Surah 3
Volume 2

The Family of 'Imran

آلِ عِمْرَان

آلِ عِمران

Surah Âli-'Imran for kids content

कपट का पर्दाफ़ाश

69अहले किताब में से कुछ लोग तुम्हें (ऐ ईमानवालो) गुमराह करना चाहते हैं। लेकिन वे खुद को ही गुमराह करते हैं, और उन्हें इसका एहसास नहीं है। 70ऐ अहले किताब! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि तुम अच्छी तरह जानते हो कि वे सच हैं? 71ऐ अहले किताब! तुम हक़ को बातिल से क्यों मिलाते हो और जानबूझकर हक़ को क्यों छिपाते हो? 72अहले किताब में से एक गिरोह ने (आपस में) कहा, "जो कुछ ईमानवालों पर सुबह के वक़्त उतारा गया है, उस पर ईमान लाओ और शाम को उसका इनकार कर दो, ताकि वे भी अपने दीन से फिर जाएँ।" 73"और किसी पर भरोसा मत करो सिवाय उनके जो तुम्हारे दीन पर चलते हैं।" (ऐ पैगंबर!) कहो, "यक़ीनन सच्ची हिदायत तो अल्लाह की हिदायत ही है। क्या तुम इसलिए ऐसा कह रहे हो कि कहीं किसी को तुम्हारे जैसा ही ज्ञान न मिल जाए या वे तुम्हारे रब के सामने तुमसे बहस न करें?" और कहो, "यक़ीनन सारी फ़ज़ीलत अल्लाह के हाथ में है - वह जिसे चाहता है देता है। और अल्लाह बड़ी फ़ज़ीलत वाला और सब कुछ जानने वाला है।" 74वह अपनी रहमत के लिए जिसे चाहता है चुन लेता है। और अल्लाह बड़े फज़लों का मालिक है।
وَدَّت طَّآئِفَةٞ مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ لَوۡ يُضِلُّونَكُمۡ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمۡ وَمَا يَشۡعُرُونَ 69يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تَكۡفُرُونَ بِ‍َٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَأَنتُمۡ تَشۡهَدُونَ 70يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تَلۡبِسُونَ ٱلۡحَقَّ بِٱلۡبَٰطِلِ وَتَكۡتُمُونَ ٱلۡحَقَّ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ 71وَقَالَت طَّآئِفَةٞ مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ ءَامِنُواْ بِٱلَّذِيٓ أُنزِلَ عَلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَجۡهَ ٱلنَّهَارِ وَٱكۡفُرُوٓاْ ءَاخِرَهُۥ لَعَلَّهُمۡ يَرۡجِعُونَ 72وَلَا تُؤۡمِنُوٓاْ إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمۡ قُلۡ إِنَّ ٱلۡهُدَىٰ هُدَى ٱللَّهِ أَن يُؤۡتَىٰٓ أَحَدٞ مِّثۡلَ مَآ أُوتِيتُمۡ أَوۡ يُحَآجُّوكُمۡ عِندَ رَبِّكُمۡۗ قُلۡ إِنَّ ٱلۡفَضۡلَ بِيَدِ ٱللَّهِ يُؤۡتِيهِ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيم 73يَخۡتَصُّ بِرَحۡمَتِهِۦ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ ذُو ٱلۡفَضۡلِ ٱلۡعَظِيمِ74

अमानतों को निभाना

75अहले किताब में से कुछ ऐसे भी हैं कि यदि तुम उनके पास सोने का ढेर भी अमानत रखो तो वे तुम्हें लौटा देंगे। और उनमें कुछ ऐसे भी हैं कि यदि तुम उनके पास एक दीनार भी अमानत रखो तो वे तुम्हें नहीं लौटाएंगे, जब तक तुम उनके सिर पर खड़े न रहो। यह इसलिए कि वे कहते हैं, "हमें इन अनपढ़ों (यानी गैर-अहले-किताब) के संबंध में कोई पाप नहीं है।" और वे जानबूझकर अल्लाह पर झूठ गढ़ते हैं। 76हरगिज़ नहीं! बल्कि जो अपने अहद (प्रतिज्ञा) को पूरा करते हैं और तक़वा (ईश्वर-भय) अपनाते हैं - निश्चय ही अल्लाह ऐसे परहेज़गारों से प्रेम करता है।
وَمِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ مَنۡ إِن تَأۡمَنۡهُ بِقِنطَارٖ يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيۡكَ وَمِنۡهُم مَّنۡ إِن تَأۡمَنۡهُ بِدِينَارٖ لَّا يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيۡكَ إِلَّا مَا دُمۡتَ عَلَيۡهِ قَآئِمٗاۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَالُواْ لَيۡسَ عَلَيۡنَا فِي ٱلۡأُمِّيِّ‍ۧنَ سَبِيلٞ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ 75بَلَىٰۚ مَنۡ أَوۡفَىٰ بِعَهۡدِهِۦ وَٱتَّقَىٰ فَإِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ76

अल्लाह के अहद को तोड़ना

77निःसंदेह, जो लोग अल्लाह के अहद और अपनी क़समों को थोड़े से लाभ के लिए बेचते हैं, उनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं होगा। अल्लाह क़यामत के दिन न उनसे बात करेगा, न उनकी ओर देखेगा और न उन्हें पाक करेगा। और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब होगा। 78उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपनी ज़बानों से किताब के अर्थ को तोड़-मरोड़ देते हैं ताकि तुम समझो कि वह किताब में से है, जबकि वह किताब में से नहीं है। वे कहते हैं, "यह अल्लाह की ओर से है", जबकि वह अल्लाह की ओर से नहीं है। और वे जानबूझकर अल्लाह पर झूठ गढ़ते हैं।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَشۡتَرُونَ بِعَهۡدِ ٱللَّهِ وَأَيۡمَٰنِهِمۡ ثَمَنٗا قَلِيلًا أُوْلَٰٓئِكَ لَا خَلَٰقَ لَهُمۡ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ وَلَا يَنظُرُ إِلَيۡهِمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمۡ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيم 77وَإِنَّ مِنۡهُمۡ لَفَرِيقٗا يَلۡوُۥنَ أَلۡسِنَتَهُم بِٱلۡكِتَٰبِ لِتَحۡسَبُوهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمَا هُوَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَمَا هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ78

