This translation is done through Artificial Intelligence (AI) modern technology. Moreover, it is based on Dr. Mustafa Khattab's "The Clear Quran".

Surah 32 - السَّجْدَة

As-Sajdah (Surah 32)

السَّجْدَة (The Prostration)

Makki SurahMakki Surah

Introduction

यह मक्की सूरह, जिसका नाम आयत 15 में वर्णित ईमानवालों के सजदों से लिया गया है, यह स्पष्ट करती है कि क़ुरआन एक ईश्वरीय वह्य है और यह कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ही एकमात्र सृष्टिकर्ता है, जो पुनरुत्थान में सर्वाधिक सक्षम है। पिछली सूरह के समान, इसमें ईमानवालों और काफ़िरों के गुणों तथा प्रत्येक के लिए प्रतीक्षारत इनाम का उल्लेख किया गया है। इस सूरह का अंत और अगली सूरह का आरंभ दोनों ही नबी (ﷺ) से आग्रह करते हैं कि वे इनकार करनेवालों से मुँह मोड़ लें और उनके सामने न झुकें। अल्लाह के नाम से—जो अत्यंत कृपाशील, परम दयावान है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

In the Name of Allah—the Most Compassionate, Most Merciful.

नबी को ढाढस बंधाना

1. अलिफ़-लाम-मीम। 2. इस किताब का अवतरण—निःसंदेह—समस्त लोकों के रब की ओर से है। 3. या वे कहते हैं, "उसने इसे गढ़ लिया है!"? नहीं! यह तुम्हारे रब की ओर से सत्य है ताकि तुम एक ऐसी क़ौम को चेतावनी दो जिनके पास तुमसे पहले कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया, ताकि वे मार्गदर्शन प्राप्त करें।

الٓمٓ
١
تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ لَا رَيْبَ فِيهِ مِن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
٢
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۚ بَلْ هُوَ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًا مَّآ أَتَىٰهُم مِّن نَّذِيرٍ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
٣

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 1-3


अल्लाह की सृजन शक्ति

4. अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती को और उन दोनों के बीच की हर चीज़ को छह दिनों में पैदा किया, फिर अर्श पर विराजमान हुआ। उसके सिवा तुम्हारा कोई संरक्षक या सिफ़ारिशी नहीं है। तो क्या तुम फिर भी सचेत नहीं होगे? 5. वह आकाश से पृथ्वी तक हर मामले का प्रबंध करता है, फिर वह सब उसी की ओर एक ऐसे दिन में ऊपर जाता है जिसकी अवधि तुम्हारे गणना के अनुसार एक हज़ार वर्ष है। 6. वही है जो दृश्य और अदृश्य का ज्ञाता है—सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयालु। 7. जिसने अपनी हर रचना को पूर्णता प्रदान की। और उसने मानव की रचना मिट्टी से आरंभ की। 8. फिर उसने उसकी संतान एक तुच्छ द्रव के सार से बनाई, 9. फिर उसने उन्हें सुघड़ बनाया और उनमें अपनी रूह फूँक दी। और उसने तुम्हें श्रवण, दृष्टि और बुद्धि दी। (फिर भी) तुम बहुत कम शुक्र अदा करते हो।

ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۖ مَا لَكُم مِّن دُونِهِۦ مِن وَلِىٍّ وَلَا شَفِيعٍ ۚ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ
٤
يُدَبِّرُ ٱلْأَمْرَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ إِلَى ٱلْأَرْضِ ثُمَّ يَعْرُجُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُۥٓ أَلْفَ سَنَةٍ مِّمَّا تَعُدُّونَ
٥
ذَٰلِكَ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
٦
ٱلَّذِىٓ أَحْسَنَ كُلَّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ ۖ وَبَدَأَ خَلْقَ ٱلْإِنسَـٰنِ مِن طِينٍ
٧
ثُمَّ جَعَلَ نَسْلَهُۥ مِن سُلَـٰلَةٍ مِّن مَّآءٍ مَّهِينٍ
٨
ثُمَّ سَوَّىٰهُ وَنَفَخَ فِيهِ مِن رُّوحِهِۦ ۖ وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ
٩

