Abraham
إِبْرَاهِيم
ابراہیم
Surah Ibrâhîm for kids content

ज्ञान की बातें
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आयत 27 में, अल्लाह ईमान के मज़बूत कलिमे 'ला इलाहा इल्लल्लाह' ('अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं') के बारे में बात करते हैं।
हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि वही एकमात्र ईश्वर है जो हमारी इबादत के लायक है।
यह हमारे दिलों में स्थापित होना चाहिए और हमारे कार्यों में झलकना चाहिए।
यह कलिमा जन्नत की कुंजी है।
लेकिन चाबियों के दाँत होते हैं।
एक दाँत नमाज़ है, दूसरा दाँत ज़कात है, और तीसरा रोज़ा है, और इसी तरह।
ईमान का कलिमा
27अल्लाह ईमान वालों को दुनिया के जीवन में और आख़िरत में सुदृढ़ बात के साथ जमाए रखता है।
लेकिन अल्लाह ज़ालिमों को भटकने देता है।
अल्लाह जो चाहता है, करता है।
يُثَبِّتُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱلۡقَوۡلِ ٱلثَّابِتِ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِۖ وَيُضِلُّ ٱللَّهُ ٱلظَّٰلِمِينَۚ وَيَفۡعَلُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ27
नाशुक्रों के लिए अज़ाब
28क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते और अपनी कौम को तबाही की तरफ धकेलते हैं?
29वे जहन्नम में जलेंगे।
वह ठहरने के लिए कितनी बुरी जगह है।
30वे अल्लाह के शरीक ठहराते हैं ताकि दूसरों को उसकी राह से भटकाएँ।
कहो, 'ऐ पैगंबर,' 'मजे कर लो!
बेशक तुम्हारा ठिकाना आग है।
'
۞ أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ بَدَّلُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ كُفۡرٗا وَأَحَلُّواْ قَوۡمَهُمۡ دَارَ ٱلۡبَوَارِ28
جَهَنَّمَ يَصۡلَوۡنَهَاۖ وَبِئۡسَ ٱلۡقَرَارُ29
وَجَعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا لِّيُضِلُّواْ عَن سَبِيلِهِۦۗ قُلۡ تَمَتَّعُواْ فَإِنَّ مَصِيرَكُمۡ إِلَى ٱلنَّارِ30
नबी को आदेश
31मेरे ईमान वाले बन्दों से कहो कि वे नमाज़ क़ायम करें और उसमें से ख़र्च करें जो हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है, गुप्त रूप से और खुले तौर
पर, उस दिन के आने से पहले जब न कोई ख़रीद-फ़रोख़्त होगी और न कोई दोस्ती।
قُل لِّعِبَادِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ يُقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُنفِقُواْ مِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ سِرّٗا وَعَلَانِيَةٗ مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا بَيۡعٞ فِيهِ وَلَا خِلَٰلٌ31
अल्लाह की नेमतें
32अल्लाह ही वह है जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और आकाश से पानी बरसाया, जिससे तुम्हारे भोजन के लिए फल उगते हैं।
उसने जहाजों को तुम्हारी सेवा में लगा दिया है जो उसके आदेश से समुद्र में चलते हैं।
और उसने नदियों को भी इसी तरह (तुम्हारी सेवा में) लगा दिया है।
33उसने सूरज और चाँद को भी तुम्हारी सेवा में लगा दिया है, दोनों हमेशा परिक्रमा करते रहते हैं।
और उसने दिन और रात को भी इसी तरह (तुम्हारी सेवा में) लगा दिया है।
34और उसने तुम्हें वह सब कुछ दिया है जो तुमने उससे माँगा।
यदि तुम अल्लाह की नेमतों को गिनने का प्रयास करो, तो तुम उन्हें कभी गिन नहीं पाओगे।
मनुष्य वास्तव में बड़ा ज़ालिम, अत्यंत नाशुकरा है।
¹
ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلۡفُلۡكَ لِتَجۡرِيَ فِي ٱلۡبَحۡرِ بِأَمۡرِهِۦۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلۡأَنۡهَٰرَ32
وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ دَآئِبَيۡنِۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيۡلَ وَٱلنَّهَارَ33
وَءَاتَىٰكُم مِّن كُلِّ مَا سَأَلۡتُمُوهُۚ وَإِن تَعُدُّواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ لَا تُحۡصُوهَآۗ إِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ لَظَلُومٞ كَفَّارٞ34
मक्का में इब्राहीम की दुआएँ
35और (उस वक़्त को) याद करो जब इब्राहीम ने दुआ की, 'ऐ मेरे रब!
इस शहर (मक्का) को अमन वाला बना दे और मुझे और मेरी औलाद को बुतों की पूजा से दूर रख।
36ऐ मेरे रब!
