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الفُرْقَان
الفُرقان
Surah Al-Furqân for kids content

सीखने के बिंदु
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अल्लाह ही एकमात्र सच्चा ईश्वर है जो हमारी इबादत का हकदार है।
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अल्लाह ने हमें इतनी सारी चीज़ों से नवाज़ा है जिनके लिए हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए।
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मूर्ति पूजकों की अल्लाह को ठुकराने, कुरान की उपेक्षा करने और पैगंबर (ﷺ) का मज़ाक उड़ाने के लिए निंदा की जाती है।
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मूर्तियाँ शक्तिहीन और बेकार हैं।
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मक्कावासी बेतुकी चीज़ों की मांग करते रहते हैं और कुरान के बारे में झूठे दावे करते हैं।
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मूर्ति पूजकों को अतीत की दुष्ट जातियों की तरह नष्ट होने की चेतावनी दी जाती है।
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अल्लाह आसानी से सभी को न्याय के लिए फिर से जीवित कर सकता है।
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अल्लाह लोगों को माफ़ करने को तैयार है यदि वे इस दुनिया में तौबा करते हैं।
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क़यामत के दिन, दुष्ट लोग अपने अहंकार पर पछताएंगे, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी।
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यह सूरह अल्लाह के वफ़ादार बंदों के कुछ अद्भुत गुणों के साथ समाप्त होती है।

अल्लाह का इनकार
1बहुत बरकत वाला है वह जिसने अपने बंदे पर फ़ुरक़ान उतारा, ताकि वह सारे संसार के लिए चेतावनी देने वाला बने।
2वह (अल्लाह) ही है जो आकाशों और धरती के राज्य का मालिक है।
उसने न कोई संतान ली है और न ही राज्य में उसका कोई साझीदार है।
और उसने हर चीज़ को पैदा किया है, उसकी उत्तम योजना के अनुसार।
3फिर भी, उन (मूर्तिपूजकों) ने उसके अतिरिक्त ऐसे देवता बना लिए हैं जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते बल्कि स्वयं पैदा किए गए हैं।
वे न तो अपनी रक्षा कर सकते हैं और न ही स्वयं को लाभ पहुँचा सकते हैं।
और उनके पास न तो जीवन देने की शक्ति है, न मृत्यु देने की, और न ही किसी को फिर से जीवित करने की।
تَبَارَكَ ٱلَّذِي نَزَّلَ ٱلۡفُرۡقَانَ عَلَىٰ عَبۡدِهِۦ لِيَكُونَ لِلۡعَٰلَمِينَ نَذِيرًا1
ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَلَمۡ يَتَّخِذۡ وَلَدٗا وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ شَرِيكٞ فِي ٱلۡمُلۡكِ وَخَلَقَ كُلَّ شَيۡءٖ فَقَدَّرَهُۥ تَقۡدِيرٗا2
وَٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةٗ لَّا يَخۡلُقُونَ شَيۡٔٗا وَهُمۡ يُخۡلَقُونَ وَلَا يَمۡلِكُونَ لِأَنفُسِهِمۡ ضَرّٗا وَلَا نَفۡعٗا وَلَا يَمۡلِكُونَ مَوۡتٗا وَلَا حَيَوٰةٗ وَلَا نُشُورٗا3

पृष्ठभूमि की कहानी
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कुछ अरब मूर्तिपूजकों ने दावा किया कि पैगंबर (ﷺ) को कुछ गैर-अरब ईसाइयों द्वारा कुरान सिखाया गया था।
कुरान स्वयं (16:103) इस दावे का जवाब यह तर्क देकर देता है कि एक गैर-अरब के लिए कुरान जैसी त्रुटिहीन अरबी में एक किताब लाना असंभव है, खासकर
जब अरबी भाषा के माहिर भी इसकी अनूठी शैली का मुकाबला करने में विफल रहे।
{इमाम अल-बगवी और इमाम इब्न 'आशूर}
कुरान को झुठलाना
4काफ़िर कहते हैं, "यह क़ुरआन तो बस मनगढ़ंत झूठ है जिसे उसने दूसरों की मदद से गढ़ लिया है।
" उनका यह दावा सरासर ज़ुल्म और झूठ है!
