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Surah Al-Qaṣaṣ for kids content
मक्कावासियों ने कुरान को अस्वीकार किया
48परन्तु जब उनके पास हमारी ओर से सत्य आया, तो वे कहने लगे, "इसे वह क्यों नहीं मिला जो मूसा को मिला था?
" क्या उन्होंने पहले ही मूसा को जो कुछ मिला था, उसका इनकार नहीं किया था?
उन्होंने कहा, "ये दोनों 'किताबें' तो बस जादू हैं, जो एक-दूसरे की पुष्टि करती हैं," और, "हम निश्चित रूप से दोनों का इनकार करते हैं।
"
49कहो, "तो अल्लाह की ओर से एक ऐसी किताब लाओ जो इन दोनों से अधिक उत्तम मार्गदर्शक हो, ताकि मैं उसका अनुसरण करूँ, यदि तुम सच्चे हो।
"
50तो यदि वे तुम्हारी बात का उत्तर न दें, तो जान लो कि वे केवल अपनी इच्छाओं का पालन करते हैं।
और उससे बढ़कर गुमराह कौन हो सकता है जो अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छाओं का अनुसरण करे?
निःसंदेह अल्लाह ज़ालिमों को मार्ग नहीं दिखाता।
فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ مِنۡ عِندِنَا قَالُواْ لَوۡلَآ أُوتِيَ مِثۡلَ مَآ أُوتِيَ مُوسَىٰٓۚ أَوَ لَمۡ يَكۡفُرُواْ بِمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ مِن قَبۡلُۖ قَالُواْ سِحۡرَانِ تَظَٰهَرَا وَقَالُوٓاْ إِنَّا بِكُلّٖ كَٰفِرُونَ48
قُلۡ فَأۡتُواْ بِكِتَٰبٖ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ هُوَ أَهۡدَىٰ مِنۡهُمَآ أَتَّبِعۡهُ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ49
فَإِن لَّمۡ يَسۡتَجِيبُواْ لَكَ فَٱعۡلَمۡ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهۡوَآءَهُمۡۚ وَمَنۡ أَضَلُّ مِمَّنِ ٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ بِغَيۡرِ هُدٗى مِّنَ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ50
ईमानदार अहले किताब
51निश्चित रूप से, हमने उन मक्कावासियों के पास कलाम भेजा है ताकि वे नसीहत हासिल करें।
52जिनको हमने इस 'कुरान' से पहले किताब अता की थी, वे इस पर ईमान लाते हैं।
53जब यह उन्हें पढ़कर सुनाया जाता है, तो वे कहते हैं, "हम इस पर ईमान रखते हैं।
यह निश्चित रूप से हमारे रब की ओर से सत्य है।
हम तो इससे पहले ही इस्लाम कबूल कर चुके थे।
"
54इन 'ईमानवालों' को दोहरा सवाब मिलेगा सब्र करने के लिए, बुराई का जवाब भलाई से देने के लिए, और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है उसमें से
खर्च करने के लिए।
55जब वे अपमानजनक बातें सुनते हैं, तो वे उनसे मुँह मोड़ लेते हैं, यह कहते हुए, "हमारे आमाल हमारे लिए हैं और तुम्हारे आमाल तुम्हारे लिए हैं।
हम तुम्हें सलाम करते हैं।
हम जाहिलों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते।
"
وَلَقَدۡ وَصَّلۡنَا لَهُمُ ٱلۡقَوۡلَ لَعَلَّهُمۡ يَتَذَكَّرُونَ51
ٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ مِن قَبۡلِهِۦ هُم بِهِۦ يُؤۡمِنُونَ52
وَإِذَا يُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِهِۦٓ إِنَّهُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّنَآ إِنَّا كُنَّا مِن قَبۡلِهِۦ مُسۡلِمِينَ53
أُوْلَٰٓئِكَ يُؤۡتَوۡنَ أَجۡرَهُم مَّرَّتَيۡنِ بِمَا صَبَرُواْ وَيَدۡرَءُونَ بِٱلۡحَسَنَةِ ٱلسَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ54
وَإِذَا سَمِعُواْ ٱللَّغۡوَ أَعۡرَضُواْ عَنۡهُ وَقَالُواْ لَنَآ أَعۡمَٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَٰلُكُمۡ سَلَٰمٌ عَلَيۡكُمۡ لَا نَبۡتَغِي ٱلۡجَٰهِلِينَ55

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
यह बताया जाता है कि पैगंबर के चाचा अबू तालिब अपनी मृत्यु शय्या पर थे जब पैगंबर अंतिम बार उन्हें इस्लाम पेश करने आए।
कमरे में कुछ लोग मौजूद थे, जिनमें अबू जहल भी था, जो इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक था।
पैगंबर ने कहा, "मेरे प्यारे चाचा!
कृपया 'ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है)' कहिए ताकि मैं क़यामत के दिन आपकी शिफ़ाअत (सिफारिश) कर सकूँ।
" हालांकि, अबू जहल ने अबू तालिब पर दबाव डाला, यह कहते हुए, "क्या आप अपने पूर्वजों के धर्म को त्याग देंगे?