उन्होंने बहुत से लोगों को गुमराह किया है।
तो जो मेरा पैरवी करेगा, वह मेरे साथ है, और जो मेरी नाफ़रमानी करेगा, तो बेशक तू बहुत बख्शने वाला, निहायत मेहरबान है।
37ऐ हमारे रब!
मैंने अपनी कुछ औलाद को एक बे-आब-ओ-ग़ास वादी में, तेरे मुकद्दस घर के पास बसाया है, ऐ हमारे रब, ताकि वे नमाज़ क़ायम करें।
तो कुछ ईमान वाले लोगों के दिलों को उनकी तरफ़ माइल कर दे और उन्हें फलों से रोज़ी दे, ताकि वे शुक्रगुज़ार हों।
38ऐ हमारे रब!
तू यक़ीनन जानता है जो हम छिपाते हैं और जो हम ज़ाहिर करते हैं।
अल्लाह से ज़मीन में और आसमान में कोई चीज़ छिपी हुई नहीं है।
39सब तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जिसने मुझे मेरे बुढ़ापे में इस्माईल और इस्हाक़ अता किए।
बेशक मेरा रब दुआओं को सुनने वाला है।
40ऐ मेरे रब!
मुझे नमाज़ क़ायम करने वाला बना, और मेरी औलाद में से भी जो ईमान वाले हों।
ऐ हमारे रब!
मेरी दुआएँ क़ुबूल फ़रमा।
41ऐ हमारे रब!
मुझे, मेरे वालिदैन को और तमाम मोमिनों को उस दिन बख़्श दे जिस दिन हिसाब क़ायम होगा।
وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِيمُ رَبِّ ٱجۡعَلۡ هَٰذَا ٱلۡبَلَدَ ءَامِنٗا وَٱجۡنُبۡنِي وَبَنِيَّ أَن نَّعۡبُدَ ٱلۡأَصۡنَامَ35
رَبِّ إِنَّهُنَّ أَضۡلَلۡنَ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلنَّاسِۖ فَمَن تَبِعَنِي فَإِنَّهُۥ مِنِّيۖ وَمَنۡ عَصَانِي فَإِنَّكَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ36
رَّبَّنَآ إِنِّيٓ أَسۡكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيۡرِ ذِي زَرۡعٍ عِندَ بَيۡتِكَ ٱلۡمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱجۡعَلۡ أَفِۡٔدَةٗ مِّنَ ٱلنَّاسِ تَهۡوِيٓ إِلَيۡهِمۡ وَٱرۡزُقۡهُم مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمۡ يَشۡكُرُونَ37
رَبَّنَآ إِنَّكَ تَعۡلَمُ مَا نُخۡفِي وَمَا نُعۡلِنُۗ وَمَا يَخۡفَىٰ عَلَى ٱللَّهِ مِن شَيۡءٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا فِي ٱلسَّمَآءِ38
ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ ٱلَّذِي وَهَبَ لِي عَلَى ٱلۡكِبَرِ إِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَۚ إِنَّ رَبِّي لَسَمِيعُ ٱلدُّعَآءِ39
رَبِّ ٱجۡعَلۡنِي مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِيۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلۡ دُعَآءِ40
رَبَّنَا ٱغۡفِرۡ لِي وَلِوَٰلِدَيَّ وَلِلۡمُؤۡمِنِينَ يَوۡمَ يَقُومُ ٱلۡحِسَابُ41

दुष्टों को चेतावनी
42ऐ नबी, यह मत समझना कि अल्लाह उन कामों से बेखबर है जो अत्याचारी करते हैं।
वह उन्हें केवल उस दिन तक मोहलत देता है जब उनकी आँखें खौफ से फटी रह जाएँगी–
43सीधे दौड़ते हुए, सिर ऊपर उठाए हुए, पलकें न झपकाते हुए, दिल दहशत से थरथराते हुए।
44और लोगों को उस दिन से आगाह करो जब उनमें से अत्याचारियों पर अज़ाब आएगा, और जिन्होंने ज़ुल्म किया होगा वे पुकारेंगे, 'हमारे रब!
हमें थोड़ी और मोहलत दे दे, हम तेरी पुकार का जवाब देंगे और रसूलों का पालन करेंगे!
' उनसे कहा जाएगा, 'क्या तुमने पहले कसम नहीं खाई थी कि तुम्हें कभी परलोक में नहीं उठाया जाएगा?