5और वे कहते हैं, 'ये तो बस पहले ज़माने की कहानियाँ हैं जिन्हें उसने लिखवा लिया है, और वे उसे दिन-रात पढ़कर सुनाई जाती हैं।
'
6कहो, "ऐ पैग़म्बर," "यह क़ुरआन" उस (अल्लाह) ने नाज़िल किया है जो आसमानों और ज़मीन के भेदों को जानता है।
वह यक़ीनन बहुत माफ़ करने वाला, रहम करने वाला है।
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّآ إِفۡكٌ ٱفۡتَرَىٰهُ وَأَعَانَهُۥ عَلَيۡهِ قَوۡمٌ ءَاخَرُونَۖ فَقَدۡ جَآءُو ظُلۡمٗا وَزُورٗا4
وَقَالُوٓاْ أَسَٰطِيرُ ٱلۡأَوَّلِينَ ٱكۡتَتَبَهَا فَهِيَ تُمۡلَىٰ عَلَيۡهِ بُكۡرَةٗ وَأَصِيلٗا5
قُلۡ أَنزَلَهُ ٱلَّذِي يَعۡلَمُ ٱلسِّرَّ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّهُۥ كَانَ غَفُورٗا رَّحِيمٗا6
पैगंबर को झुठलाना
7और वे 'उपहासपूर्वक' कहते हैं, "यह कैसा रसूल है जो खाना खाता है और बाज़ारों में फिरता है?
उसके साथ कोई फ़रिश्ता होना चाहिए था जो चेतावनी देता,
8या उसे ऊपर से कोई ख़ज़ाना मिलता, या कम से कम उसके पास कोई बाग़ होता जिसमें से वह खाता!
' और वे जो ज़ुल्म करते हैं, 'ईमानवालों से' कहते हैं, 'तुम तो बस एक ऐसे आदमी का अनुसरण कर रहे हो जिस पर जादू कर दिया गया
है।
'
9देखो, वे तुम्हें 'ऐ पैग़म्बर' क्या-क्या नाम देते हैं!
वे इतनी दूर भटक गए हैं कि वे 'सही' रास्ता नहीं पा सकते।
10वह बड़ा बरकतवाला है जो तुम्हें इन सब से कहीं बेहतर चीज़ें दे सकता है यदि वह चाहे: ऐसे बाग़ जिनके नीचे नदियाँ बहती हैं, और महल भी।
وَقَالُواْ مَالِ هَٰذَا ٱلرَّسُولِ يَأۡكُلُ ٱلطَّعَامَ وَيَمۡشِي فِي ٱلۡأَسۡوَاقِ لَوۡلَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مَلَكٞ فَيَكُونَ مَعَهُۥ نَذِيرًا7
أَوۡ يُلۡقَىٰٓ إِلَيۡهِ كَنزٌ أَوۡ تَكُونُ لَهُۥ جَنَّةٞ يَأۡكُلُ مِنۡهَاۚ وَقَالَ ٱلظَّٰلِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلٗا مَّسۡحُورًا8
ٱنظُرۡ كَيۡفَ ضَرَبُواْ لَكَ ٱلۡأَمۡثَٰلَ فَضَلُّواْ فَلَا يَسۡتَطِيعُونَ سَبِيلٗا9
أَوۡ يُلۡقَىٰٓ إِلَيۡهِ كَنزٌ أَوۡ تَبَارَكَ ٱلَّذِيٓ إِن شَآءَ جَعَلَ لَكَ خَيۡرٗا مِّن ذَٰلِكَ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ وَيَجۡعَل لَّكَ قُصُورَۢا10
गुनाहगारों का अज़ाब
11वास्तव में, वे क़यामत की घड़ी को झुठलाते हैं।
और क़यामत की घड़ी को झुठलाने वालों के लिए हमने एक भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है।
12जब वह उन्हें दूर से देखेगी, तो वे उसकी दहाड़ और गरज सुनेंगे।
13और जब उन्हें उसके अंदर किसी तंग जगह में जंजीरों में जकड़कर फेंका जाएगा, तो वे तुरंत मौत की दुआ करेंगे।
14उनसे कहा जाएगा, "आज एक बार मौत की दुआ मत करो, बल्कि बार-बार मौत की दुआ करो!
"
بَلۡ كَذَّبُواْ بِٱلسَّاعَةِۖ وَأَعۡتَدۡنَا لِمَن كَذَّبَ بِٱلسَّاعَةِ سَعِيرًا11
إِذَا رَأَتۡهُم مِّن مَّكَانِۢ بَعِيدٖ سَمِعُواْ لَهَا تَغَيُّظٗا وَزَفِيرٗا12
وَإِذَآ أُلۡقُواْ مِنۡهَا مَكَانٗا ضَيِّقٗا مُّقَرَّنِينَ دَعَوۡاْ هُنَالِكَ ثُبُورٗا13
لَّا تَدۡعُواْ ٱلۡيَوۡمَ ثُبُورٗا وَٰحِدٗا وَٱدۡعُواْ ثُبُورٗا كَثِيرٗا14
मोमिनों का इनाम
15कहो, ऐ पैगंबर, 'क्या यह भयानक अंजाम बेहतर है या हमेशा की जन्नत जिसका वादा ईमानवालों से एक इनाम और अंतिम ठिकाने के तौर पर किया गया है?