नबी अमीन होते हैं।

79जिस किसी को अल्लाह ने किताब, हिकमत और नुबुव्वत से नवाज़ा हो, उसके लिए यह संभव नहीं है कि वह लोगों से कहे, "अल्लाह के बजाय मेरी इबादत करो।" बल्कि वह तो यही कहेगा, "अपने रब के सच्चे बंदे बनो, उस शिक्षा के अनुसार जो तुम किताब में देते और पढ़ते हो।" 81याद करो, जब अल्लाह ने नबियों से अहद लिया था, यह कहते हुए, "अब जबकि मैंने तुम्हें किताब और हिकमत अता की है, अगर तुम्हारे पास कोई रसूल आए जो तुम्हारे पास मौजूद चीज़ों की तस्दीक करे, तो तुम्हें उस पर ईमान लाना होगा और उसकी मदद करनी होगी।" उसने आगे कहा, "क्या तुम इस पर राज़ी हो और मेरी इस कठोर प्रतिज्ञा को स्वीकार करते हो?" उन्होंने कहा, "हाँ, हम करते हैं।" अल्लाह ने कहा, "तो तुम गवाह बनो, और मैं भी गवाह हूँ।" 82जो कोई इसके बाद फिर जाएगा, वही फ़साद फैलाने वाले होंगे।
مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤۡتِيَهُ ٱللَّهُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡحُكۡمَ وَٱلنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُواْ عِبَادٗا لِّي مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِن كُونُواْ رَبَّٰنِيِّ‍ۧنَ بِمَا كُنتُمۡ تُعَلِّمُونَ ٱلۡكِتَٰبَ وَبِمَا كُنتُمۡ تَدۡرُسُونَ 79وَإِذۡ أَخَذَ ٱللَّهُ مِيثَٰقَ ٱلنَّبِيِّ‍ۧنَ لَمَآ ءَاتَيۡتُكُم مِّن كِتَٰبٖ وَحِكۡمَةٖ ثُمَّ جَآءَكُمۡ رَسُولٞ مُّصَدِّقٞ لِّمَا مَعَكُمۡ لَتُؤۡمِنُنَّ بِهِۦ وَلَتَنصُرُنَّهُۥۚ قَالَ ءَأَقۡرَرۡتُمۡ وَأَخَذۡتُمۡ عَلَىٰ ذَٰلِكُمۡ إِصۡرِيۖ قَالُوٓاْ أَقۡرَرۡنَاۚ قَالَ فَٱشۡهَدُواْ وَأَنَا۠ مَعَكُم مِّنَ ٱلشَّٰهِدِينَ 81فَمَن تَوَلَّىٰ بَعۡدَ ذَٰلِكَ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ82
Illustration

इस्लाम का मार्ग

83क्या वे अल्लाह के दीन (मार्ग) के अतिरिक्त कुछ और चाहते हैं, जबकि आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, सब स्वेच्छा से या अनिच्छा से उसी के अधिकार के अधीन है, और उसी की ओर वे सब लौटाए जाएँगे? 84कहो, (ऐ पैगंबर), "हम अल्लाह पर ईमान लाते हैं और उस पर भी जो हमारी ओर अवतरित किया गया, और उस पर भी जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक, याकूब और उनके पोतों पर अवतरित किया गया; और उस पर भी जो मूसा, ईसा और अन्य नबियों को उनके रब की ओर से दिया गया - हम उनमें से किसी के बीच कोई भेद नहीं करते, और उसी के हम पूरी तरह से समर्पित हैं।" 85जो कोई इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) चाहेगा, वह उससे हरगिज़ कुबूल नहीं किया जाएगा, और आखिरत में वह घाटा उठाने वालों में से होगा।
أَفَغَيۡرَ دِينِ ٱللَّهِ يَبۡغُونَ وَلَهُۥٓ أَسۡلَمَ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ طَوۡعٗا وَكَرۡهٗا وَإِلَيۡهِ يُرۡجَعُونَ 83قُلۡ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا وَمَآ أُنزِلَ عَلَىٰٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطِ وَمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمۡ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّنۡهُمۡ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ 84وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ85