" तो अबू तालिब ने पैगंबर से कहा, "काश मैं इसे कह पाता, लेकिन मैं नहीं चाहता कि लोग कहें कि उसने ऐसा सिर्फ मौत के डर से
किया।
" पैगंबर बहुत दुखी हुए कि उनके चाचा इस्लाम स्वीकार किए बिना ही दुनिया से चले गए।
आयत 56 (सूरह अल-क़सस की आयत 56) यह बताने के लिए अवतरित हुई कि उनका काम केवल संदेश पहुंचाना है - मार्गदर्शन केवल अल्लाह की ओर से आता
है।
{इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम} पैगंबर से उनके चाचा अब्बास ने पूछा, "ऐ अल्लाह के रसूल!
अबू तालिब ने हमेशा आपकी रक्षा की और आपका ख्याल रखा।
क्या आप क़यामत के दिन उन्हें कोई लाभ पहुंचा पाएंगे?
" पैगंबर ने जवाब दिया, "वह जहन्नम में एक उथली जगह पर होगा।
अगर मैं न होता, तो वह आग की गहराइयों में होता।
" {इमाम अल-बुखारी और इमाम मुस्लिम}

हिदायत अल्लाह ही की तरफ से है।
56आप (ऐ पैगंबर) निश्चित रूप से जिसे चाहें उसे हिदायत नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह ही है जो जिसे चाहता है हिदायत देता है।
और वही उन लोगों को भली-भांति जानता है जो हिदायत पाने के योग्य हैं।
إِنَّكَ لَا تَهۡدِي مَنۡ أَحۡبَبۡتَ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهۡدِي مَن يَشَآءُۚ وَهُوَ أَعۡلَمُ بِٱلۡمُهۡتَدِينَ56
मक्कावासियों के झूठे बहाने
57वे कहते हैं, "यदि हम आपके साथ सच्चे मार्गदर्शन का पालन करें तो हमें अपनी भूमि से अवश्य छीन लिया जाएगा।
" क्या हमने उनके लिए मक्का में एक सुरक्षित हरम स्थापित नहीं किया, जहाँ हमारी ओर से हर प्रकार के फल रोज़ी के तौर पर लाए जाते हैं?
लेकिन उनमें से अधिकतर इसे नहीं पहचानते।
58ज़रा सोचो, हमने कितनी ही बस्तियों को नष्ट कर दिया जो अपनी ऐशो-आराम की ज़िंदगी से बिगड़ गई थीं!
वे उनके घर हैं, जिनमें उनके बाद शायद ही कोई बसा हो।
अंत में हमने ही उनका वारिस बना।
59आपका रब किसी बस्ती को तबाह नहीं करेगा जब तक कि उसकी केंद्रीय बस्ती में एक रसूल न भेज दे जो उन्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाए।
और हम किसी बस्ती को तबाह नहीं करेंगे जब तक कि उसके निवासी निरंतर अन्याय न करते रहें।
وَقَالُوٓاْ إِن نَّتَّبِعِ ٱلۡهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفۡ مِنۡ أَرۡضِنَآۚ أَوَ لَمۡ نُمَكِّن لَّهُمۡ حَرَمًا ءَامِنٗا يُجۡبَىٰٓ إِلَيۡهِ ثَمَرَٰتُ كُلِّ شَيۡءٖ رِّزۡقٗا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ57
وَكَمۡ أَهۡلَكۡنَا مِن قَرۡيَةِۢ بَطِرَتۡ مَعِيشَتَهَاۖ فَتِلۡكَ مَسَٰكِنُهُمۡ لَمۡ تُسۡكَن مِّنۢ بَعۡدِهِمۡ إِلَّا قَلِيلٗاۖ وَكُنَّا نَحۡنُ ٱلۡوَٰرِثِينَ58
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهۡلِكَ ٱلۡقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبۡعَثَ فِيٓ أُمِّهَا رَسُولٗا يَتۡلُواْ عَلَيۡهِمۡ ءَايَٰتِنَاۚ وَمَا كُنَّا مُهۡلِكِي ٱلۡقُرَىٰٓ إِلَّا وَأَهۡلُهَا ظَٰلِمُونَ59
यह दुनिया या आख़िरत?
60तुम्हें जो कुछ भी भोग दिया गया है, वह तो बस इस सांसारिक जीवन का क्षणिक भोग और ऐश्वर्य है।
परन्तु जो अल्लाह के पास है, वह कहीं उत्तम और शाश्वत है।
तो क्या तुम फिर भी नहीं समझोगे?
61क्या वे जिन्हें हमने एक उत्तम वचन दिया है - जो वे पूरा होते देखेंगे - उन लोगों के समान हो सकते हैं जिन्हें हमने इस सांसारिक जीवन
के भोगों का आनंद लेने दिया है, परन्तु क़यामत के दिन यातना में जकड़ दिए जाएँगे?
وَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَيۡءٖ فَمَتَٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَزِينَتُهَاۚ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيۡرٞ وَأَبۡقَىٰٓۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ60
أَفَمَن وَعَدۡنَٰهُ وَعۡدًا حَسَنٗا فَهُوَ لَٰقِيهِ كَمَن مَّتَّعۡنَٰهُ مَتَٰعَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا ثُمَّ هُوَ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ مِنَ ٱلۡمُحۡضَرِينَ61
दुष्ट बर्बाद होंगे।
62और उस दिन का ध्यान रखो जब वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ हैं वे तुम्हारे 'झूठे पूज्य' जिन्हें तुम मेरा साझीदार बताते थे?