'
16वहाँ उन्हें हमेशा के लिए वह सब कुछ मिलेगा जो वे चाहेंगे।
यह तुम्हारे रब की तरफ से एक सच्चा वादा है, जिसके लिए दुआ करनी चाहिए।
قُلۡ أَذَٰلِكَ خَيۡرٌ أَمۡ جَنَّةُ ٱلۡخُلۡدِ ٱلَّتِي وُعِدَ ٱلۡمُتَّقُونَۚ كَانَتۡ لَهُمۡ جَزَآءٗ وَمَصِيرٗا15
لَّهُمۡ فِيهَا مَا يَشَآءُونَ خَٰلِدِينَۚ كَانَ عَلَىٰ رَبِّكَ وَعۡدٗا مَّسُۡٔولٗا16
दुष्टों को नीचा दिखाया गया।
17और उस दिन को याद करो जब वह उन (मूर्तिपूजकों) को इकट्ठा करेगा और उनके साथ जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे, फिर उन (पूजी जाने वाली
चीज़ों) से पूछेगा: "क्या तुमने मेरे इन बंदों को गुमराह किया था, या वे खुद ही रास्ता भटक गए थे?
"
18वे कहेंगे, "तू पाक है!
यह हमें शोभा नहीं देता था कि हम तेरे सिवा किसी और को अपना रब बनाते।
बल्कि तूने उन्हें और उनके बाप-दादाओं को इतनी लंबी मुहलत दी कि वे तुझे भूल गए और अब वे विनाश के पात्र बन गए हैं।
"
19उन विनाश के पात्रों से कहा जाएगा, "तुम्हारे पूज्य (देवताओं) ने तुम्हारे दावों को स्पष्ट रूप से झुठला दिया है।
तो अब तुम न तो अज़ाब से बच सकते हो और न कोई मदद पा सकते हो।
" और तुम में से जो कोई भी ज़ुल्म करता रहेगा, हम उसे एक भारी अज़ाब चखाएँगे।
"
وَيَوۡمَ يَحۡشُرُهُمۡ وَمَا يَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَقُولُ ءَأَنتُمۡ أَضۡلَلۡتُمۡ عِبَادِي هَٰٓؤُلَآءِ أَمۡ هُمۡ ضَلُّواْ ٱلسَّبِيلَ17
قَالُواْ سُبۡحَٰنَكَ مَا كَانَ يَنۢبَغِي لَنَآ أَن نَّتَّخِذَ مِن دُونِكَ مِنۡ أَوۡلِيَآءَ وَلَٰكِن مَّتَّعۡتَهُمۡ وَءَابَآءَهُمۡ حَتَّىٰ نَسُواْ ٱلذِّكۡرَ وَكَانُواْ قَوۡمَۢا بُورٗا18
فَقَدۡ كَذَّبُوكُم بِمَا تَقُولُونَ فَمَا تَسۡتَطِيعُونَ صَرۡفٗا وَلَا نَصۡرٗاۚ وَمَن يَظۡلِم مِّنكُمۡ نُذِقۡهُ عَذَابٗا كَبِيرٗا19
पैगंबर मानव हैं
20हमने आपसे पहले कोई ऐसा रसूल नहीं भेजा जो खाना न खाता हो और बाज़ारों में न फिरता हो।
और हमने तुममें से कुछ को दूसरों के लिए आज़माइश बनाया है।
क्या तुम सब्र करोगे?
और तुम्हारा रब सब कुछ देखने वाला है।
وَمَآ أَرۡسَلۡنَا قَبۡلَكَ مِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ إِلَّآ إِنَّهُمۡ لَيَأۡكُلُونَ ٱلطَّعَامَ وَيَمۡشُونَ فِي ٱلۡأَسۡوَاقِۗ وَجَعَلۡنَا بَعۡضَكُمۡ لِبَعۡضٖ فِتۡنَةً أَتَصۡبِرُونَۗ وَكَانَ رَبُّكَ بَصِيرٗا20
क्या आप फरिश्तों से मिलने को बेताब हैं?
21जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, वे घमंड से कहते हैं, "हमारे पास फ़रिश्ते क्यों नहीं उतारे जाते?
" या "हम अपने रब को क्यों नहीं देखते?
" वे निश्चित रूप से अपने अहंकार में बह गए हैं, और बुराई में पूरी तरह हद पार कर गए हैं।
22लेकिन जिस दिन वे अंततः फ़रिश्तों को देखेंगे, दुष्टों के लिए कोई खुशखबरी नहीं होगी, जो चिल्लाएँगे, 'हट जाओ!
हमसे दूर!