सीधे रास्ते से भटकना

86अल्लाह उन लोगों को कैसे हिदायत देगा जिन्होंने ईमान लाने के बाद कुफ़्र किया, जबकि वे रसूल को सच्चा मान चुके थे और उनके पास खुली निशानियाँ आ चुकी थीं? अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता। 87उनकी सज़ा यह है कि उन पर अल्लाह की, फ़रिश्तों की और तमाम इंसानों की लानत होगी। 88वे हमेशा जहन्नम में रहेंगे। उनकी सज़ा हल्की नहीं की जाएगी और न उन्हें मोहलत दी जाएगी। 89मगर जो लोग इसके बाद तौबा कर लें और अपनी इस्लाह कर लें, तो यक़ीनन अल्लाह बख़्शने वाला, मेहरबान है। 90यक़ीनन जिन लोगों ने ईमान लाने के बाद कुफ़्र किया, फिर कुफ़्र में बढ़ते चले गए, उनकी तौबा हरगिज़ क़बूल नहीं की जाएगी और वही गुमराह हैं। 91निःसंदेह, यदि उन काफ़िरों में से हर एक, जो काफ़िर ही मर गए, खुद को आग (जहन्नम) से बचाने के लिए पूरी दुनिया भर का सोना फ़िरौती में दे, तो वह उनसे कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्हें दर्दनाक सज़ा मिलेगी और उनका कोई सहायक नहीं होगा। 92ऐ ईमानवालो, तुम सच्ची नेकी प्राप्त नहीं करोगे जब तक तुम अपनी प्रिय चीज़ों में से कुछ दान न करो। और तुम जो भी दान देते हो, वह निश्चित रूप से अल्लाह को ज्ञात है।
كَيۡفَ يَهۡدِي ٱللَّهُ قَوۡمٗا كَفَرُواْ بَعۡدَ إِيمَٰنِهِمۡ وَشَهِدُوٓاْ أَنَّ ٱلرَّسُولَ حَقّٞ وَجَآءَهُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُۚ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ 86أُوْلَٰٓئِكَ جَزَآؤُهُمۡ أَنَّ عَلَيۡهِمۡ لَعۡنَةَ ٱللَّهِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجۡمَعِينَ 87خَٰلِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ 88إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ وَأَصۡلَحُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ 89إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بَعۡدَ إِيمَٰنِهِمۡ ثُمَّ ٱزۡدَادُواْ كُفۡرٗا لَّن تُقۡبَلَ تَوۡبَتُهُمۡ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلضَّآلُّونَ 90إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَمَاتُواْ وَهُمۡ كُفَّارٞ فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡ أَحَدِهِم مِّلۡءُ ٱلۡأَرۡضِ ذَهَبٗا وَلَوِ ٱفۡتَدَىٰ بِهِۦٓۗ أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ وَمَا لَهُم مِّن نَّٰصِرِينَ 91لَن تَنَالُواْ ٱلۡبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُواْ مِمَّا تُحِبُّونَۚ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَيۡءٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيم92
BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • इमाम अर-राज़ी के अनुसार, मदीना के कुछ यहूदी विद्वानों ने पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ऊँट का मांस खाने के लिए आलोचना की, यह दावा करते हुए कि इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) के धर्म में यह वर्जित था। इस दावे का जवाब देने के लिए आयतें 93-95 अवतरित हुईं, यह कहते हुए कि अल्लाह ने अतीत में कभी ऊँट के मांस को वर्जित नहीं किया था। यह याकूब (अलैहिस्सलाम) (जिन्हें इज़राइल भी कहा जाता है) थे जिन्होंने एक निश्चित बीमारी से ठीक होने के बाद खुद को ऊँट के मांस से प्रतिबंधित किया था। अतः, यह अल्लाह द्वारा इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) या अन्य पैगंबरों के लिए वर्जित नहीं किया गया था।

  • उन्होंने पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की यरूशलेम से मक्का की ओर किबला (नमाज़ की दिशा) बदलने के लिए भी आलोचना की, यह दावा करते हुए कि पुराना किबला बेहतर था। आयतें 96-97 इस बात की पुष्टि करने के लिए अवतरित हुईं कि काबा इबादत के लिए बनाई गई पहली और सबसे महान संरचना थी।

याकूब का आहार प्रतिबंध

93बनी इस्राईल के लिए हर खाना हलाल था, सिवाय उसके जो इस्राईल ने खुद पर हराम कर लिया था, तौरात के नाज़िल होने से बहुत पहले। कहो, "ऐ नबी, तौरात लाओ और उसे पढ़ो, अगर तुम सच्चे हो।" 94फिर जो कोई इसके बाद अल्लाह पर झूठ गढ़ेगा, वही ज़ालिम होंगे। 95कहो, "ऐ नबी, अल्लाह ने सच फरमाया है। तो इब्राहीम के तरीके पर चलो, जो यकसू थे और मुशरिकों में से न थे।"
كُلُّ ٱلطَّعَامِ كَانَ حِلّٗا لِّبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ إِلَّا مَا حَرَّمَ إِسۡرَٰٓءِيلُ عَلَىٰ نَفۡسِهِۦ مِن قَبۡلِ أَن تُنَزَّلَ ٱلتَّوۡرَىٰةُۚ قُلۡ فَأۡتُواْ بِٱلتَّوۡرَىٰةِ فَٱتۡلُوهَآ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ 93فَمَنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ 94قُلۡ صَدَقَ ٱللَّهُۗ فَٱتَّبِعُواْ مِلَّةَ إِبۡرَٰهِيمَ حَنِيفٗاۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ95

काबा की हज यात्रा

96बेशक, लोगों के लिए बनाया गया पहला घर वही है जो बक्का में है, जो बरकतों और समस्त संसार के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है। 97उसमें खुली निशानियाँ हैं, जिनमें इब्राहीम का मक़ाम भी है। जो कोई उसमें दाखिल हो, वह अमन में हो जाए। अल्लाह ने इस घर का हज उन पर फ़र्ज़ किया है जो इसकी राह की सामर्थ्य रखते हैं। और जो कोई कुफ़्र करे, तो बेशक अल्लाह समस्त संसार से बेनियाज़ है।
إِنَّ أَوَّلَ بَيۡتٖ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكٗا وَهُدٗى لِّلۡعَٰلَمِينَ 96فِيهِ ءَايَٰتُۢ بَيِّنَٰتٞ مَّقَامُ إِبۡرَٰهِيمَۖ وَمَن دَخَلَهُۥ كَانَ ءَامِنٗاۗ وَلِلَّهِ عَلَى ٱلنَّاسِ حِجُّ ٱلۡبَيۡتِ مَنِ ٱسۡتَطَاعَ إِلَيۡهِ سَبِيلٗاۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ97

हक़ का इनकार करना

98ऐ पैग़म्बर, कहो, "ऐ अहले किताब! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि अल्लाह तुम्हारे कामों का गवाह है?" 99कहो, "ऐ अहले किताब! तुम ईमान वालों को अल्लाह की राह से क्यों रोकते हो, उसे टेढ़ा दिखाने की कोशिश करते हो, जबकि तुम उसकी सच्चाई के गवाह हो? और अल्लाह तुम्हारे कामों से कभी बेख़बर नहीं है।"
قُلۡ يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تَكۡفُرُونَ بِ‍َٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا تَعۡمَلُونَ 98قُلۡ يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ مَنۡ ءَامَنَ تَبۡغُونَهَا عِوَجٗا وَأَنتُمۡ شُهَدَآءُۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعۡمَلُونَ99