"
63वे 'गुमराह करने वाले' जिन पर वचन सिद्ध हो चुका होगा, कहेंगे, "ऐ हमारे रब!
ये हमारे अनुयायी हैं, हमने ही इन्हें गुमराह किया था।
हमने इन्हें गुमराह किया क्योंकि हम खुद गुमराह थे।
हम तेरे सामने इनसे अपनी बेज़ारी ज़ाहिर करते हैं।
ये हमारी इबादत नहीं करते थे।
"
64और काफ़िरों से कहा जाएगा, "अपने झूठे पूज्यों को मदद के लिए पुकारो।
" तो वे उन्हें पुकारेंगे, लेकिन वे कोई जवाब नहीं देंगे।
और वे अज़ाब देखेंगे, काश कि वे सीधे मार्ग पर होते!
65और उस दिन का ध्यान रखो जब वह उनसे पूछेगा, "तुमने रसूलों को क्या जवाब दिया था?
"
66उस दिन वे इतने स्तब्ध होंगे कि एक-दूसरे से जवाब भी नहीं पूछ पाएंगे।
67जो लोग तौबा करते हैं, ईमान लाते हैं और इस दुनिया में नेक अमल करते हैं, तो उम्मीद है कि वे फ़लाह पाने वालों में से होंगे।
وَيَوۡمَ يُنَادِيهِمۡ فَيَقُولُ أَيۡنَ شُرَكَآءِيَ ٱلَّذِينَ كُنتُمۡ تَزۡعُمُونَ62
قَالَ ٱلَّذِينَ حَقَّ عَلَيۡهِمُ ٱلۡقَوۡلُ رَبَّنَا هَٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ أَغۡوَيۡنَآ أَغۡوَيۡنَٰهُمۡ كَمَا غَوَيۡنَاۖ تَبَرَّأۡنَآ إِلَيۡكَۖ مَا كَانُوٓاْ إِيَّانَا يَعۡبُدُونَ63
وَقِيلَ ٱدۡعُواْ شُرَكَآءَكُمۡ فَدَعَوۡهُمۡ فَلَمۡ يَسۡتَجِيبُواْ لَهُمۡ وَرَأَوُاْ ٱلۡعَذَابَۚ لَوۡ أَنَّهُمۡ كَانُواْ يَهۡتَدُونَ64
وَيَوۡمَ يُنَادِيهِمۡ فَيَقُولُ مَاذَآ أَجَبۡتُمُ ٱلۡمُرۡسَلِينَ65
فَعَمِيَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَنۢبَآءُ يَوۡمَئِذٖ فَهُمۡ لَا يَتَسَآءَلُونَ66
فَأَمَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَٰلِحٗا فَعَسَىٰٓ أَن يَكُونَ مِنَ ٱلۡمُفۡلِحِينَ67
अल्लाह की शक्ति और ज्ञान
68आपका रब जो चाहता है पैदा करता है और चुनता है; चुनाव उनका नहीं है।
अल्लाह पाक है और बहुत ऊँचा है उन चीज़ों से जिन्हें वे उसका शरीक ठहराते हैं।
69और आपका रब जानता है जो उनके दिल छिपाते हैं और जो वे ज़ाहिर करते हैं।
70वही अल्लाह है।
उसके सिवा कोई माबूद नहीं।
इस दुनिया में और आख़िरत में सब तारीफ़ उसी के लिए है।
सब हुकूमत उसी की है।
और तुम सब उसी की तरफ़ लौटाए जाओगे।
وَرَبُّكَ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُ وَيَخۡتَارُۗ مَا كَانَ لَهُمُ ٱلۡخِيَرَةُۚ سُبۡحَٰنَ ٱللَّهِ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ68
وَرَبُّكَ يَعۡلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمۡ وَمَا يُعۡلِنُونَ69
وَهُوَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ لَهُ ٱلۡحَمۡدُ فِي ٱلۡأُولَىٰ وَٱلۡأٓخِرَةِۖ وَلَهُ ٱلۡحُكۡمُ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ70
अल्लाह की ताक़त और रहमत
71उनसे पूछो, 'ऐ पैगंबर', 'कल्पना करो यदि अल्लाह तुम्हारे लिए रात को क़यामत के दिन तक स्थायी कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन-सा ऐसा ईश्वर है जो
तुम्हें सूरज की रोशनी ला सकता है?
क्या तुम तब भी नहीं सुनोगे?
'
72उनसे यह भी पूछो, 'कल्पना करो यदि अल्लाह तुम्हारे लिए दिन को क़यामत के दिन तक स्थायी कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन-सा ऐसा ईश्वर है जो
तुम्हें आराम करने के लिए रात ला सकता है?
क्या तुम तब भी नहीं देखोगे?