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 4-9


क़यामत को झुठलाने वाले

10. वे (फिर भी) उपहासपूर्वक पूछते हैं, "जब हम धरती में विलीन हो जाएँगे, तो क्या सचमुच हमें एक नई सृष्टि के रूप में उठाया जाएगा?" दरअसल, वे अपने रब से मिलने का इनकार करते हैं। 11. कहो, (ऐ पैग़म्बर,) "तुम्हारी रूह को मौत का फ़रिश्ता कब्ज़े में ले लेगा, जो तुम पर नियुक्त है। फिर तुम सब अपने रब की ओर लौटाए जाओगे।" 12. काश तुम देखते कि अपराधी अपने रब के सामने अपने सर झुकाए होंगे, (कहते हुए:) "हे हमारे रब! हमने अब देख लिया है और सुन लिया है, तो हमें वापस लौटा दे और हम नेक अमल करेंगे। अब हमें सचमुच यक़ीन हो गया है!" 13. अगर हम चाहते, तो हर जान को हिदायत दे सकते थे। लेकिन मेरा यह कथन सत्य होकर रहेगा कि मैं जहन्नम को जिन्न और इंसानों, सब से भर दूँगा। 14. तो चखो (सज़ा) इस बात की कि तुमने अपने इस दिन की मुलाक़ात को भुला दिया था। हम भी तुम्हें भुला देंगे। और चखो हमेशा की यातना का मज़ा, उन कर्मों के बदले जो तुम करते थे!

وَقَالُوٓا أَءِذَا ضَلَلْنَا فِى ٱلْأَرْضِ أَءِنَّا لَفِى خَلْقٍ جَدِيدٍۭ ۚ بَلْ هُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمْ كَـٰفِرُونَ
١٠
۞ قُلْ يَتَوَفَّىٰكُم مَّلَكُ ٱلْمَوْتِ ٱلَّذِى وُكِّلَ بِكُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ
١١
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلْمُجْرِمُونَ نَاكِسُوا رُءُوسِهِمْ عِندَ رَبِّهِمْ رَبَّنَآ أَبْصَرْنَا وَسَمِعْنَا فَٱرْجِعْنَا نَعْمَلْ صَـٰلِحًا إِنَّا مُوقِنُونَ
١٢
وَلَوْ شِئْنَا لَـَٔاتَيْنَا كُلَّ نَفْسٍ هُدَىٰهَا وَلَـٰكِنْ حَقَّ ٱلْقَوْلُ مِنِّى لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ
١٣
فَذُوقُوا بِمَا نَسِيتُمْ لِقَآءَ يَوْمِكُمْ هَـٰذَآ إِنَّا نَسِينَـٰكُمْ ۖ وَذُوقُوا عَذَابَ ٱلْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
١٤

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 10-14


मोमिनों की विशेषताएँ

15. हमारी आयतों पर ईमान लाने वाले तो बस वही हैं कि जब उन्हें वे सुनाई जाती हैं तो सजदे में गिर जाते हैं और अपने रब की तस्बीह करते हैं और तकब्बुर नहीं करते। 16. वे अपनी करवटें छोड़ते हैं, अपने रब को आशा और भय के साथ पुकारते हुए, और जो हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है उसमें से खर्च करते हैं। 17. कोई भी जान नहीं जानती कि उनके लिए क्या आँखें ठंडी करने वाली चीज़ें छिपा कर रखी गई हैं, उनके कर्मों के प्रतिफल के रूप में।

إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِـَٔايَـٰتِنَا ٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩
١٥
تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ ٱلْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
١٦
فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَّآ أُخْفِىَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍ جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
١٧

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 15-17


मोमिन और अवज्ञाकारी

18. क्या मोमिन और नाफ़रमान बराबर हो सकते हैं? वे बराबर नहीं हैं! 19. जो लोग ईमान लाए और नेक अमल किए, उनके लिए हमेशा रहने वाले बाग़ होंगे—उनके किए हुए कर्मों के बदले में मेज़बानी के तौर पर। 20. लेकिन जो लोग नाफ़रमान हैं, आग उनका ठिकाना होगी। जब भी वे उससे निकलने की कोशिश करेंगे, उन्हें उसमें वापस धकेल दिया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, “चखो उस आग के अज़ाब का स्वाद, जिसका तुम इनकार किया करते थे।” 21. हम उन्हें बड़े अज़ाब से पहले कुछ छोटे अज़ाब (इस दुनिया में) का स्वाद अवश्य चखाएँगे, ताकि शायद वे (सही रास्ते पर) लौट आएँ। 22. और उस से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जिसे अल्लाह की आयतों से नसीहत की जाए फिर वह उनसे मुँह मोड़ ले? हम यक़ीनन मुजरिमों को सज़ा देंगे।