बुरे असर से चेतावनी

100ऐ ईमानवालो! अगर तुम उन लोगों में से कुछ का कहना मानोगे जिन्हें किताब दी गई थी, तो वे तुम्हें ईमान लाने के बाद फिर कुफ़्र की ओर लौटा देंगे। 101तुम कैसे कुफ़्र कर सकते हो जब अल्लाह की आयतें तुम्हें सुनाई जाती हैं और उसका रसूल तुम्हारे बीच मौजूद है? जो कोई अल्लाह को मज़बूती से थाम लेता है, वह यक़ीनन सीधे रास्ते पर हिदायत पाता है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِن تُطِيعُواْ فَرِيقٗا مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ يَرُدُّوكُم بَعۡدَ إِيمَٰنِكُمۡ كَٰفِرِينَ 100وَكَيۡفَ تَكۡفُرُونَ وَأَنتُمۡ تُتۡلَىٰ عَلَيۡكُمۡ ءَايَٰتُ ٱللَّهِ وَفِيكُمۡ رَسُولُهُۥۗ وَمَن يَعۡتَصِم بِٱللَّهِ فَقَدۡ هُدِيَ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ101
SIDE STORY

छोटी कहानी

  • इस्लाम से पहले, बहीला को पूरे अरब में सबसे नीची जनजाति के रूप में जाना जाता था। महान मुस्लिम सैन्य नेताओं में से एक कुतैबा नामक व्यक्ति थे, जो बहीला जनजाति से थे। कुतैबा ने मुस्लिम सेनाओं का नेतृत्व चीन तक किया। एक दिन, उन्होंने एक बद्दू व्यक्ति (जो अपना पूरा जीवन रेगिस्तान में रहा था) से पूछा, 'क्या आप मेरी जनजाति, बहीला में शामिल होंगे, यदि मैं आपको अपनी आधी सत्ता की पेशकश करूँ?' उस व्यक्ति ने दृढ़ता से इनकार कर दिया।

  • कुतैबा ने तब उससे मज़ाक में पूछा, 'क्या होगा यदि आपको मेरी जनजाति में शामिल होने के लिए जन्नत की पेशकश की जाए?' उस व्यक्ति ने एक पल के लिए रुका और जवाब दिया, 'ठीक है! लेकिन मेरी एक शर्त है: मैं नहीं चाहता कि जन्नत में कोई भी यह जाने कि मैं बहीला से हूँ!'

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • इस्लाम से पहले, लोग अपने कबीलों पर बहुत गर्व करते थे और उन दूसरों को नीचा देखते थे जिनके कबीले निम्न थे। यही कारण था कि अरब हमेशा बँटे हुए थे। जब इस्लाम आया, तो इसने सभी कबीलों को एकजुट किया, सबको समान बना दिया।

  • इस्लाम में, कोई भी व्यक्ति अपनी नस्ल, रंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर दूसरे से बेहतर नहीं है।

  • आयत 103 मुसलमानों को इस दुनिया और आख़िरत में सफलता प्राप्त करने के लिए एक समुदाय के रूप में एकजुट रहने का महत्व सिखाती है। मोमिनों को विभाजन के प्रति चेतावनी दी जाती है, जो उन्हें कमजोर और उनके दुश्मनों के लिए एक आसान निशाना बना सकता है।

  • Illustration
  • मध्यकालीन स्पेन में और आधुनिक समय में मुसलमानों की हार को उनकी एकता बनाए रखने में असफलता से आसानी से जोड़ा जा सकता है।

SIDE STORY

छोटी कहानी

  • एक शेर को जंगल में तीन बैल मिले: एक सफेद था, दूसरा काला था, और तीसरा भूरा था। शेर जानता था कि वह एक साथ सभी बैलों पर हमला नहीं कर सकता, क्योंकि वे मिलकर शक्तिशाली थे। इसलिए, उसने उन्हें एक-एक करके खत्म करने की योजना बनाई।

  • सबसे पहले, उसने बैलों से एक दोस्त के रूप में अपना परिचय दिया, यह कहते हुए कि वह उन्हें खतरे से बचाना चाहता है। फिर, धीरे-धीरे उसने उनका विश्वास जीत लिया।

  • एक दिन, शेर ने काले और भूरे बैलों से अकेले में मुलाकात की। उसने उन्हें विश्वास दिलाया कि सफेद बैल एक खतरा था, क्योंकि शिकारी उसे जंगल में आसानी से देख सकते थे, जिससे दूसरे बैल भी आसान निशाना बन जाते। उनकी रक्षा के लिए, उसने सफेद बैल को खाकर उन पर एक एहसान करने की पेशकश की। बिना सोचे-समझे, दोनों बैल योजना पर सहमत हो गए और देखते रहे जब सफेद बैल को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया।

  • एक हफ्ते बाद, शेर ने भूरे बैल से अकेले में मुलाकात की, उसे बताया कि वे दोनों भाई जैसे थे क्योंकि उनका रंग एक जैसा भूरा था। शेर ने उसे विश्वास दिलाया कि काला बैल एक खतरा था, क्योंकि वह उनका सारा भोजन खत्म कर देगा। फिर से, उसने भूरे बैल पर एहसान के तौर पर उसे खाने की पेशकश की। बैल सहमत हो गया और देखता रहा जब काले बैल को खा लिया गया।

  • निश्चित रूप से, एक हफ्ते बाद, शेर भूरे बैल के पास आया और कहा कि उसे उसे खाना होगा क्योंकि वह भी बाकी 2 बैलों की तरह एक खतरा था। भूरे बैल को अपनी गलती का एहसास तब हुआ जब उसने कहा, "मैं उसी दिन बर्बाद हो गया था जिस दिन सफेद बैल को खाया गया था।"