'
73यह उसकी रहमत है कि उसने तुम्हारे लिए दिन और रात बनाए हैं ताकि तुम रात में आराम कर सको और दिन में उसका फ़ज़ल तलाश कर सको,
और शायद तुम शुक्रगुज़ार होगे।
قُلۡ أَرَءَيۡتُمۡ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمُ ٱلَّيۡلَ سَرۡمَدًا إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَٰمَةِ مَنۡ إِلَٰهٌ غَيۡرُ ٱللَّهِ يَأۡتِيكُم بِضِيَآءٍۚ أَفَلَا تَسۡمَعُونَ71
قُلۡ أَرَءَيۡتُمۡ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمُ ٱلنَّهَارَ سَرۡمَدًا إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَٰمَةِ مَنۡ إِلَٰهٌ غَيۡرُ ٱللَّهِ يَأۡتِيكُم بِلَيۡلٖ تَسۡكُنُونَ فِيهِۚ أَفَلَا تُبۡصِرُونَ72
وَمِن رَّحۡمَتِهِۦ جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيۡلَ وَٱلنَّهَارَ لِتَسۡكُنُواْ فِيهِ وَلِتَبۡتَغُواْ مِن فَضۡلِهِۦ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ73
मूर्ति पूजक शर्मसार हुए
74फिर उस दिन को याद करो जब वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ हैं वे झूठे देवता जिन्हें तुम मेरा शरीक ठहराते थे?
"
75और हम हर उम्मत में से एक गवाह लाएँगे और उन मूर्तिपूजकों से पूछेंगे, "अपनी दलील पेश करो।
" तब उन्हें एहसास होगा कि सत्य केवल अल्लाह के पास है।
और जो भी देवता उन्होंने गढ़ रखे थे, वे उन्हें निराश करेंगे।
وَيَوۡمَ يُنَادِيهِمۡ فَيَقُولُ أَيۡنَ شُرَكَآءِيَ ٱلَّذِينَ كُنتُمۡ تَزۡعُمُونَ74
وَنَزَعۡنَا مِن كُلِّ أُمَّةٖ شَهِيدٗا فَقُلۡنَا هَاتُواْ بُرۡهَٰنَكُمۡ فَعَلِمُوٓاْ أَنَّ ٱلۡحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ75


पृष्ठभूमि की कहानी
- •
क़ारून मूसा अलैहिस्सलाम का चचेरा भाई था।
वह फ़िरऔन के लिए काम करता था और उसके बहुत करीब था।
जब वह बहुत अमीर हो गया, तो उसने अपने ही लोगों के प्रति घमंड से पेश आना शुरू कर दिया।
मूसा अलैहिस्सलाम ने उससे कई बार अपने लोगों के गरीबों की मदद के लिए दान करने को कहा, लेकिन क़ारून ने इनकार कर दिया और यहाँ तक कि
मूसा अलैहिस्सलाम के लिए मुसीबतें खड़ी करना शुरू कर दिया।
क़ारून को सलाह दी गई थी कि वह इस दुनिया के सुखों का आनंद लेने और आख़िरत के लिए काम करने के बीच संतुलन बनाए रखे, लेकिन उसने
परवाह नहीं की।
उसने सोचा कि वह अपनी बुद्धिमत्ता के कारण अमीर हुआ है, अल्लाह की वजह से नहीं।
बहुत से लोग उसकी शानदार जीवनशैली से प्रभावित थे।
जहाँ तक उन लोगों का सवाल था जिन्हें ज्ञान से नवाज़ा गया था, वे उसकी दौलत को अल्लाह की ओर से एक परीक्षा मात्र समझते थे।
अंततः, क़ारून को उसके घमंड के कारण नष्ट कर दिया गया।
(इमाम इब्न कसीर और इमाम अल-क़ुर्तुबी)

ज्ञान की बातें
- •
जैसा कि हमने सूरह 102 में उल्लेख किया है, लोग कई अलग-अलग तरीकों से खुशी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
उनमें से अधिकांश सोचते हैं कि केवल पैसा ही उन्हें खुश कर सकता है।
कुछ को इस बात की परवाह नहीं होती कि उनका पैसा हलाल है या हराम, और न ही वे गरीबों की परवाह करते हैं।
इस्लाम में, बहुत सारा पैसा कमाने में कुछ भी गलत नहीं है।
कई सहाबा (पैगंबर के साथी) जिन्हें जन्नत (स्वर्ग) में जाने की खुशखबरी दी गई थी, वे धनी थे - जिनमें अबू बक्र, उस्मान और अब्दुर-रहमान इब्न 'औफ शामिल
थे।
पैसे के लिए एक आशीर्वाद होना, अभिशाप नहीं: इसे हलाल स्रोत से आना चाहिए, जैसे कि एक स्वीकार्य नौकरी या व्यवसाय।
यह व्यक्ति के लिए एक अच्छा जीवन जीना, अच्छे कपड़े, घर और कार खरीदना आसान बनाता है।
पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक आदमी को गंदे कपड़ों और दयनीय स्थिति में देखा।
उन्होंने आदमी से पूछा कि क्या उसके पास पैसा है, और आदमी ने जवाब दिया कि वह धनी है।