أَفَمَن كَانَ مُؤْمِنًا كَمَن كَانَ فَاسِقًا ۚ لَّا يَسْتَوُۥنَ
١٨
أَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا وَعَمِلُوا ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَلَهُمْ جَنَّـٰتُ ٱلْمَأْوَىٰ نُزُلًۢا بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
١٩
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ فَسَقُوا فَمَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ ۖ كُلَّمَآ أَرَادُوٓا أَن يَخْرُجُوا مِنْهَآ أُعِيدُوا فِيهَا وَقِيلَ لَهُمْ ذُوقُوا عَذَابَ ٱلنَّارِ ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ
٢٠
وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنَ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَدْنَىٰ دُونَ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَكْبَرِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
٢١
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِۦ ثُمَّ أَعْرَضَ عَنْهَآ ۚ إِنَّا مِنَ ٱلْمُجْرِمِينَ مُنتَقِمُونَ
٢٢

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 18-22


ईश्वरीय प्रकाशनाएँ

23. बेशक हमने मूसा को किताब दी, तो तुम्हें (ऐ पैग़म्बर) इसमें कोई शुब्हा न हो कि तुम्हें भी वही दी जा रही है, और हमने उसे बनी इसराईल के लिए हिदायत बनाया। 24. और हमने उनमें से इमाम बनाए जो हमारे हुक्म से हिदायत देते थे, जब उन्होंने सब्र किया और हमारी आयतों पर यक़ीन रखा। 25. बेशक, तुम्हारा रब क़यामत के दिन उनके मतभेदों के विषय में उनके बीच निर्णय करेगा।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَلَا تَكُن فِى مِرْيَةٍ مِّن لِّقَآئِهِۦ ۖ وَجَعَلْنَـٰهُ هُدًى لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
٢٣
وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا ۖ وَكَانُوا بِـَٔايَـٰتِنَا يُوقِنُونَ
٢٤
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
٢٥

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 23-25


काफिरों को चेतावनी

26. क्या उन्हें अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि हमने उनसे पहले कितनी ही कौमों को विनष्ट किया, जिनके खंडहरों से वे अब भी गुज़रते हैं? निःसंदेह इसमें निशानियाँ हैं। तो क्या वे फिर भी नहीं सुनेंगे? 27. क्या वे नहीं देखते कि हम कैसे सूखी ज़मीन की ओर पानी (वर्षा) को ले जाते हैं, फिर उससे फसलें उगाते हैं जिनसे वे और उनके मवेशी खाते हैं? तो क्या वे फिर भी नहीं देखेंगे?

أَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّنَ ٱلْقُرُونِ يَمْشُونَ فِى مَسَـٰكِنِهِمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ ۖ أَفَلَا يَسْمَعُونَ
٢٦
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ ٱلْمَآءَ إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِۦ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَـٰمُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
٢٧

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 26-27


न्याय के दिन को झुठलाने वाले

28. वे पूछते हैं, 'यह फ़ैसले का दिन कब है, यदि तुम सच्चे हो?' 29. कहो, 'फ़ैसले के दिन काफ़िरों को ईमान लाना लाभ नहीं देगा, और न उन्हें मोहलत दी जाएगी।' 30. अतः उनसे मुँह फेर लो, और इंतज़ार करो! वे भी इंतज़ार कर रहे हैं।

وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
٢٨
قُلْ يَوْمَ ٱلْفَتْحِ لَا يَنفَعُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا إِيمَـٰنُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
٢٩
فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَٱنتَظِرْ إِنَّهُم مُّنتَظِرُونَ
٣٠

Surah 32 - السَّجْدَة (सजदा) - Verses 28-30


As-Sajdah () - अध्याय 32 - स्पष्ट कुरान डॉ. मुस्तफा खत्ताब द्वारा