'
23फिर हम उनके उन 'अच्छे' कर्मों की ओर बढ़ेंगे जो उन्होंने किए थे, उन्हें बिखरी हुई धूल में बदल देंगे, जिसे उड़ा दिया गया हो।
24लेकिन उस दिन, जन्नत के लोगों को सबसे बेहतरीन घर और आराम करने के लिए सबसे अच्छी जगह मिलेगी।
۞ وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا لَوۡلَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ أَوۡ نَرَىٰ رَبَّنَاۗ لَقَدِ ٱسۡتَكۡبَرُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ وَعَتَوۡ عُتُوّٗا كَبِيرٗا21
يَوۡمَ يَرَوۡنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةَ لَا بُشۡرَىٰ يَوۡمَئِذٖ لِّلۡمُجۡرِمِينَ وَيَقُولُونَ حِجۡرٗا مَّحۡجُورٗا22
وَقَدِمۡنَآ إِلَىٰ مَا عَمِلُواْ مِنۡ عَمَلٖ فَجَعَلۡنَٰهُ هَبَآءٗ مَّنثُورًا23
أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَنَّةِ يَوۡمَئِذٍ خَيۡرٞ مُّسۡتَقَرّٗا وَأَحۡسَنُ مَقِيلٗا24

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
एक दिन, 'उक़बाह इब्न अबी मु'ऐत नामक एक मूर्तिपूजक ने मक्का के नेताओं को रात के खाने पर आमंत्रित किया।
पैगंबर (ﷺ) को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने 'उक़बाह से कहा कि वह तब तक खाना नहीं खाएंगे जब तक वह इस्लाम स्वीकार नहीं कर लेता।
अपने मेहमान का सम्मान करने के लिए, 'उक़बाह मान गया।
हालांकि, 'उक़बाह का एक दुष्ट मित्र था, जिसका नाम उबै इब्न ख़लफ़ था, जो रात के खाने में शामिल नहीं हो पाया था।
जब उबै ने सुना कि उसका मित्र मुसलमान बन गया है, तो वह बहुत क्रोधित हुआ।
- •
वह 'उक़बाह के पास गया और उस पर इस्लाम छोड़ने का दबाव डाला।
इतना ही नहीं, उसने उसे पैगंबर (ﷺ) का अपमान करने और उन पर थूकने के लिए भी मना लिया।
आयतें 27-29 'उक़बाह को उसके उस काम के लिए एक भयानक सज़ा की चेतावनी देने के लिए अवतरित हुईं जो उसने केवल अपने मित्र को खुश करने के
लिए किया था।
{इमाम अत-तबरी और इमाम अल-क़ुर्तुबी}

छोटी कहानी
- •
अ-अ'शा एक प्रसिद्ध कवि था जो मूर्तियों की पूजा करता था और ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीता था।
जब उसने अपनी वृद्धावस्था में इस्लाम के बारे में सुना, तो उसने पैगंबर (ﷺ) से मिलने और इस्लाम स्वीकार करने के लिए यात्रा करने का फैसला किया।
रास्ते में, उसकी मुलाकात कुछ पुराने दोस्तों से हुई।
जब उन्होंने सुना कि वह एक कविता के साथ पैगंबर (ﷺ) की प्रशंसा करने और मुसलमान बनने आया था, तो उन्होंने उसे अपना मन बदलने के लिए मनाने
की कोशिश की।
उसे डराने के लिए, उन्होंने कहा कि इस्लाम शादी के बाहर के प्रेम संबंधों पर प्रतिबंध लगाता है।
उसने उनसे कहा कि वह वैसे भी इसके लिए बहुत बूढ़ा था।
- •
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
वे जानते थे कि उसे शराब कितनी पसंद थी, इसलिए उन्होंने उससे कहा कि इस्लाम शराब पर भी प्रतिबंध लगाता है।
अब वह थोड़ा झिझकने लगा।
आखिरकार, उसने कहा कि वह घर वापस जाएगा, एक साल तक शराब का आनंद लेगा और फिर तय करेगा कि क्या करना है।
दुख की बात है कि घर के रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई और उसने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया।
{इमाम इब्न हिशाम अपनी सीरत में}


ज्ञान की बातें
- •
जैसा कि हमने सूरह 53 में उल्लेख किया है, हमें अल्लाह को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि हर किसी को प्रसन्न करना लगभग असंभव है, विशेषकर
उन्हें जो हमसे बुरे कार्य करवाना चाहते हैं।
आप कितने भी भले क्यों न हों, आप जो कुछ भी करते हैं, उससे हर कोई प्रसन्न नहीं होगा।
निम्नलिखित एक प्रसिद्ध अरबी कविता है जो इस विषय को समझाती है, मेरे विनम्र अंग्रेजी अनुवाद सहित।
- •
मैंने सभी को प्रसन्न किया है, ईर्ष्यालु व्यक्ति को छोड़कर, जिसे मेरी मृत्यु के सिवा कुछ भी प्रसन्न नहीं कर सकता।
तो मैं ऐसे व्यक्ति को कैसे प्रसन्न कर सकता हूँ, जिसे मेरी मृत्यु के अतिरिक्त कुछ भी प्रसन्न नहीं करता?