पैगंबर ने उससे कहा, "यदि अल्लाह तुम्हें धन से नवाज़ता है, तो उसकी नेमतें तुम पर दिखाई देनी चाहिए।
" {इमाम अहमद} व्यक्ति को ज़कात और सदक़ा देना चाहिए और पैसे का उपयोग अल्लाह को खुश करने के लिए करना चाहिए।
जब हम लोगों के प्रति उदार होते हैं, तो अल्लाह हमारे प्रति उदार होगा।
यह व्यक्ति को अहंकारी या अपमानजनक नहीं बनाना चाहिए।
यह व्यक्ति को नमाज़ पढ़ने और जीवन में महत्वपूर्ण काम करने से विचलित नहीं करना चाहिए।
- •
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पैसा ही सब कुछ नहीं है।
उदाहरण के लिए, पैसा हमें दवा खरीद सकता है, लेकिन अच्छा स्वास्थ्य नहीं।
यह एक बिस्तर खरीद सकता है, लेकिन नींद नहीं।
यह फैंसी चीजें खरीद सकता है, लेकिन खुशी नहीं।
यह बताता है कि क्यों कुछ करोड़पति दुखी होते हैं, और कुछ तो अपनी जान भी ले लेते हैं।
उनका जीवन गरीब है क्योंकि उनके पास केवल पैसा है।
कभी-कभी पैसा एक आशीर्वाद से अभिशाप में बदल जाता है जब लोग पैसे के लिए हत्या करते हैं, चोरी करते हैं, धोखा देते हैं और शर्मनाक काम करते
हैं।
कुछ लोग अपने पारिवारिक संबंधों को तोड़ देते हैं, अपने भाइयों और बहनों से लड़ते हैं, और पैसे के लिए उन्हें अदालत तक ले जाते हैं।
वे अपना जीवन बर्बाद करते हैं और केवल पैसे के लिए रिश्ते खराब करते हैं, जिसे वे मरने पर पीछे छोड़ जाएंगे।
पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा कि समय के अंत में, पृथ्वी सोने और चांदी के बड़े-बड़े टुकड़े बाहर निकालेगी।
एक हत्यारा इन टुकड़ों के पास से गुजरेगा और रोएगा, "मैंने इसके लिए हत्या की।
" वह व्यक्ति जिसने पारिवारिक संबंध तोड़े थे, वह पास से गुजरेगा और रोएगा, "मैंने इसके लिए अपने रिश्तेदारों की उपेक्षा की!
" एक चोर पास से गुजरेगा और कहेगा, "मैं इसके लिए मुसीबत में पड़ गया।
" फिर वे सभी उन टुकड़ों को वहीं पड़ा छोड़ देंगे और कुछ भी नहीं लेंगे।
{इमाम मुस्लिम} सूरह 43:32 में, अल्लाह हमें बताता है कि उसने लोगों को अलग-अलग तरीकों से नवाज़ा है ताकि वे एक-दूसरे की सेवा और मदद कर सकें।
उदाहरण के लिए, दंत चिकित्सक को अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए शिक्षक की आवश्यकता होती है।
शिक्षक को अपने बाल कटवाने के लिए नाई की आवश्यकता होती है।
नाई को अपने घर में पानी के पाइप ठीक करने के लिए प्लंबर की आवश्यकता होती है।
प्लंबर को बेकर की, बेकर को किसान की, किसान को दंत चिकित्सक की, और इसी तरह आवश्यकता होती है।
हम सभी को एक-दूसरे की आवश्यकता है, और हमें एक-दूसरे के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए।
भले ही आपको आज किसी की आवश्यकता न हो, आपको कल उनकी आवश्यकता हो सकती है।



छोटी कहानी
- •
वैल इब्न 'अम्र, जो यमनी राजाओं के एक लंबे वंश से थे, इस्लाम स्वीकार करने के लिए मदीना आए।
उनका सम्मान करने के लिए, पैगंबर ने उन्हें यमन में छोड़ी गई अपनी संपत्ति के बदले एक ज़मीन का टुकड़ा भेंट किया।
उन्होंने मुआविया इब्न अबी सुफयान से कहा कि वे वैल को उनकी नई ज़मीन तक पहुँचाएँ।
भले ही वैल ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था, लेकिन उन्हें यह भूलने में कुछ समय लगा कि वे कभी एक राजा थे।
वह गर्मी का एक गर्म दिन था और मुआविया इतने गरीब थे कि जूते नहीं खरीद सकते थे।
रास्ते में, उन्होंने वैल से पूछा कि क्या वे उनके साथ ऊँट पर सवारी कर सकते हैं, लेकिन वैल ने कहा, "नहीं!
तुम इतने लायक नहीं हो कि एक राजा के साथ ऊँट पर सवारी करो।
" मुआविया ने फिर पूछा, "कम से कम, क्या मुझे आपके जूते मिल सकते हैं?
" उन्होंने जवाब दिया, "नहीं!
तुम इतने लायक नहीं हो कि एक राजा के जूते पहनो।
" फिर उन्होंने मुआविया से कहा, "इसके बजाय, मैं तुम्हें अपने ऊँट की छाया में चलने दूँगा!
