़साद के लिए जो
उन्होंने फैलाया।
وَيَوۡمَ نَبۡعَثُ مِن كُلِّ أُمَّةٖ شَهِيدٗا ثُمَّ لَا يُؤۡذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُواْ وَلَا هُمۡ يُسۡتَعۡتَبُونَ84
وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ ٱلۡعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمۡ وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ85
وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ أَشۡرَكُواْ شُرَكَآءَهُمۡ قَالُواْ رَبَّنَا هَٰٓؤُلَآءِ شُرَكَآؤُنَا ٱلَّذِينَ كُنَّا نَدۡعُواْ مِن دُونِكَۖ فَأَلۡقَوۡاْ إِلَيۡهِمُ ٱلۡقَوۡلَ إِنَّكُمۡ لَكَٰذِبُونَ86
وَأَلۡقَوۡاْ إِلَى ٱللَّهِ يَوۡمَئِذٍ ٱلسَّلَمَۖ وَضَلَّ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ87
ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ زِدۡنَٰهُمۡ عَذَابٗا فَوۡقَ ٱلۡعَذَابِ بِمَا كَانُواْ يُفۡسِدُونَ88
पैगंबरों की काफ़िरों के विरुद्ध गवाही
89उस दिन को याद करो जब हम हर उम्मत (समुदाय) के विरुद्ध उन्हीं में से एक गवाह को खड़ा करेंगे।
और हम तुम्हें, ऐ पैगंबर, इन (तुम्हारी) क़ौम के विरुद्ध गवाह के तौर पर बुलाएँगे।
हमने तुम पर यह किताब (कुरान) उतारी है जो हर चीज़ को स्पष्ट करने वाली है - एक मार्गदर्शन, एक रहमत (दया) और शुभ समाचार उन लोगों के
लिए जो पूर्णतः समर्पित हैं।
وَيَوۡمَ نَبۡعَثُ فِي كُلِّ أُمَّةٖ شَهِيدًا عَلَيۡهِم مِّنۡ أَنفُسِهِمۡۖ وَجِئۡنَا بِكَ شَهِيدًا عَلَىٰ هَٰٓؤُلَآءِۚ وَنَزَّلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ تِبۡيَٰنٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُسۡلِمِينَ89

छोटी कहानी
- •
नबी (ﷺ) के सहाबा में से एक, जिनका नाम उस्मान इब्न मज़ऊन था, ने कहा कि उन्होंने पहले इस्लाम सिर्फ इसलिए कबूल किया क्योंकि वे नबी (ﷺ) को
'ना' कहने में बहुत शर्माते थे।
अल्लाह के हुक्म
90निःसंदेह अल्लाह न्याय, एहसान और नाते-रिश्तेदारों को देने का आदेश देता है।
और वह अश्लील कर्मों, बुराई और ज़्यादती से मना करता है।
वह तुम्हें नसीहत देता है ताकि तुम नसीहत पकड़ो।
إِنَّ ٱللَّهَ يَأۡمُرُ بِٱلۡعَدۡلِ وَٱلۡإِحۡسَٰنِ وَإِيتَآيِٕ ذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَيَنۡهَىٰ عَنِ ٱلۡفَحۡشَآءِ وَٱلۡمُنكَرِ وَٱلۡبَغۡيِۚ يَعِظُكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ90
अहद निभाना
91अल्लाह के अहद को पूरा करो जब तुम वचन दो, और अपनी क़समों को पक्का करने के बाद मत तोड़ो, जबकि तुमने अल्लाह को अपना गवाह बनाया है।
निःसंदेह अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो।
92उस औरत की तरह मत बनो जो अपनी बुनी हुई ऊन को, मज़बूत करने के बाद, टुकड़े-टुकड़े कर देती है, अपनी क़समों को बहाना बनाकर एक समूह को
दूसरे बड़े समूह के पक्ष में धोखा देने के लिए।
निःसंदेह अल्लाह तुम्हें इसके द्वारा आज़माता है।
और क़यामत के दिन वह तुम्हारे सभी मतभेदों को तुम्हारे लिए निश्चित रूप से स्पष्ट कर देगा।