फूट से बचने की चेतावनी

102ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरो जैसा कि उससे डरने का हक़ है, और तुम्हें मौत न आए मगर इस हाल में कि तुम मुस्लिम हो। 103और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और आपस में फूट न डालो। और अल्लाह के उस एहसान को याद करो जो उसने तुम पर किया, जब तुम एक-दूसरे के दुश्मन थे, तो उसने तुम्हारे दिलों को जोड़ दिया, और तुम उसकी कृपा से भाई-भाई बन गए। और तुम आग के गढ़े के किनारे पर थे, तो उसने तुम्हें उससे बचा लिया। इसी तरह अल्लाह अपनी आयतें तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है, ताकि तुम हिदायत पाओ। 104तुम में से एक जमात ऐसी होनी चाहिए जो भलाई की तरफ़ बुलाए, और अच्छे काम का हुक्म दे, और बुरे काम से रोके। और ऐसे ही लोग कामयाब होंगे। 105और उन लोगों जैसे न हो जाना जिन्होंने आपस में फूट डाली और मतभेद किया, जबकि उनके पास स्पष्ट प्रमाण आ चुके थे। ऐसे लोगों के लिए बड़ा अज़ाब है। 106जिस दिन कुछ चेहरे रोशन होंगे और कुछ चेहरे काले होंगे। तो जिन लोगों के चेहरे काले होंगे, उनसे कहा जाएगा, "क्या तुमने ईमान लाने के बाद कुफ़्र किया था? तो अपने कुफ़्र के बदले अज़ाब चखो।" 107जिनके चेहरे रोशन होंगे, वे अल्लाह की रहमत में होंगे, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। 108ये अल्लाह की आयतें हैं, जिन्हें हम आपको 'ऐ पैगंबर' हक़ के साथ सुनाते हैं। और अल्लाह कभी किसी पर ज़ुल्म करना नहीं चाहता। 109जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, वह अल्लाह ही का है। और 'तमाम' मामले अल्लाह की तरफ़ ही लौटाए जाएँगे 'फैसले के लिए'।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِۦ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسۡلِمُونَ 102وَٱعۡتَصِمُواْ بِحَبۡلِ ٱللَّهِ جَمِيعٗا وَلَا تَفَرَّقُواْۚ وَٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ إِذۡ كُنتُمۡ أَعۡدَآءٗ فَأَلَّفَ بَيۡنَ قُلُوبِكُمۡ فَأَصۡبَحۡتُم بِنِعۡمَتِهِۦٓ إِخۡوَٰنٗا وَكُنتُمۡ عَلَىٰ شَفَا حُفۡرَةٖ مِّنَ ٱلنَّارِ فَأَنقَذَكُم مِّنۡهَاۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمۡ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ 103وَلۡتَكُن مِّنكُمۡ أُمَّةٞ يَدۡعُونَ إِلَى ٱلۡخَيۡرِ وَيَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ 104وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُواْ وَٱخۡتَلَفُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيم 105يَوۡمَ تَبۡيَضُّ وُجُوهٞ وَتَسۡوَدُّ وُجُوهٞۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱسۡوَدَّتۡ وُجُوهُهُمۡ أَكَفَرۡتُم بَعۡدَ إِيمَٰنِكُمۡ فَذُوقُواْ ٱلۡعَذَابَ بِمَا كُنتُمۡ تَكۡفُرُونَ 106وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱبۡيَضَّتۡ وُجُوهُهُمۡ فَفِي رَحۡمَةِ ٱللَّهِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ 107تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱللَّهِ نَتۡلُوهَا عَلَيۡكَ بِٱلۡحَقِّۗ وَمَا ٱللَّهُ يُرِيدُ ظُلۡمٗا لِّلۡعَٰلَمِينَ 108وَلِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرۡجَعُ ٱلۡأُمُورُ109

मुस्लिम उम्मत की श्रेष्ठता

110तुम बेहतरीन उम्मत हो जिसे लोगों के लिए पैदा किया गया है - तुम भलाई का हुक्म देते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। अगर अहले किताब ईमान ले आते, तो उनके लिए बेहतर होता। उनमें से कुछ ईमान वाले हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर फ़ासिक़ हैं। 111वे तुम्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचा सकते, सिवाय ज़ुबानी तकलीफ़ के। लेकिन अगर वे तुमसे लड़ाई में मिलेंगे, तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे और उन्हें कोई मदद नहीं मिलेगी। 112उन पर हर जगह ज़िल्लत छा जाएगी जहाँ भी वे पाए जाएँगे, सिवाय इसके कि उन्हें अल्लाह की रस्सी या लोगों के साथ सुलह के तहत पनाह मिले। वे अल्लाह के ग़ज़ब के हक़दार हुए और उन पर बदहाली छा गई, इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इंकार करते थे और नाहक़ नबियों को क़त्ल करते थे। यह उनकी नाफ़रमानी और हद से गुज़रने का बदला है।
كُنتُمۡ خَيۡرَ أُمَّةٍ أُخۡرِجَتۡ لِلنَّاسِ تَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَتَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَتُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِۗ وَلَوۡ ءَامَنَ أَهۡلُ ٱلۡكِتَٰبِ لَكَانَ خَيۡرٗا لَّهُمۚ مِّنۡهُمُ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ وَأَكۡثَرُهُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ 110لَن يَضُرُّوكُمۡ إِلَّآ أَذٗىۖ وَإِن يُقَٰتِلُوكُمۡ يُوَلُّوكُمُ ٱلۡأَدۡبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ 111ضُرِبَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلذِّلَّةُ أَيۡنَ مَا ثُقِفُوٓاْ إِلَّا بِحَبۡلٖ مِّنَ ٱللَّهِ وَحَبۡلٖ مِّنَ ٱلنَّاسِ وَبَآءُو بِغَضَبٖ مِّنَ ٱللَّهِ وَضُرِبَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡمَسۡكَنَةُۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَانُواْ يَكۡفُرُونَ بِ‍َٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَيَقۡتُلُونَ ٱلۡأَنۢبِيَآءَ بِغَيۡرِ حَقّٖۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَواْ وَّكَانُواْ يَعۡتَدُونَ112