मैं अब से उस मूर्ख व्यक्ति की उपेक्षा करूँगा और उसे मुझ पर क्रोधित होने देकर प्रसन्न रहूँगा।
क़यामत के दिन का बेकार अफ़सोस
25उस दिन को याद करो जब आसमान बादलों के साथ फट पड़ेगा, और फ़रिश्ते हर तरफ़ उतारे जाएँगे।
26उस दिन वास्तविक सत्ता केवल रहमान की होगी।
वह दिन इनकार करने वालों के लिए बहुत कठिन होगा।
27और उस दिन को याद करो जब ज़ालिम व्यक्ति पछतावे से अपने हाथ काटेगा और कहेगा, "हाय अफ़सोस!
काश मैंने रसूल के साथ रास्ता अपनाया होता!
"
28हाय मेरी बर्बादी!
काश मैंने फ़लाँ व्यक्ति को अपना घनिष्ठ मित्र न बनाया होता;
29उसने मुझे ज़िक्र से भटका दिया, जबकि वह मुझ तक पहुँच चुकी थी।
और शैतान तो इंसान को हमेशा धोखा देने वाला है।
وَيَوۡمَ تَشَقَّقُ ٱلسَّمَآءُ بِٱلۡغَمَٰمِ وَنُزِّلَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ تَنزِيلًا25
ٱلۡمُلۡكُ يَوۡمَئِذٍ ٱلۡحَقُّ لِلرَّحۡمَٰنِۚ وَكَانَ يَوۡمًا عَلَى ٱلۡكَٰفِرِينَ عَسِيرٗا26
وَيَوۡمَ يَعَضُّ ٱلظَّالِمُ عَلَىٰ يَدَيۡهِ يَقُولُ يَٰلَيۡتَنِي ٱتَّخَذۡتُ مَعَ ٱلرَّسُولِ سَبِيل27
يَٰوَيۡلَتَىٰ لَيۡتَنِي لَمۡ أَتَّخِذۡ فُلَانًا خَلِيلٗا28
لَّقَدۡ أَضَلَّنِي عَنِ ٱلذِّكۡرِ بَعۡدَ إِذۡ جَآءَنِيۗ وَكَانَ ٱلشَّيۡطَٰنُ لِلۡإِنسَٰنِ خَذُولٗا29

ज्ञान की बातें
- •
आयत 30 उन लोगों की आलोचना करती है जो कुरान की उपेक्षा करते हैं।
इमाम इब्न अल-क़य्यिम के अनुसार, लोग कुरान की उपेक्षा इसे न पढ़कर, इसे न सुनकर, इसे न समझकर, इसके अर्थों पर गहराई से विचार न करके, इसकी शिक्षाओं
के अनुसार जीवन न जीकर, इसके अहकाम (नियमों) को स्वीकार न करके, और इसे शिफ़ा (उपचार) का स्रोत न मानकर करते हैं।

मक्कावासी क़ुरआन की उपेक्षा करते हैं
30रसूल ने शिकायत की है, "हे मेरे रब!
मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को छोड़ रखा है।
"
31इसी तरह हमने हर नबी के लिए कुछ अपराधियों को दुश्मन बनाया।
लेकिन आपका रब ही मार्गदर्शक और सहायक के लिए काफ़ी है।
32काफ़िर कहते हैं, "यह क़ुरआन उस पर एक साथ क्यों नहीं उतारा गया?
" हमने इसे इसी तरह नाज़िल किया है ताकि हम इससे आपके दिल को मज़बूत करें।
और हमने इसे धीरे-धीरे, ठहर-ठहर कर नाज़िल किया है।
33जब भी वे कोई आपत्ति उठाते हैं, हम आपको सही उत्तर और सबसे अच्छी व्याख्या प्रदान करते हैं।
34वे जिन्हें उनके चेहरों के बल घसीटकर जहन्नम में डाला जाएगा, वे सबसे बुरी जगह में होंगे और 'अब' सीधे मार्ग से सबसे ज़्यादा दूर हैं।
وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَٰرَبِّ إِنَّ قَوۡمِي ٱتَّخَذُواْ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانَ مَهۡجُورٗا30
وَكَذَٰلِكَ جَعَلۡنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوّٗا مِّنَ ٱلۡمُجۡرِمِينَۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيٗا وَنَصِيرٗا31
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَوۡلَا نُزِّلَ عَلَيۡهِ ٱلۡقُرۡءَانُ جُمۡلَةٗ وَٰحِدَةٗۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِۦ فُؤَادَكَۖ وَرَتَّلۡنَٰهُ تَرۡتِيلٗا32
وَلَا يَأۡتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئۡنَٰكَ بِٱلۡحَقِّ وَأَحۡسَنَ تَفۡسِيرًا33
ٱلَّذِينَ يُحۡشَرُونَ عَلَىٰ وُجُوهِهِمۡ إِلَىٰ جَهَنَّمَ أُوْلَٰٓئِكَ شَرّٞ مَّكَانٗا وَأَضَلُّ سَبِيلٗا34
दुष्टों का सदैव विनाश होता है।
35हमने मूसा को अवश्य किताब दी और उसके भाई हारून को उसका सहायक नियुक्त किया।
36हमने उन्हें आदेश दिया था, "उन लोगों के पास जाओ जो हमारी निशानियों को झुठलाते हैं।
" फिर हमने झुठलाने वालों को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
37और जब नूह की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया, तो हमने उन्हें डुबो दिया, उन्हें मानवता के लिए एक उदाहरण बना दिया।
और हमने ज़ालिमों के लिए एक दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है।
38और हमने आद, समूद और कुएँ वालों की क़ौम को भी नष्ट कर दिया, साथ ही उनके बीच की कई क़ौमों को भी।
39हमने उनमें से हर एक को कई नसीहतें दीं, लेकिन अंत में हर एक को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
40इन मक्कावासियों ने लूत की बस्ती से अवश्य ही गुज़रे होंगे, जिस पर पत्थरों की एक भयानक बारिश बरसाई गई थी।
क्या उन्होंने उसके खंडहर नहीं देखे?