وَأَوۡفُواْ بِعَهۡدِ ٱللَّهِ إِذَا عَٰهَدتُّمۡ وَلَا تَنقُضُواْ ٱلۡأَيۡمَٰنَ بَعۡدَ تَوۡكِيدِهَا وَقَدۡ جَعَلۡتُمُ ٱللَّهَ عَلَيۡكُمۡ كَفِيلًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُونَ91
وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّتِي نَقَضَتۡ غَزۡلَهَا مِنۢ بَعۡدِ قُوَّةٍ أَنكَٰثٗا تَتَّخِذُونَ أَيۡمَٰنَكُمۡ دَخَلَۢا بَيۡنَكُمۡ أَن تَكُونَ أُمَّةٌ هِيَ أَرۡبَىٰ مِنۡ أُمَّةٍۚ إِنَّمَا يَبۡلُوكُمُ ٱللَّهُ بِهِۦۚ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ مَا كُنتُمۡ فِيهِ تَخۡتَلِفُونَ92
नेमत २०) स्वतंत्र चुनाव
93अगर अल्लाह चाहता, तो वह तुम्हें आसानी से एक ही समुदाय (विश्वासियों का) बना देता, लेकिन वह जिसे चाहता है भटकने देता है और जिसे चाहता है मार्गदर्शन
देता है।
और तुमसे निश्चित रूप से पूछा जाएगा कि तुमने क्या किया है।
وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَكُمۡ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ وَلَٰكِن يُضِلُّ مَن يَشَآءُ وَيَهۡدِي مَن يَشَآءُۚ وَلَتُسَۡٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ93
समझौतों का सम्मान
94और अपनी क़समों को आपस में फ़रेब करने का ज़रिया न बनाओ, वरना तुम्हारे पैर जमने के बाद फिसल जाएँगे।
फिर तुम अल्लाह के मार्ग से 'दूसरों' को रोकने के बुरे अंजाम चखोगे, और तुम्हें एक भयानक अज़ाब भुगतना पड़ेगा।
95और अल्लाह के अहद को थोड़े से लाभ के बदले न बेचो।
जो अल्लाह के पास है, वह यक़ीनन तुम्हारे लिए कहीं बेहतर है, काश तुम जानते।
96जो कुछ तुम्हारे पास है, वह ख़त्म हो जाएगा, लेकिन जो अल्लाह के पास है, वह बाक़ी रहने वाला है।
और हम सब्र करने वालों को उनके बेहतरीन आमाल के अनुसार अवश्य बदला देंगे।
وَلَا تَتَّخِذُوٓاْ أَيۡمَٰنَكُمۡ دَخَلَۢا بَيۡنَكُمۡ فَتَزِلَّ قَدَمُۢ بَعۡدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُواْ ٱلسُّوٓءَ بِمَا صَدَدتُّمۡ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَكُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ94
وَلَا تَشۡتَرُواْ بِعَهۡدِ ٱللَّهِ ثَمَنٗا قَلِيلًاۚ إِنَّمَا عِندَ ٱللَّهِ هُوَ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ95
مَا عِندَكُمۡ يَنفَدُ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ بَاقٖۗ وَلَنَجۡزِيَنَّ ٱلَّذِينَ صَبَرُوٓاْ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ96

छोटी कहानी
- •
यह एक सच्ची कहानी है जो अल-असमाई नामक एक विद्वान के साथ घटी।
एक दिन, वह बाज़ार में थे और उन्होंने देखा कि एक आदमी फल चुरा रहा था।
जब उन्होंने उस आदमी का पीछा किया, तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह चुराए हुए फल गरीबों को दे रहा था।
अल-असमाई ने उससे पूछा, "तुम्हें क्या लगता है तुम क्या कर रहे हो?
" आदमी ने तर्क दिया, "आप समझते नहीं हैं।
मैं अल्लाह के साथ व्यापार कर रहा हूँ!
मैं फल चुराता हूँ, मुझे एक गुनाह मिलता है।
फिर मैं उन्हें दान के रूप में देता हूँ, मुझे 10 सवाब मिलते हैं।
मैं चोरी के लिए एक सवाब खो देता हूँ, फिर अल्लाह मेरे लिए 9 सवाब रखता है।
अब समझे?