'
45तुम उन तबाह हुई कौमों के खंडहरों से गुज़रे जिन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया था।
² तुम्हें यह स्पष्ट किया गया था कि हमने उनके साथ कैसा सलूक किया, और हमने तुम्हें बहुत सी मिसालें दीं।
46उन्होंने हर बुरा षड्यंत्र रचा, जो अल्लाह को भली-भाँति मालूम था, लेकिन उनका षड्यंत्र इतना कमज़ोर था कि पहाड़ों को भी नहीं हिला सकता था।
³
وَلَا تَحۡسَبَنَّ ٱللَّهَ غَٰفِلًا عَمَّا يَعۡمَلُ ٱلظَّٰلِمُونَۚ إِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمۡ لِيَوۡمٖ تَشۡخَصُ فِيهِ ٱلۡأَبۡصَٰرُ42
مُهۡطِعِينَ مُقۡنِعِي رُءُوسِهِمۡ لَا يَرۡتَدُّ إِلَيۡهِمۡ طَرۡفُهُمۡۖ وَأَفِۡٔدَتُهُمۡ هَوَآء43
وَأَنذِرِ ٱلنَّاسَ يَوۡمَ يَأۡتِيهِمُ ٱلۡعَذَابُ فَيَقُولُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ رَبَّنَآ أَخِّرۡنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٖ قَرِيبٖ نُّجِبۡ دَعۡوَتَكَ وَنَتَّبِعِ ٱلرُّسُلَۗ أَوَ لَمۡ تَكُونُوٓاْ أَقۡسَمۡتُم مِّن قَبۡلُ مَا لَكُم مِّن زَوَالٖ44
وَسَكَنتُمۡ فِي مَسَٰكِنِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ وَتَبَيَّنَ لَكُمۡ كَيۡفَ فَعَلۡنَا بِهِمۡ وَضَرَبۡنَا لَكُمُ ٱلۡأَمۡثَالَ45
وَقَدۡ مَكَرُواْ مَكۡرَهُمۡ وَعِندَ ٱللَّهِ مَكۡرُهُمۡ وَإِن كَانَ مَكۡرُهُمۡ لِتَزُولَ مِنۡهُ ٱلۡجِبَالُ46
गुनाहगारों का अज़ाब
47अतः तुम यह न समझो (हे नबी) कि अल्लाह अपने रसूलों से किया अपना वादा नहीं निभाएगा।
निःसंदेह अल्लाह ज़बरदस्त शक्ति वाला है, दंड देने में सक्षम है।
48उस दिन का ध्यान रखो जब धरती बदल कर दूसरी धरती हो जाएगी, और आकाश भी।
सब अल्लाह के सामने उपस्थित होंगे, जो एक और सर्वोपरि है।
49उस दिन तुम अपराधियों को ज़ंजीरों में जकड़े हुए देखोगे,
50उनके वस्त्र तारकोल के होंगे, और उनके चेहरों को आग की लपटें घेरे होंगी।
51इस प्रकार अल्लाह हर जान को उसके किए का बदला देगा।
निःसंदेह अल्लाह हिसाब लेने में तेज़ है।
فَلَا تَحۡسَبَنَّ ٱللَّهَ مُخۡلِفَ وَعۡدِهِۦ رُسُلَهُۥٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٞ ذُو ٱنتِقَامٖ47
يَوۡمَ تُبَدَّلُ ٱلۡأَرۡضُ غَيۡرَ ٱلۡأَرۡضِ وَٱلسَّمَٰوَٰتُۖ وَبَرَزُواْ لِلَّهِ ٱلۡوَٰحِدِ ٱلۡقَهَّارِ48
وَتَرَى ٱلۡمُجۡرِمِينَ يَوۡمَئِذٖ مُّقَرَّنِينَ فِي ٱلۡأَصۡفَادِ49
سَرَابِيلُهُم مِّن قَطِرَانٖ وَتَغۡشَىٰ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ50
لِيَجۡزِيَ ٱللَّهُ كُلَّ نَفۡسٖ مَّا كَسَبَتۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ51
सार्वभौमिक संदेश
52यह क़ुरआन समस्त मानवजाति के लिए एक संदेश है, ताकि वे इससे चेतावनी प्राप्त करें, यह जान लें कि केवल एक ही ईश्वर है, और जो वास्तव में
समझते हैं वे इसे ध्यान में रखें।
هَٰذَا بَلَٰغٞ لِّلنَّاسِ وَلِيُنذَرُواْ بِهِۦ وَلِيَعۡلَمُوٓاْ أَنَّمَا هُوَ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞ وَلِيَذَّكَّرَ أُوْلُواْ ٱلۡأَلۡبَٰبِ52
How to study Surah Ibrâhîm with children
Use this children's lesson as a guided path: read the short explanation, look at the Arabic verse, listen to related recitation, and return to the full surah when your child is ready for more detail.
Parents can review one section at a time, ask the child to repeat the main idea, and then continue with the next part or a nearby surah. This keeps the lesson connected with Quran reading, audio, and daily practice.