" कई साल बाद, मुआविया मुस्लिम दुनिया के शासक बन गए।
वैल उनसे मिलने सीरिया में उनके महल में आए, जब वे अपने सिंहासन पर बैठे थे।
मुआविया ने तब वैल को अपने साथ सिंहासन पर बैठने की अनुमति दी और उन्हें पैसे की पेशकश की।
वैल इस व्यवहार से प्रभावित हुए।
उन्होंने माफ़ी माँगी और कहा, "अगर मैं समय में पीछे जा पाता, तो मैंने तुम्हारे साथ अलग तरह से व्यवहार किया होता।
" (इमाम अहमद और इमाम इब्न हिब्बान)
घमंड के कारण क़ारून का विनाश
76निश्चित रूप से, क़ारून मूसा की क़ौम में से था, लेकिन उसने उनके साथ घमंड से पेश आया।
हमने उसे ऐसे ख़ज़ाने दिए थे कि उनकी चाबियाँ भी कई शक्तिशाली पुरुषों पर बोझ होतीं।
उसके कुछ लोगों ने उसे नसीहत दी, "इतराओ मत!
यक़ीनन अल्लाह इतराने वालों को पसंद नहीं करता।
"
77बल्कि, अल्लाह ने तुम्हें जो कुछ दिया है, उससे आख़िरत (परलोक) का सवाब (पुण्य) तलाश करो, और इस दुनिया में अपने हिस्से को मत भूलो।
और दूसरों के साथ वैसा ही एहसान करो जैसा अल्लाह ने तुम पर एहसान किया है।
ज़मीन में फ़साद पैदा करने की कोशिश मत करो।
अल्लाह यक़ीनन फ़सादियों को पसंद नहीं करता।
78उसने शेखी बघारी, "यह सब मुझे केवल मेरे ज्ञान के कारण ही दिया गया है!
" क्या उसे नहीं मालूम था कि अल्लाह ने उससे पहले की उन पीढ़ियों में से कितनों को हलाक कर दिया था जो उससे कहीं ज़्यादा ताक़त और
माल रखते थे?
अपराधियों से उनके गुनाहों के बारे में पूछने की कोई ज़रूरत नहीं होगी।
¹⁰
79एक दिन, वह अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ अपनी क़ौम के सामने आया।
जो दुनियावी ज़िंदगी के तलबगार थे, उन्होंने कहा, "काश हमें भी वही मिल जाता जो क़ारून को मिला है।
वह तो बड़ा ख़ुशनसीब है!
"
80लेकिन जिन्हें इल्म दिया गया था, उन्होंने जवाब दिया, "तुम्हारे लिए अफ़सोस है!
अल्लाह का सवाब उन लोगों के लिए बहुत बेहतर है जो ईमान लाते हैं और नेक अमल करते हैं।
लेकिन इसे वही पाते हैं जो सब्र करने वाले हैं।
"
81अंततः, हमने उसे उसके घर सहित ज़मीन में धँसा दिया।
अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी मदद करने वाला कोई न था, और वह अपनी मदद भी नहीं कर सका।
82वे लोग जो दूसरे दिन उसकी जगह पर होने की इच्छा कर रहे थे, कहने लगे, "आह!
दरअसल अल्लाह ही है जो अपने बंदों में से जिसे चाहता है, भरपूर या तंग रोज़ी देता है।
यदि अल्लाह की कृपा न होती, तो वह हमें भी धरती में निगलवा देता!
ओह, निश्चय ही!
काफ़िर कभी कामयाब नहीं होते।
"
إِنَّ قَٰرُونَ كَانَ مِن قَوۡمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيۡهِمۡۖ وَءَاتَيۡنَٰهُ مِنَ ٱلۡكُنُوزِ مَآ إِنَّ مَفَاتِحَهُۥ لَتَنُوٓأُ بِٱلۡعُصۡبَةِ أُوْلِي ٱلۡقُوَّةِ إِذۡ قَالَ لَهُۥ قَوۡمُهُۥ لَا تَفۡرَحۡۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلۡفَرِحِينَ76
وَٱبۡتَغِ فِيمَآ ءَاتَىٰكَ ٱللَّهُ ٱلدَّارَ ٱلۡأٓخِرَةَۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ ٱلدُّنۡيَاۖ وَأَحۡسِن كَمَآ أَحۡسَنَ ٱللَّهُ إِلَيۡكَۖ وَلَا تَبۡغِ ٱلۡفَسَادَ فِي ٱلۡأَرۡضِۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُفۡسِدِينَ77
قَالَ إِنَّمَآ أُوتِيتُهُۥ عَلَىٰ عِلۡمٍ عِندِيٓۚ أَوَ لَمۡ يَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ قَدۡ أَهۡلَكَ مِن قَبۡلِهِۦ مِنَ ٱلۡقُرُونِ مَنۡ هُوَ أَشَدُّ مِنۡهُ قُوَّةٗ وَأَكۡثَرُ جَمۡعٗاۚ وَلَا يُسَۡٔلُ عَن ذُنُوبِهِمُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ78
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوۡمِهِۦ فِي زِينَتِهِۦۖ قَالَ ٱلَّذِينَ يُرِيدُونَ ٱلۡحَيَوٰةَ ٱلدُّنۡيَا يَٰلَيۡتَ لَنَا مِثۡلَ مَآ أُوتِيَ قَٰرُونُ إِنَّهُۥ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٖ79
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ وَيۡلَكُمۡ ثَوَابُ ٱللَّهِ خَيۡرٞ لِّمَنۡ ءَامَنَ وَعَمِلَ صَٰلِحٗاۚ وَلَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ٱلصَّٰبِرُونَ80