" अल-असमाई ने जवाब दिया, "ऐ मूर्ख!
अल्लाह पाक है और वह केवल पाक चीज़ों को ही स्वीकार करता है।
जब तुम कुछ चुराते हो तो तुम्हें एक गुनाह मिलता है, लेकिन जब तुम उसे दान करते हो तो तुम्हें कोई सवाब नहीं मिलता।
तुम उस व्यक्ति की तरह हो जो अपनी गंदी कमीज़ को मिट्टी से साफ़ करने की कोशिश करता है।
"
- •
आयत 97 में, अल्लाह हमें अच्छे कर्म करने के महत्व की याद दिलाता है।
यदि कोई व्यक्ति अच्छी नीयत से कुछ बुरा करता है (जैसे दान करने के लिए चोरी करना), तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
यही बात तब भी सच है जब कोई व्यक्ति बुरी नीयत से कुछ अच्छा करता है (जैसे दिखावा करने के लिए दान करना)।
किसी भी कर्म को अल्लाह द्वारा स्वीकार किए जाने और पूरी तरह से पुरस्कृत होने के लिए नीयत और कर्म दोनों का अच्छा होना ज़रूरी है।

ईमान वालों का सवाब
97जो कोई नेक अमल करेगा, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, और वह मोमिन भी हो, तो हम उसे अवश्य एक पाकीज़ा ज़िंदगी प्रदान करेंगे, और हम उन्हें
उनके बेहतरीन आमाल के हिसाब से ज़रूर बदला देंगे।
مَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَنُحۡيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةٗ طَيِّبَةٗۖ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ97
मोमिनों को नसीहत
98जब तुम कुरान पढ़ो, तो मरदूद शैतान से अल्लाह की पनाह माँगो।
99उसका निश्चय ही उन पर कोई वश नहीं चलता जो ईमान लाए हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं।
100उसका वश केवल उन पर चलता है जो उसे अपना वली बनाते हैं और उसकी वजह से वे अल्लाह के साथ दूसरों को शरीक ठहराते हैं।
فَإِذَا قَرَأۡتَ ٱلۡقُرۡءَانَ فَٱسۡتَعِذۡ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلشَّيۡطَٰنِ ٱلرَّجِيمِ98
إِنَّهُۥ لَيۡسَ لَهُۥ سُلۡطَٰنٌ عَلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَلَىٰ رَبِّهِمۡ يَتَوَكَّلُونَ99
إِنَّمَا سُلۡطَٰنُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يَتَوَلَّوۡنَهُۥ وَٱلَّذِينَ هُم بِهِۦ مُشۡرِكُونَ100

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
कोई पूछ सकता है, "क़ुरआन के कुछ नियम समय के साथ क्यों बदल गए?
" जैसा कि हमने प्रस्तावना में उल्लेख किया है, क़ुरआन 23 वर्षों की अवधि में अवतरित हुआ।
मक्का में अवतरित हुई सूरतों का ध्यान ईमान वालों के विश्वास को मजबूत करने पर था, जिसमें एक सच्चे ईश्वर पर विश्वास, अल्लाह की सृजन करने और न्याय
के लिए सभी को पुनर्जीवित करने की क्षमता, ईमान वालों को मिलने वाला प्रतिफल, दुष्टों को मिलने वाली सज़ा, और क़यामत के दिन की भयावहता शामिल थी।
एक बार जब विश्वास की नींव मजबूत हो गई और मुसलमान मदीना चले गए, तो उन्हें रमज़ान में रोज़े रखने और हज करने का आदेश दिया गया, और
जब मुस्लिम समुदाय परिवर्तन के लिए तैयार था, तब कुछ नियमों को दूसरों से बदल दिया गया।
मक्का में पहली अवधि को प्राथमिक विद्यालय और मदीना में दूसरी अवधि को विश्वविद्यालय के रूप में सोचें।
- •
उदाहरण के लिए, शराब पीना 3 चरणों में निषिद्ध किया गया था (देखें 2:219, 4:43, और 5:90)।
आयशा (पैगंबर की पत्नी) के अनुसार, यदि इस प्रथा को पहले दिन से ही प्रतिबंधित कर दिया जाता (जब लोग अभी भी विश्वास में शुरुआती कदम उठा रहे
थे), तो कई लोगों के लिए मुसलमान बनना बहुत मुश्किल होता।
{इमाम अल-बुखारी}
- •
'एक नियम को दूसरे से बदलने' की प्रक्रिया को नस्ख़ कहा जाता है, जो पिछली आसमानी किताबों में भी आम थी।
बाइबिल में भी कुछ नियम हैं जो समय के साथ बदल गए।
उदाहरण के लिए, याक़ूब (अ.