दरअसल, वे पुनर्जीवन की आशा नहीं करते।
وَلَقَدۡ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ وَجَعَلۡنَا مَعَهُۥٓ أَخَاهُ هَٰرُونَ وَزِيرٗا35
فَقُلۡنَا ٱذۡهَبَآ إِلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَا فَدَمَّرۡنَٰهُمۡ تَدۡمِيرٗا36
وَقَوۡمَ نُوحٖ لَّمَّا كَذَّبُواْ ٱلرُّسُلَ أَغۡرَقۡنَٰهُمۡ وَجَعَلۡنَٰهُمۡ لِلنَّاسِ ءَايَةٗۖ وَأَعۡتَدۡنَا لِلظَّٰلِمِينَ عَذَابًا أَلِيمٗا37
وَعَادٗا وَثَمُودَاْ وَأَصۡحَٰبَ ٱلرَّسِّ وَقُرُونَۢا بَيۡنَ ذَٰلِكَ كَثِيرٗا38
وَكُلّٗا ضَرَبۡنَا لَهُ ٱلۡأَمۡثَٰلَۖ وَكُلّٗا تَبَّرۡنَا تَتۡبِيرٗا39
وَلَقَدۡ أَتَوۡاْ عَلَى ٱلۡقَرۡيَةِ ٱلَّتِيٓ أُمۡطِرَتۡ مَطَرَ ٱلسَّوۡءِۚ أَفَلَمۡ يَكُونُواْ يَرَوۡنَهَاۚ بَلۡ كَانُواْ لَا يَرۡجُونَ نُشُورٗا40

ज्ञान की बातें
- •
जैसा कि हमने सूरह 33 के अंत में उल्लेख किया था, प्रकृति में हर चीज़ अल्लाह के नियमों का पालन करती है: ग्रह अपनी निश्चित कक्षाओं में यात्रा
करते हैं, सूर्य और चंद्रमा अपने चक्रों का सटीक रूप से पालन करते हैं, बीज धरती से उगते हैं, पेड़ सर्दियों में अपने पत्ते खो देते हैं और
वसंत में नए उगाते हैं, और पहाड़ धरती को स्थिर बनाते हैं।
धरती पर सभी जानवर, आकाश में पक्षी, महासागर में मछलियाँ, और हर चीज़—सबसे बड़ी नीली व्हेल से लेकर सबसे छोटे कीटाणु तक—अल्लाह के प्रति समर्पित हैं।
- •
आयत 25:44 के अनुसार, जानवर अपने मालिकों के प्रति आज्ञाकारी और वफादार होते हैं जो उनकी देखभाल करते हैं।
साथ ही, वे आसानी से अपना रास्ता खोज सकते हैं।
जानवरों के विपरीत, मूर्ति-पूजक अपने मालिक के प्रति अवज्ञाकारी और कृतघ्न होते हैं जो उन्हें प्रदान करता है।
वे सही रास्ते से भटकना चुनते हैं और परिणामों की परवाह नहीं करते।
{इमाम अल-कुर्तुबी}

मक्कावासियों को चेतावनी
41जब वे तुम्हें (ऐ पैगंबर) देखते हैं, तो वे तुम्हारा उपहास ही करते हैं, (यह कहते हुए), "क्या यही वह रसूल है जिसे अल्लाह ने भेजा है?
"
42'उसने हमें हमारे देवताओं से लगभग भटका ही दिया था, यदि हम उन पर दृढ़ न रहते।
' लेकिन जल्द ही, जब वे सज़ा का सामना करेंगे, तो उन्हें एहसास होगा कि 'सीधे' मार्ग से कौन बहुत दूर भटक गया है।
43क्या तुमने उसे देखा जिसने अपनी वासनाओं को अपना उपास्य बना लिया है?
तो क्या तुम उन पर कोई संरक्षक बनोगे?