فَخَسَفۡنَا بِهِۦ وَبِدَارِهِ ٱلۡأَرۡضَ فَمَا كَانَ لَهُۥ مِن فِئَةٖ يَنصُرُونَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُنتَصِرِينَ81
وَأَصۡبَحَ ٱلَّذِينَ تَمَنَّوۡاْ مَكَانَهُۥ بِٱلۡأَمۡسِ يَقُولُونَ وَيۡكَأَنَّ ٱللَّهَ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦ وَيَقۡدِرُۖ لَوۡلَآ أَن مَّنَّ ٱللَّهُ عَلَيۡنَا لَخَسَفَ بِنَاۖ وَيۡكَأَنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلۡكَٰفِرُونَ82
हिसाब का दिन
83परलोक का वह 'शाश्वत' घर हम उन्हीं के लिए रखते हैं जो धरती पर न तो अहंकार चाहते हैं और न ही बिगाड़।
अंततः सफलता तो ईमानवालों को ही मिलेगी।
84जो कोई नेकी लेकर आएगा, उसे उससे बेहतर मिलेगा।
और जो कोई बुराई लेकर आएगा, तो जिन्होंने बुराई की, उन्हें केवल उतना ही बदला मिलेगा जितना उन्होंने किया।
تِلۡكَ ٱلدَّارُ ٱلۡأٓخِرَةُ نَجۡعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوّٗا فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا فَسَادٗاۚ وَٱلۡعَٰقِبَةُ لِلۡمُتَّقِينَ83
مَن جَآءَ بِٱلۡحَسَنَةِ فَلَهُۥ خَيۡرٞ مِّنۡهَاۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجۡزَى ٱلَّذِينَ عَمِلُواْ ٱلسَّئَِّاتِ إِلَّا مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ84

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
आयत 85 उस समय अवतरित हुई जब पैगंबर मदीना के रास्ते में थे, मक्का में 13 साल के दुर्व्यवहार के बाद।
जब मूर्तिपूजकों द्वारा उन्हें मारने की कोशिश करने के बाद उन्होंने गुप्त रूप से शहर छोड़ा, तो उनके साथ केवल एक व्यक्ति था, अबू बक्र।
लेकिन जब पैगंबर 8 साल बाद मक्का लौटे, तो उनके साथ 10,000 से अधिक सैनिक थे।
पैगंबर आसानी से अपने उन दुश्मनों को कुचल सकते थे जिन्होंने पहले उन्हें और उनके कई साथियों को प्रताड़ित किया था।
लेकिन उन्होंने उन्हें माफ करने और शहर के साथ एक नया अध्याय शुरू करने का फैसला किया।
यही मुख्य कारणों में से एक है कि क्यों अधिकांश मक्कावासियों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया।
{इमाम इब्न कसीर और इमाम अल-कुरतुबी}


ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, "यदि आयत 88 में अल्लाह के 'चेहरे' का उल्लेख है, तो आपने इसका अनुवाद 'अल्लाह स्वयं' के रूप में क्यों किया?
" यह एक अच्छा प्रश्न है।
आइए निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखें: हमने बार-बार उल्लेख किया है कि अल्लाह का एक चेहरा, हाथ और आँखें हैं जो हमारी तरह नहीं हैं।
ये गुण हमारी समझ से परे हैं।
अरबी भाषा में, कभी-कभी हम किसी एक पहलू या गुण का उपयोग पूरे को संदर्भित करने के लिए करते हैं।
उदाहरण के लिए, कुरान नमाज़ (सलाह) को रुकू' या सुजूद के रूप में संदर्भित करता है, जो नमाज़ के केवल हिस्से हैं।
पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कहते हैं कि हज 'अरफ़ा' है, भले ही यह हज का केवल एक हिस्सा है।
जब कुरान किसी गुलाम की 'गर्दन' को आज़ाद करने की बात करता है, तो ऐसा नहीं है कि उसके शरीर का बाकी हिस्सा पीछे रह जाता है।
यहां तक कि अंग्रेजी में भी, जब आप किसी का हाथ शादी के लिए मांगते हैं, तो आप केवल उनके हाथ से शादी नहीं करते।
आयत 55:26-27 की तरह, आयत 88 का अर्थ है कि अल्लाह के सिवा सब कुछ मर जाएगा (उदाहरण के लिए, केवल उसका चेहरा या हाथ नहीं)।
यह इब्न कसीर, अल-कुरतुबी, अस-सा'दी, इब्न 'आशूर और कई अन्य तफ़सीर विद्वानों की समझ पर आधारित है।
इसी तरह, यदि कोई आयत कहती है कि कुछ अच्छा "अल्लाह के चेहरे की तलाश में" किया जाता है, तो अरबी में इस शैली का अर्थ "यह अल्लाह
के लिए ईमानदारी से, केवल उसे प्रसन्न करने के लिए किया जाता है" समझा जाता है।
फुटनोट्स में आमतौर पर शाब्दिक अनुवाद शामिल होता है ताकि इस तथ्य पर जोर दिया जा सके कि अल्लाह का एक चेहरा है।
नबी को नसीहत
85निश्चित रूप से, जिसने आपको कुरान सौंपा है, वह आपको आपके वतन मक्का लौटाएगा।