स.
) की शरीयत में एक ही समय में दो बहनों से शादी करने की अनुमति थी, लेकिन बाद में मूसा (अ.
स.
) ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।
मूसा (अ.
स.
) की शरीयत में अपनी पत्नी को तलाक़ देना अनुमत था, लेकिन बाद में 'ईसा (अ.
स.
) ने इस पर प्रतिबंध लगा दिए।
बाइबिल में, कुछ प्रकार के मांस पहले अनुमत थे फिर निषिद्ध किए गए और कुछ अन्य पहले निषिद्ध थे फिर अनुमत किए गए।
- •
मूर्तिपूजकों ने हर संभव तरीके से यह साबित करने की कोशिश की कि क़ुरआन अल्लाह द्वारा अवतरित नहीं किया गया था।
आयतों 101-105 के अनुसार, उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि कुछ नियम समय के साथ बदल गए हैं, यह इस बात का प्रमाण था कि क़ुरआन मनगढ़ंत था।
उन्होंने यह भी दावा किया कि क़ुरआन पैगंबर (ﷺ) को एक गैर-अरबी व्यक्ति ने सिखाया था, जो खराब अरबी बोलता था!
पहला तर्क नस्ख़ की हिकमत (बुद्धिमत्ता) को नज़रअंदाज़ करता है।
दूसरा तर्क क़ुरआन की त्रुटिहीन शैली को नज़रअंदाज़ करता है।
हालांकि वे स्वयं अरबी के उस्ताद थे, फिर भी वे क़ुरआन की शैली से मेल खाने वाली एक भी सूरत पेश करने में विफल रहे।
{इमाम इब्न कसीर और इमाम अल-क़ुर्तुबी}

कौन ढोंग कर रहा है?
101जब हम एक आयत को दूसरी से बदलते हैं - और अल्लाह सबसे बेहतर जानता है कि वह क्या प्रकट करता है - तो वे कहते हैं, 'तुम
'मुहम्मद' तो बस यह सब अपनी तरफ से गढ़ रहे हो।
' वास्तव में, उनमें से अधिकांश नहीं जानते।
102कहो, 'पवित्र आत्मा 'जिब्राइल' इसे तुम्हारे रब की ओर से सत्य के साथ नीचे लाया है ताकि ईमान वालों को सहारा मिले, और उन लोगों के लिए मार्गदर्शन
और शुभ समाचार के रूप में जो 'अल्लाह के' अधीन होते हैं।
'
103और हम निश्चित रूप से उनके दावे को जानते हैं: 'उसे तो बस एक आदमी सिखा रहा है।
' लेकिन जिस आदमी का वे जिक्र करते हैं वह एक विदेशी भाषा बोलता है, जबकि यह कुरान शुद्ध अरबी में है।
104निःसंदेह वे लोग जो अल्लाह की आयतों पर विश्वास नहीं करते, उन्हें अल्लाह कभी मार्गदर्शन नहीं देगा, और उन्हें एक दर्दनाक सज़ा मिलेगी।
105कोई भी झूठ नहीं गढ़ता सिवाय उन लोगों के जो अल्लाह की आयतों पर अविश्वास करते हैं।
वे ही सच्चे झूठे हैं।
وَإِذَا بَدَّلۡنَآ ءَايَةٗ مَّكَانَ ءَايَةٖ وَٱللَّهُ أَعۡلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوٓاْ إِنَّمَآ أَنتَ مُفۡتَرِۢۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ101
قُلۡ نَزَّلَهُۥ رُوحُ ٱلۡقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِٱلۡحَقِّ لِيُثَبِّتَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهُدٗى وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُسۡلِمِينَ102
وَلَقَدۡ نَعۡلَمُ أَنَّهُمۡ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُۥ بَشَرٞۗ لِّسَانُ ٱلَّذِي يُلۡحِدُونَ إِلَيۡهِ أَعۡجَمِيّٞ وَهَٰذَا لِسَانٌ عَرَبِيّٞ مُّبِينٌ103
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بَِٔايَٰتِ ٱللَّهِ لَا يَهۡدِيهِمُ ٱللَّهُ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ104
إِنَّمَا يَفۡتَرِي ٱلۡكَذِبَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بَِٔايَٰتِ ٱللَّهِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡكَٰذِبُونَ105

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
आयतें 106-110 अम्मार इब्न यासिर (अ.