44या क्या तुम समझते हो कि उनमें से अधिकतर सुनते या समझते हैं?
वे तो बस चौपायों जैसे हैं--नहीं, बल्कि उनसे भी बदतर, वे 'सीधे' मार्ग से बहुत दूर भटक गए हैं!
وَإِذَا رَأَوۡكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا ٱلَّذِي بَعَثَ ٱللَّهُ رَسُولًا41
إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنۡ ءَالِهَتِنَا لَوۡلَآ أَن صَبَرۡنَا عَلَيۡهَاۚ وَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ حِينَ يَرَوۡنَ ٱلۡعَذَابَ مَنۡ أَضَلُّ سَبِيلًا42
أَرَءَيۡتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَٰهَهُۥ هَوَىٰهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيۡهِ وَكِيلًا43
أَمۡ تَحۡسَبُ أَنَّ أَكۡثَرَهُمۡ يَسۡمَعُونَ أَوۡ يَعۡقِلُونَۚ إِنۡ هُمۡ إِلَّا كَٱلۡأَنۡعَٰمِ بَلۡ هُمۡ أَضَلُّ سَبِيلًا44

ज्ञान की बातें
- •
आयतों 45-47 के अनुसार, अल्लाह की हम पर की गई महान कृपाओं में से एक यह है कि वह सुबह सूरज को निकलने देता है, जिससे धीरे-धीरे अंधेरा
छंट जाता है।
वह आसानी से सूरज और पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमने से रोक सकता था।
यदि ऐसा होता, तो आधी दुनिया हमेशा सूरज के सामने होती और बाकी आधी अंधेरे में डूबी रहती।
इसका मतलब है कि एक तरफ हमेशा दिन रहता और दूसरी तरफ हमेशा रात रहती।
यदि ऐसा होता, तो पृथ्वी पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता, क्योंकि ग्रह के हर तरफ केवल एक ही मौसम होता।
लेकिन अल्लाह ने सूरज और पृथ्वी को घूमने दिया है ताकि हम दिन में काम कर सकें, रात में आराम कर सकें और चारों मौसमों का अनुभव कर
सकें।
{इमाम इब्न 'अशूर}
अल्लाह की कुदरत
45क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारा रब कैसे छाया को फैलाता है?
अगर वह चाहता तो उसे स्थिर कर देता, फिर हम सूरज को उसका मार्गदर्शक बनाते हैं,
46(और) छाया को धीरे-धीरे समेटते हुए?
47वही है जिसने तुम्हारे लिए रात को एक आवरण बनाया, और नींद को आराम के लिए, और दिन को उठने के लिए।
48और वही है जो हवाओं को अपनी रहमत की खुशखबरी लिए हुए भेजता है, और हम आसमान से पाक (शुद्ध) पानी बरसाते हैं,
49ताकि एक बेजान ज़मीन को जीवन दें और अपनी ही रचना के बहुत से जानवरों और इंसानों के लिए पानी मुहैया कराएं।
50हमने इस बात को पहले ही दोहरा दिया है ताकि सब इसे याद रखें, लेकिन ज़्यादातर लोग बस इनकार करना चुनते हैं।
51यदि हम चाहते, तो हम हर समुदाय में आसानी से एक चेतावनी देने वाला भेज सकते थे।
52अतः काफ़िरों के आगे मत झुको, बल्कि इस क़ुरआन के साथ उनके विरुद्ध बड़ा जिहाद करो।
53और वही है जिसने दो समुद्रों को मिलाया है: एक मीठा और स्वादिष्ट, और दूसरा खारा और कड़वा, और उनके बीच एक ऐसी आड़ रखी है जिसे वे
पार नहीं कर सकते।
54और वही है जिसने मनुष्य को एक बूंद पानी से पैदा किया, फिर उसे वंश और विवाह के संबंध से जोड़ा।
तुम्हारा रब पूर्ण सामर्थ्य रखता है।
55फिर भी, अल्लाह के बजाय, वे 'मक्कावासी' ऐसी चीज़ों की इबादत करते हैं जो उन्हें न लाभ पहुँचा सकती हैं और न हानि।
أَلَمۡ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيۡفَ مَدَّ ٱلظِّلَّ وَلَوۡ شَآءَ لَجَعَلَهُۥ سَاكِنٗا ثُمَّ جَعَلۡنَا ٱلشَّمۡسَ عَلَيۡهِ دَلِيلٗا45
ثُمَّ قَبَضۡنَٰهُ إِلَيۡنَا قَبۡضٗا يَسِيرٗا46
وَهُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيۡلَ لِبَاسٗا وَٱلنَّوۡمَ سُبَاتٗا وَجَعَلَ ٱلنَّهَارَ نُشُورٗا47
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَرۡسَلَ ٱلرِّيَٰحَ بُشۡرَۢا بَيۡنَ يَدَيۡ رَحۡمَتِهِۦۚ وَأَنزَلۡنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ طَهُورٗا48