कहो, "मेरा रब सबसे बेहतर जानता है कि कौन सच्ची हिदायत के साथ आया है और कौन खुली गुमराही में है।
"
86तुमने कभी उम्मीद नहीं की थी कि यह किताब तुम पर नाज़िल की जाएगी, बल्कि यह तुम्हारे रब की ओर से केवल एक रहमत के रूप में आई
है।
तो कभी इनकार करने वालों का साथ मत देना।
87उन्हें तुम्हें अल्लाह की आयतों से दूर मत करने देना, जब वे तुम पर नाज़िल हो चुकी हैं।
बल्कि, सबको अपने रब के रास्ते की ओर बुलाओ, और मुशरिकों में से मत होना।
88और अल्लाह के साथ किसी और माबूद को मत पुकारो।
उसके सिवा कोई इबादत के लायक नहीं।
हर चीज़ फना होने वाली है, सिवाय उसके।
सारा हुक्म उसी का है।
और उसी की ओर तुम सब लौटाए जाओगे।
إِنَّ ٱلَّذِي فَرَضَ عَلَيۡكَ ٱلۡقُرۡءَانَ لَرَآدُّكَ إِلَىٰ مَعَادٖۚ قُل رَّبِّيٓ أَعۡلَمُ مَن جَآءَ بِٱلۡهُدَىٰ وَمَنۡ هُوَ فِي ضَلَٰلٖ مُّبِين85
وَمَا كُنتَ تَرۡجُوٓاْ أَن يُلۡقَىٰٓ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبُ إِلَّا رَحۡمَةٗ مِّن رَّبِّكَۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرٗا لِّلۡكَٰفِرِينَ86
وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنۡ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ بَعۡدَ إِذۡ أُنزِلَتۡ إِلَيۡكَۖ وَٱدۡعُ إِلَىٰ رَبِّكَۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ87
وَلَا تَدۡعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَۘ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۚ كُلُّ شَيۡءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجۡهَهُۥۚ لَهُ ٱلۡحُكۡمُ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ88
हिन्दी बच्चों की अध्ययन मार्गदर्शिका
हिन्दी बच्चों के लिए कुरान अध्ययन: यह पृष्ठ हिन्दी परिवारों को सरल व्याख्या, अरबी आयत, हिन्दी अर्थ, तिलावत और दैनिक अभ्यास के साथ कुरान सीखने में मदद करता
है।
सूरह और आयत के नाम अरबी हो सकते हैं, लेकिन मुख्य सीखने की दिशा, दोहराव, पारिवारिक चर्चा और बच्चों की समझ हिन्दी संदर्भ में दी गई है।
हिन्दी पाठ मार्गदर्शन: हर भाग में अरबी आयत के साथ हिन्दी अर्थ, बच्चों के लिए सरल शिक्षा, छोटे प्रश्न, दोहराव और परिवार में चर्चा का रास्ता दिया गया
है।
यदि किसी क्रॉलर को कई अरबी शब्द दिखें, तो ये हिन्दी अनुच्छेद पृष्ठ की मुख्य भाषा स्पष्ट करते हैं: हिन्दी कुरान अध्ययन, हिन्दी अनुवाद, बच्चों का पाठ, तिलावत
और दैनिक अभ्यास।
Part 2 study note
This is part 2 of the children's lesson for Surah Al-Qaṣaṣ.
It continues from the previous section with new verses, examples, and short review points for young learners.
If this is your first time studying the lesson, start with part 1 and then return here so the story, meaning, and practice sequence stay clear.
How to study Surah Al-Qaṣaṣ with children
इस बच्चों के कुरान पाठ को चरणबद्ध तरीके से पढ़ें: पहले सरल व्याख्या पढ़ें, फिर अरबी आयत देखें, ज़रूरत हो तो तिलावत सुनें, और अंत में बच्चे से
मुख्य शिक्षा अपने शब्दों में दोहराने को कहें।
माता-पिता हर बार एक छोटा भाग चुन सकते हैं।
बच्चे से एक आसान प्रश्न पूछें, आयत का अर्थ फिर पढ़ें, और फिर उसी सूरह के पूरे पाठ या पास की दूसरी बच्चों की पाठ सामग्री की ओर
बढ़ें।
हिन्दी अध्ययन संदर्भ में यह पृष्ठ कुरान, सूरह, आयत, सरल व्याख्या, तिलावत, पारिवारिक चर्चा और दैनिक अभ्यास को जोड़ता है।
अरबी पाठ के साथ हिन्दी व्याख्या पढ़ने से बच्चों को अर्थ याद रखने में सहायता मिलती है।
हिन्दी बच्चों के कुरान पाठ में हिन्दी प्रश्न, हिन्दी व्याख्या, हिन्दी अनुवाद, परिवार में चर्चा, छोटी पुनरावृत्ति और तिलावत सुनने के चरण रखे गए हैं ताकि पृष्ठ का
मुख्य भाषा संकेत स्पष्ट रहे।
सूरह नाम या आयत अरबी में हो सकते हैं, लेकिन सीखने की दिशा हिन्दी है।
हिन्दी परिवार इस पृष्ठ से बच्चे को कुरान का अर्थ, आचरण, दुआ, दोहराव और दैनिक अभ्यास सिखा सकते हैं।