स.
) का संदर्भ देती हैं।
उन्होंने और उनके परिवार ने शुरुआती दौर में इस्लाम कबूल किया था।
मूर्ति-पूजकों ने उनके माता-पिता को यातना दी और मार डाला।
उन्होंने अम्मार को भी जान से मारने की धमकी दी, अगर वह उनके बुतों की प्रशंसा और इस्लाम की निंदा नहीं करते।
अपनी जान बचाने के लिए, उन्होंने उनकी बातों से सहमत होने का दिखावा किया।
रिहा होने के बाद, वह आँखों में आँसू लिए पैगंबर (ﷺ) के पास आए।
उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी बातें कहने पर मजबूर किया गया था जो वह कहना नहीं चाहते थे।
तो पैगंबर (ﷺ) ने उनसे पूछा, "लेकिन तुम्हारे दिल का क्या हाल है?
" उन्होंने जवाब दिया, "मेरा दिल ईमान पर अटल है।
" पैगंबर (ﷺ) ने उनसे कहा, "चिंता मत करो।
अगर वे तुम्हें फिर से धमकी दें, तो बस उन्हें वही कह देना जो वे सुनना चाहते हैं।
" {इमाम अल-हाकिम}
ईमान का त्याग
106जो कोई अपने ईमान लाने के बाद अल्लाह का इनकार करता है (सिवाय उनके जिन पर ज़बरदस्ती की गई हो और उनके दिल ईमान पर क़ायम हों), लेकिन
वे जो अपने पूरे दिल से कुफ्र को चुनते हैं, उन पर अल्लाह का ग़ज़ब होगा और उन्हें कठोर अज़ाब मिलेगा।
107यह इसलिए है क्योंकि वे इस दुनियावी ज़िंदगी को परलोक से ज़्यादा पसंद करते हैं।
निःसंदेह, अल्लाह उन लोगों को हिदायत नहीं देता जो कुफ्र को चुनते हैं।
108वे ही हैं जिनके दिलों, कानों और आँखों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है, और वे ही वास्तव में ग़ाफ़िल हैं।
109निःसंदेह, वे ही परलोक में घाटा उठाने वाले होंगे।
110और जहाँ तक उन लोगों का सवाल है जिन्होंने अपने ईमान को छोड़ने पर मजबूर किए जाने के बाद हिजरत की, फिर अल्लाह की राह में जिहाद किया
और सब्र किया, निःसंदेह, तुम्हारा रब इसके बाद भी बहुत माफ़ करने वाला, अत्यंत दयावान है।
مَن كَفَرَ بِٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ إِيمَٰنِهِۦٓ إِلَّا مَنۡ أُكۡرِهَ وَقَلۡبُهُۥ مُطۡمَئِنُّۢ بِٱلۡإِيمَٰنِ وَلَٰكِن مَّن شَرَحَ بِٱلۡكُفۡرِ صَدۡرٗا فَعَلَيۡهِمۡ غَضَبٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيم106
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمُ ٱسۡتَحَبُّواْ ٱلۡحَيَوٰةَ ٱلدُّنۡيَا عَلَى ٱلۡأٓخِرَةِ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ107
أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ وَسَمۡعِهِمۡ وَأَبۡصَٰرِهِمۡۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡغَٰفِلُونَ108
لَا جَرَمَ أَنَّهُمۡ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ109
ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا فُتِنُواْ ثُمَّ جَٰهَدُواْ وَصَبَرُوٓاْ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعۡدِهَا لَغَفُورٞ رَّحِيمٞ110
हिसाब का दिन
111उस दिन का ध्यान रखो जब हर जान अपना बचाव करने के लिए तर्क करती हुई आएगी, और हर एक को उसके कर्मों का पूरा प्रतिफल दिया जाएगा।
किसी के साथ भी अन्याय नहीं किया जाएगा।
۞ يَوۡمَ تَأۡتِي كُلُّ نَفۡسٖ تُجَٰدِلُ عَن نَّفۡسِهَا وَتُوَفَّىٰ كُلُّ نَفۡسٖ مَّا عَمِلَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ111