मोमिन अहल-ए-किताब

113वे सब एक जैसे नहीं हैं: अहले किताब (ग्रंथधारियों) में से कुछ ऐसे भी हैं जो धर्मनिष्ठ हैं, रात भर अल्लाह की आयतों का पाठ करते हैं और नमाज़ में झुकते हैं। 114वे अल्लाह और अंतिम दिन पर विश्वास रखते हैं, अच्छाई का आदेश देते हैं और बुराई से रोकते हैं, और अच्छे कामों में तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। वे ही वास्तव में ईमान वालों में से हैं। 115उन्हें उनके किसी भी अच्छे काम का प्रतिफल कभी नहीं रोका जाएगा। और अल्लाह उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो उसे याद रखते हैं।
لَيۡسُواْ سَوَآءٗۗ مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ أُمَّةٞ قَآئِمَةٞ يَتۡلُونَ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ ءَانَآءَ ٱلَّيۡلِ وَهُمۡ يَسۡجُدُونَ 113يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَيَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَيُسَٰرِعُونَ فِي ٱلۡخَيۡرَٰتِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ 114وَمَا يَفۡعَلُواْ مِنۡ خَيۡرٖ فَلَن يُكۡفَرُوهُۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلۡمُتَّقِينَ115

मुनाफ़िक़ों के विरुद्ध चेतावनी

116निस्संदेह, काफ़िरों का धन और उनकी संतान अल्लाह के विरुद्ध उनके कुछ काम नहीं आएगी। वे ही आग वाले होंगे। वे उसमें सदैव रहेंगे। 117इस दुनिया में वे जो भलाई करते हैं, वह उन लोगों की खेती के समान है जिन्होंने स्वयं पर अत्याचार किया, जिसे एक तेज़ सर्द हवा ने आ घेरा और उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया। अल्लाह ने उन पर कभी ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि उन्होंने स्वयं पर ज़ुल्म किया। 118ऐ ईमान वालो! ऐसे लोगों को अपना राज़दार न बनाओ जो तुम्हें नुक़सान पहुँचाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। वे तो बस तुम्हें कष्ट में देखना चाहते हैं। तुम्हारे प्रति उनकी घृणा उनके मुँह से ज़ाहिर हो चुकी है, और जो उनके दिल छिपाते हैं वह कहीं अधिक बुरा है। हमने अपनी आयतें तुम्हारे लिए स्पष्ट कर दी हैं, यदि तुम समझते हो। 119तुम तो ऐसे हो कि तुम उनसे मुहब्बत करते हो लेकिन वे तुमसे मुहब्बत नहीं करते, और तुम सभी किताबों पर ईमान रखते हो। जब वे तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं, "हम भी ईमान लाए।" लेकिन जब वे अकेले होते हैं, तो क्रोध से अपनी उंगलियों के पोर चबाते हैं। कहो, "अपने क्रोध में ही मर जाओ!" निस्संदेह, अल्लाह दिलों में छिपी हर बात को खूब जानता है। 120जब तुम्हें कोई भलाई पहुँचती है, तो उन्हें बुरा लगता है। लेकिन जब तुम्हें कोई मुसीबत पहुँचती है, तो वे खुश होते हैं। लेकिन अगर तुम सब्र करो और तक़वा इख्तियार करो, तो उनकी कोई भी चाल तुम्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचाएगी। निस्संदेह, अल्लाह उनके सभी कामों को खूब जानता है।
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَن تُغۡنِيَ عَنۡهُمۡ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَلَآ أَوۡلَٰدُهُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيۡ‍ٔٗاۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ 116مَثَلُ مَا يُنفِقُونَ فِي هَٰذِهِ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا كَمَثَلِ رِيحٖ فِيهَا صِرٌّ أَصَابَتۡ حَرۡثَ قَوۡمٖ ظَلَمُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ فَأَهۡلَكَتۡهُۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَٰكِنۡ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ 117يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُواْ بِطَانَةٗ مِّن دُونِكُمۡ لَا يَأۡلُونَكُمۡ خَبَالٗا وَدُّواْ مَا عَنِتُّمۡ قَدۡ بَدَتِ ٱلۡبَغۡضَآءُ مِنۡ أَفۡوَٰهِهِمۡ وَمَا تُخۡفِي صُدُورُهُمۡ أَكۡبَرُۚ قَدۡ بَيَّنَّا لَكُمُ ٱلۡأٓيَٰتِۖ إِن كُنتُمۡ تَعۡقِلُونَ 118هَٰٓأَنتُمۡ أُوْلَآءِ تُحِبُّونَهُمۡ وَلَا يُحِبُّونَكُمۡ وَتُؤۡمِنُونَ بِٱلۡكِتَٰبِ كُلِّهِۦ وَإِذَا لَقُوكُمۡ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوۡاْ عَضُّواْ عَلَيۡكُمُ ٱلۡأَنَامِلَ مِنَ ٱلۡغَيۡظِۚ قُلۡ مُوتُواْ بِغَيۡظِكُمۡۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ 119إِن تَمۡسَسۡكُمۡ حَسَنَةٞ تَسُؤۡهُمۡ وَإِن تُصِبۡكُمۡ سَيِّئَةٞ يَفۡرَحُواْ بِهَاۖ وَإِن تَصۡبِرُواْ وَتَتَّقُواْ لَا يَضُرُّكُمۡ كَيۡدُهُمۡ شَيۡ‍ًٔاۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا يَعۡمَلُونَ مُحِيط120
BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • इमाम इब्न हिशाम के अनुसार, हिजरत के दूसरे वर्ष में बदर में मक्का की सेना को एक छोटी मुस्लिम सेना ने बुरी तरह हराया था। एक साल बाद, मक्कावासी 3,700 सैनिकों की सेना के साथ बदला लेने के लिए वापस आए। पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों से पूछा कि क्या उन्हें मक्कावासियों के मदीना पहुँचने का इंतजार करना चाहिए या उनसे बाहर मिलना चाहिए। उन्होंने उहुद पहाड़ के पास शहर के बाहर लड़ने का फैसला किया। उहुद जाते समय, इब्न सलूल (एक प्रमुख कपटी) ने लड़ाई में शामिल होने से इनकार कर दिया और 300 सैनिकों के साथ मदीना लौट आया। इस प्रकार, मुस्लिम सेना में केवल 750 लड़ाके बचे थे।