لِّنُحۡـِۧيَ بِهِۦ بَلۡدَةٗ مَّيۡتٗا وَنُسۡقِيَهُۥ مِمَّا خَلَقۡنَآ أَنۡعَٰمٗا وَأَنَاسِيَّ كَثِيرٗا49
وَلَقَدۡ صَرَّفۡنَٰهُ بَيۡنَهُمۡ لِيَذَّكَّرُواْ فَأَبَىٰٓ أَكۡثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا كُفُورٗا50
وَلَوۡ شِئۡنَا لَبَعَثۡنَا فِي كُلِّ قَرۡيَةٖ نَّذِيرٗا51
فَلَا تُطِعِ ٱلۡكَٰفِرِينَ وَجَٰهِدۡهُم بِهِۦ جِهَادٗا كَبِيرٗا52
وَهُوَ ٱلَّذِي مَرَجَ ٱلۡبَحۡرَيۡنِ هَٰذَا عَذۡبٞ فُرَاتٞ وَهَٰذَا مِلۡحٌ أُجَاجٞ وَجَعَلَ بَيۡنَهُمَا بَرۡزَخٗا وَحِجۡرٗا مَّحۡجُورٗا53
وَهُوَ ٱلَّذِي خَلَقَ مِنَ ٱلۡمَآءِ بَشَرٗا فَجَعَلَهُۥ نَسَبٗا وَصِهۡرٗاۗ وَكَانَ رَبُّكَ قَدِيرٗا54
وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمۡ وَلَا يَضُرُّهُمۡۗ وَكَانَ ٱلۡكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِۦ ظَهِيرٗا55
नबी को नसीहत
56हमने आपको केवल शुभ समाचार देने और चेतावनी देने के लिए भेजा है।
57कहो, "मैं तुमसे इस (संदेश) के लिए कोई मज़दूरी नहीं मांगता, बल्कि जो चाहे, वह अपने रब की ओर जाने वाला मार्ग अपनाए।
"
58उस सदा जीवित पर भरोसा रखो जो कभी नहीं मरता, और उसकी प्रशंसा करो।
यह काफी है कि तुम्हारा रब अपने बंदों के गुनाहों को भली-भाँति जानता है।
59वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है, छह दिनों में पैदा किया, फिर अर्श पर विराजमान हुआ।
वह परम दयालु है!
उसके बारे में उस (अल्लाह) से पूछो जो स्वयं को पूरी तरह जानता है।
وَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ إِلَّا مُبَشِّرٗا وَنَذِيرٗا56
قُلۡ مَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍ إِلَّا مَن شَآءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلٗ57
وَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱلۡحَيِّ ٱلَّذِي لَا يَمُوتُ وَسَبِّحۡ بِحَمۡدِهِۦۚ وَكَفَىٰ بِهِۦ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرًا58
ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَيۡنَهُمَا فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ ٱلرَّحۡمَٰنُ فَسَۡٔلۡ بِهِۦ خَبِيرٗا59
अल्लाह का इनकार
60जब उनसे कहा जाता है, "परम कृपालु को सजदा करो," तो वे 'घृणापूर्वक' पूछते हैं, "'परम कृपालु' क्या है?
क्या हम उसी को सजदा करें जिसका तुम हमें हुक्म देते हो?
" और यह बात उन्हें और अधिक दूर कर देती है।
61धन्य है वह जिसने आकाश में नक्षत्रों के समूह बनाए हैं, और एक 'चमकता' दीपक¹⁴ तथा एक चमकीला चाँद भी।
62और वही है जिसने दिन और रात को एक दूसरे के पीछे आने वाला बनाया है, 'एक निशानी के तौर पर' उसके लिए जो 'उसे' याद करना चाहे
या शुक्र अदा करना चाहे।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱسۡجُدُواْۤ لِلرَّحۡمَٰنِ قَالُواْ وَمَا ٱلرَّحۡمَٰنُ أَنَسۡجُدُ لِمَا تَأۡمُرُنَا وَزَادَهُمۡ نُفُورٗا ۩60
تَبَارَكَ ٱلَّذِي جَعَلَ فِي ٱلسَّمَآءِ بُرُوجٗا وَجَعَلَ فِيهَا سِرَٰجٗا وَقَمَرٗا مُّنِيرٗا61
وَهُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ ٱلَّيۡلَ وَٱلنَّهَارَ خِلۡفَةٗ لِّمَنۡ أَرَادَ أَن يَذَّكَّرَ أَوۡ أَرَادَ شُكُورٗا62
How to study Surah Al-Furqân with children
Use this children's lesson as a guided path: read the short explanation, look at the Arabic verse, listen to related recitation, and return to the full surah when
your child is ready for more detail.
Parents can review one section at a time, ask the child to repeat the main idea, and then continue with the next part or a nearby surah.
This keeps the lesson connected with Quran reading, audio, and daily practice.