नाशुक्र लोग
112और अल्लाह एक बस्ती का दृष्टांत देता है जो सुरक्षित और निश्चिंत थी, जिसे हर ओर से भरपूर रिज़्क़ मिलता था।
लेकिन उसके लोग अल्लाह की नेमतों के प्रति कृतघ्न थे, तो अल्लाह ने उन्हें उनकी बदअमालियों के कारण भूख और भय का स्वाद चखाया।
113उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आ चुका था, लेकिन उन्होंने उसे झुठलाया।
तो उन्हें अज़ाब ने आ घेरा जब वे ज़ुल्म कर रहे थे।
وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلٗا قَرۡيَةٗ كَانَتۡ ءَامِنَةٗ مُّطۡمَئِنَّةٗ يَأۡتِيهَا رِزۡقُهَا رَغَدٗا مِّن كُلِّ مَكَانٖ فَكَفَرَتۡ بِأَنۡعُمِ ٱللَّهِ فَأَذَٰقَهَا ٱللَّهُ لِبَاسَ ٱلۡجُوعِ وَٱلۡخَوۡفِ بِمَا كَانُواْ يَصۡنَعُونَ112
وَلَقَدۡ جَآءَهُمۡ رَسُولٞ مِّنۡهُمۡ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَهُمۡ ظَٰلِمُونَ113
हलाल और हराम खाद्य पदार्थ
114तो खाओ उन अच्छी और पाक चीज़ों में से जो अल्लाह ने तुम्हें रिज़्क़ के तौर पर दी हैं, और अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो, अगर
तुम वाक़ई सिर्फ़ उसी की इबादत करते हो।
115उसने तुम्हारे लिए सिर्फ़ मुर्दार, ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जिस पर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, हराम किया है।
लेकिन अगर कोई मजबूर हो जाए - न तो लज़्ज़त के लिए और न ही हद से गुज़रने के लिए - तो यक़ीनन अल्लाह बख़्शने वाला, निहायत मेहरबान
है।
فَكُلُواْ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ حَلَٰلٗا طَيِّبٗا وَٱشۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ إِيَّاهُ تَعۡبُدُونَ114
إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡمَيۡتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحۡمَ ٱلۡخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ لِغَيۡرِ ٱللَّهِ بِهِۦۖ فَمَنِ ٱضۡطُرَّ غَيۡرَ بَاغٖ وَلَا عَادٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ115
बुतपरस्तों को चेतावनी
116अपनी ज़बानों से यह झूठा मत कहो कि 'यह हलाल है और वह हराम है', ताकि तुम अल्लाह पर झूठ गढ़ो।
निःसंदेह, जो लोग अल्लाह पर झूठ गढ़ते हैं, वे कभी सफल नहीं होंगे।
117'यह तो' बस थोड़ा सा आनंद है, फिर उन्हें दर्दनाक अज़ाब भुगतना पड़ेगा।
وَلَا تَقُولُواْ لِمَا تَصِفُ أَلۡسِنَتُكُمُ ٱلۡكَذِبَ هَٰذَا حَلَٰلٞ وَهَٰذَا حَرَامٞ لِّتَفۡتَرُواْ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ لَا يُفۡلِحُونَ116
مَتَٰعٞ قَلِيلٞ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيم117
How to study Surah An-Naḥl with children
Use this children's lesson as a guided path: read the short explanation, look at the Arabic verse, listen to related recitation, and return to the full surah when your child is ready for more detail.
Parents can review one section at a time, ask the child to repeat the main idea, and then continue with the next part or a nearby surah. This keeps the lesson connected with Quran reading, audio, and daily practice.