  • लड़ाई से पहले, पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने 50 तीरंदाजों को एक पहाड़ी पर तैनात किया और उनसे कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे अपनी जगह से न हटें। शुरुआत में, मुसलमान जीत रहे थे और मक्कावासी भागने लगे थे। तीरंदाजों ने सोचा कि लड़ाई खत्म हो गई है, इसलिए वे अपनी स्थिति बनाए रखने के बारे में बहस करने लगे। अंततः, उनमें से अधिकांश युद्ध की लूट इकट्ठा करने के लिए नीचे आ गए, जिससे मुस्लिम सेना असुरक्षित रह गई। खालिद इब्न अल-वलीद (जो उस समय मुसलमान नहीं थे) ने अपनी टुकड़ियों के साथ पहाड़ी के चारों ओर घूमकर और पीछे से मुस्लिम सेना पर अचानक हमला करके उनकी इस भयानक गलती का फायदा उठाया।

  • मुस्लिम सैनिक पूरी तरह सदमे में थे। अधिकांश साथी भाग गए, केवल कुछ ही पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की अपनी जान देकर रक्षा करने के लिए बचे। पैगंबर स्वयं घायल हो गए थे, और यह अफवाह तेजी से फैल गई कि उनकी मृत्यु हो गई है। इस लड़ाई में लगभग 70 साथी मारे गए, जिनमें अनस इब्न अन-नद्र भी शामिल थे, जिन्हें अकेले अपने पूरे शरीर पर 80 से अधिक घाव लगे थे। पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने चाचा हमजा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को भी खो दिया। जहाँ तक मक्कावासियों का सवाल है, उन्होंने केवल 24 सैनिक खोए। इस प्रकार, जो मुसलमानों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में शुरू हुआ था, वह उनके लिए एक पूर्ण आपदा में समाप्त हुआ।

  • जब मक्कावासी चले गए, तब भी मुसीबत खत्म नहीं हुई थी। बदर में मुस्लिम सेना ने जो महान प्रतिष्ठा हासिल की थी, वह उहुद में पूरी तरह से बिखर गई। अब मुसलमानों को इस हार के भयानक परिणामों से निपटना था। उदाहरण के लिए, अगले महीनों में, कुछ जनजातियों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि मुस्लिम समुदाय कमजोर हो गया है, इसलिए उन्होंने मदीना पर हमलों की तैयारी शुरू कर दी। यही कारण है कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को उन जनजातियों को शहर तक पहुँचने से रोकने और उन लोगों को दंडित करने के लिए अभियान चलाने पड़े जिन्होंने कुछ मुसलमानों पर हमला किया और उन्हें मार डाला।

  • Illustration
  • निम्नलिखित आयतें विश्वासियों को सांत्वना देने और उन्हें ये महत्वपूर्ण सबक सिखाने के लिए अवतरित हुईं:

  • फ़तह केवल अल्लाह की ओर से आती है।

  • नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की इताअत की जानी चाहिए।

  • महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले जानकार लोगों से उनकी राय लेनी चाहिए।

  • गलतियाँ होती हैं, लेकिन हमें उनसे सीखना चाहिए।

  • अल्लाह बहुत मेहरबान और बख्शने वाला है।

  • नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मोमिनों पर मेहरबान हैं।

  • भलाई और बुराई के बीच एक जंग है। आखिर में भलाई हमेशा जीतती है।

  • ज़िंदगी आज़माइशों से भरपूर है।

  • आज़माइशें हमें दिखाती हैं कि ईमान में कौन सचमुच मज़बूत है या कमज़ोर है।

  • मुनाफ़िक़ीन मुस्लिम समुदाय के लिए एक ख़तरा हैं।

  • 11. त्याग के बिना सफलता संभव नहीं है।

  • 12. किसी की मृत्यु उसके लिए निर्धारित समय से पहले या बाद में नहीं होती।

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • कोई पूछ सकता है, "इस भयानक हार के बाद पैगंबर (PBUH) ने कैसी प्रतिक्रिया दी?" ईमानदारी से कहूँ तो, अगर कोई और नेता होता, तो वह निश्चित रूप से इस आपदा के लिए तीरंदाजों को डांटता, दोषी ठहराता या दंडित भी करता। लेकिन पैगंबर (PBUH) ने ऐसा कुछ नहीं किया। आश्चर्यजनक रूप से, मक्कावासियों के चले जाने के बाद, उन्होंने अपने साथियों (जिनमें घायल भी शामिल थे) से कहा, "पंक्तिबद्ध हो जाओ ताकि मैं अपने रब की प्रशंसा कर सकूँ!" फिर उन्होंने एक भावुक प्रार्थना की।

  • उनकी भावुक प्रार्थना में कही गई कुछ बातें निम्नलिखित हैं, जिन्हें इमाम अल-बुखारी ने अपनी पुस्तक अल-अदब अल-मुफ़रद में वर्णित किया है:

  • • या अल्लाह! सारी प्रशंसा केवल तेरे लिए है।

  • • या अल्लाह! कोई भी उन बरकतों को जारी नहीं कर सकता जिन्हें तू रोक लेता है, और कोई भी उन बरकतों को रोक नहीं सकता जिन्हें तू जारी करता है।

  • • या अल्लाह! हम पर अपनी बरकतें, रहमतें, फज़ल और मदद के सभी ज़रीये बरसा दे।

  • ऐ अल्लाह! मैं तुझसे ऐसी हमेशा रहने वाली बरकतें माँगता हूँ जो न बदलें और न समाप्त हों।

  • ऐ अल्लाह! मैं तुझसे ज़रूरत के दिन बरकतें और खौफ के दिन अमन माँगता हूँ।

  • ऐ अल्लाह! हमें ईमान से मोहब्बत अता फरमा और उसे हमारे दिलों में खूबसूरत बना दे। और हमें कुफ्र, फ़ुसूक और नाफरमानी से नफरत करा दे। और हमें हिदायत पाने वालों में से बना दे।

  • ऐ अल्लाह! हमें इस्लाम पर ज़िंदा रख और इस्लाम पर ही मौत दे, और हमें मोमिनों के साथ मिला दे, इस हाल में कि हम न रुसवा हों और न आज़माइश में नाकाम हों।

  • ऐ अल्लाह! उन काफिरों से मुकाबला कर जो तेरे रसूलों को झुठलाते हैं और दूसरों को तेरी राह से रोकते हैं। ऐ हक़ के रब!

  • आयत १५९ में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मोमिनों के प्रति दयालु और सौम्य व्यवहार की प्रशंसा की गई है। वे अपने शत्रुओं के प्रति भी दयालु थे, जिनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने उनसे युद्ध किया था।

  • यह जानकर आश्चर्य होता है कि उहुद में मक्का की सेना के कई नेताओं ने अंततः इस्लाम कबूल कर लिया, जिनमें खालिद इब्न अल-वलीद, अबू सुफियान, इकरिमा इब्न अबी जहल और सफवान इब्न उमय्या शामिल थे। इतना ही नहीं, इस्लाम स्वीकार करने के बाद उनके कुछ पूर्व शत्रु अपने प्राणों की बाजी लगाकर उनकी रक्षा करने के लिए तैयार थे।

उहुद का युद्ध

121याद करो, हे पैगंबर, जब तुम सुबह सवेरे अपने घर से निकले थे ताकि मोमिनों को युद्ध के मैदान में मोर्चाबंदी करने के लिए तैयार कर सको। और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है। 122याद करो, जब तुम मोमिनों में से दो गिरोह हिम्मत हारने वाले थे, लेकिन अल्लाह ने उनकी रक्षा की। तो मोमिनों को अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए।
وَإِذۡ غَدَوۡتَ مِنۡ أَهۡلِكَ تُبَوِّئُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ مَقَٰعِدَ لِلۡقِتَالِۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ 121إِذۡ هَمَّت طَّآئِفَتَانِ مِنكُمۡ أَن تَفۡشَلَا وَٱللَّهُ وَلِيُّهُمَاۗ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ122

बद्र का युद्ध

123अल्लाह ने तुम्हें बदर में पहले ही विजय दी थी, जबकि तुम बेबस थे। तो अल्लाह को याद रखो, शायद तुम शुक्रगुज़ार हो जाओ। 124'याद करो, ऐ पैग़म्बर,' जब तुमने मोमिनों से कहा था, "क्या तुम्हें संतोष नहीं होगा यदि तुम्हारा रब तुम्हारी सहायता के लिए तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारे?" 125हाँ, ज़रूर! अब, यदि तुम 'मोमिनों' धैर्य रखो और अल्लाह को याद रखो और वे दुश्मन तुम पर अचानक हमला करें, तो अल्लाह तुम्हारी सहायता पाँच हज़ार फ़रिश्तों से करेगा जो 'युद्ध के लिए' नियुक्त होंगे। 126अल्लाह ने यह सहायता 'केवल तुम्हारे लिए शुभ समाचार' और तुम्हारे दिलों के लिए सुकून बनाई। विजय केवल अल्लाह की ओर से आती है - जो सर्वशक्तिमान और प्रज्ञ है। 127काफ़िरों के एक हिस्से को तबाह करने और बाक़ी को अपमानित करने के लिए, जिससे वे निराशा में पीछे हटें।
وَلَقَدۡ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ بِبَدۡرٖ وَأَنتُمۡ أَذِلَّةٞۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ 123إِذۡ تَقُولُ لِلۡمُؤۡمِنِينَ أَلَن يَكۡفِيَكُمۡ أَن يُمِدَّكُمۡ رَبُّكُم بِثَلَٰثَةِ ءَالَٰفٖ مِّنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ مُنزَلِينَ 124بَلَىٰٓۚ إِن تَصۡبِرُواْ وَتَتَّقُواْ وَيَأۡتُوكُم مِّن فَوۡرِهِمۡ هَٰذَا يُمۡدِدۡكُمۡ رَبُّكُم بِخَمۡسَةِ ءَالَٰفٖ مِّنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ مُسَوِّمِينَ 125وَمَا جَعَلَهُ ٱللَّهُ إِلَّا بُشۡرَىٰ لَكُمۡ وَلِتَطۡمَئِنَّ قُلُوبُكُم بِهِۦۗ وَمَا ٱلنَّصۡرُ إِلَّا مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ ٱلۡعَزِيزِ ٱلۡحَكِيمِ 126لِيَقۡطَعَ طَرَفٗا مِّنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ أَوۡ يَكۡبِتَهُمۡ فَيَنقَلِبُواْ خَآئِبِينَ127

मक्का के दुश्मनों का अंजाम

128ऐ पैगंबर, इस मामले में आपका कोई अख्तियार नहीं है। यह अल्लाह का काम है कि वह उन पर रहम करे या उन्हें अज़ाब दे - वे बेशक ज़ालिम हैं। 129जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, वह अल्लाह ही का है। वह जिसे चाहता है बख्श देता है और जिसे चाहता है अज़ाब देता है। और अल्लाह बख्शने वाला, निहायत मेहरबान है।
لَيۡسَ لَكَ مِنَ ٱلۡأَمۡرِ شَيۡءٌ أَوۡ يَتُوبَ عَلَيۡهِمۡ أَوۡ يُعَذِّبَهُمۡ فَإِنَّهُمۡ ظَٰلِمُونَ 128وَلِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ يَغۡفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ129