Surah 24
Volume 3

The Light

النُّور

النُّور

Surah An-Nûr for kids content

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • अल्लाह को यह पसंद है जब लोग ज़रूरतमंदों को देते हैं।

    यही कारण है कि ज़कात इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है।

    एक व्यक्ति को 2.

    5% ज़कात देनी चाहिए यदि उसके पास 85 ग्राम सोने के मूल्य के बराबर धन है और यदि वह धन एक हिजरी वर्ष (355 दिन) के लिए बचाकर

    रखा गया है।

    लोगों को सदक़ा देने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है, जिसमें वर्ष के किसी भी समय दी गई कोई भी राशि शामिल है।

    अरबी में, 'ज़कात' शब्द का अर्थ शुद्ध करना और बढ़ाना है।

    इस्लाम दान करने के लिए एक महान प्रतिफल का वादा करता है।

  • नबी (ﷺ) ने फ़रमाया: "सदक़ा देने से माल कभी कम नहीं होता।

    " {इमाम मुस्लिम}

  • नबी (ﷺ) ने फ़रमाया: "सदक़ा गुनाहों को ऐसे बुझा देता है जैसे पानी आग को बुझा देता है।

    " {इमाम अहमद}

  • Illustration
  • फ़रिश्ते अल्लाह से दुआ करते हैं कि दान करने वालों के धन में वृद्धि हो।

    {इमाम अल-बुख़ारी और इमाम मुस्लिम}

SIDE STORY

छोटी कहानी

  • यह एक सच्ची कहानी है जो कई साल पहले अफगानिस्तान में घटी थी।

    एक रेस्तरां मालिक ने रात के खाने के लिए बड़ी मात्रा में भोजन पकाया, उम्मीद कर रहा था कि शाम को हमेशा की तरह सब कुछ बिक जाएगा।

    अचानक, एक भयंकर बारिश का तूफान आया जिससे बिजली गुल हो गई।

    मालिक घबरा गया क्योंकि उस रात कोई भी रेस्तरां में नहीं आएगा और बिजली न होने के कारण वे सारा खाना फ्रिज में नहीं रख सकते थे।

  • कुछ ही देर बाद, उसने अंधेरे में अपने रेस्तरां की ओर आते हुए 3 आकृतियाँ देखीं।

    पहले तो उसने सोचा कि वे चोर हैं, लेकिन वे एक गरीब महिला निकली जो अपने 2 बच्चों के साथ दान मांगने आई थी।

    उसने उसे बताया कि उन्होंने पिछले कुछ दिनों से कुछ नहीं खाया था।

    उसे उन पर दया आई, उसने उन्हें अपने रेस्तरां का सबसे अच्छा भोजन परोसा और कुछ पैसे भी दिए।

    उनके जाने से पहले, महिला ने अल्लाह से उसके व्यवसाय को आशीर्वाद देने की प्रार्थना की।

  • Illustration
  • उनके जाने के बाद, मालिक यह हिसाब लगाने बैठ गया कि अगर वह सारा खाना फेंक देता है तो उसे कितना नुकसान होगा।

    अचानक, कहीं से एक बड़ी बस आई और उसके रेस्तरां के सामने रुक गई।

    40 से अधिक यात्री उससे रात का खाना खरीदने आए।

    उन्होंने सारा खाना खा लिया और उसे अपने गैस स्टोव पर उनके लिए और भी पकाना पड़ा।

    उस रात, उसने किसी भी अन्य रात की तुलना में कहीं अधिक पैसा कमाया, उस दान के कारण जो उसने उस महिला और उसके बच्चों को दिया था।

अपनी दयालुता मत रोको।

22तुम में से जो लोग फ़ज़ल (भलाई/अनुग्रह) और माल (धन) वाले हैं, वे इस बात की क़सम न खाएँ कि वे अपने रिश्तेदारों, मिसकीनों (ज़रूरतमंदों) और अल्लाह के

मार्ग में हिजरत करने वालों को देना बंद कर देंगे।

उन्हें चाहिए कि वे माफ़ करें और दरगुज़र करें।

क्या तुम यह पसंद नहीं करते कि अल्लाह तुम्हें बख़्श दे?

और अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत दयालु है।

وَلَا يَأۡتَلِ أُوْلُواْ ٱلۡفَضۡلِ مِنكُمۡ وَٱلسَّعَةِ أَن يُؤۡتُوٓاْ أُوْلِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينَ وَٱلۡمُهَٰجِرِينَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۖ وَلۡيَعۡفُواْ وَلۡيَصۡفَحُوٓاْۗ أَلَا تُحِبُّونَ أَن يَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَكُمۡۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٌ22

असत्य आरोप का दण्ड

23निःसंदेह जो पाक-दामन, बेगुनाह, ईमानदार औरतों पर इल्ज़ाम लगाते हैं, उन पर इस दुनिया और आख़िरत में लानत है।

और उनके लिए एक भयानक अज़ाब है।

24जिस दिन उनकी ज़बानें, हाथ और पैर उनके सब कामों की गवाही देंगे।

25उस दिन अल्लाह उन्हें उनका पूरा-पूरा बदला देगा जिसके वे हक़दार हैं, और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही परम सत्य है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَرۡمُونَ ٱلۡمُحۡصَنَٰتِ ٱلۡغَٰفِلَٰتِ ٱلۡمُؤۡمِنَٰتِ لُعِنُواْ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيم23

يَوۡمَ تَشۡهَدُ عَلَيۡهِمۡ أَلۡسِنَتُهُمۡ وَأَيۡدِيهِمۡ وَأَرۡجُلُهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ24

يَوۡمَئِذٖ يُوَفِّيهِمُ ٱللَّهُ دِينَهُمُ ٱلۡحَقَّ وَيَعۡلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ ٱلۡمُبِينُ25

समान के लिए समान

26बुरी स्त्रियाँ बुरे पुरुषों के लिए हैं, और बुरे पुरुष बुरी स्त्रियों के लिए हैं।

पवित्र स्त्रियाँ पवित्र पुरुषों के लिए हैं, और पवित्र पुरुष पवित्र स्त्रियों के लिए हैं।

वे 'पवित्र ईमानवाले' उन बातों से पाक हैं जो दुष्ट कहते हैं।

उनके लिए मग़फ़िरत और सम्मानजनक रोज़ी होगी।

ٱلۡخَبِيثَٰتُ لِلۡخَبِيثِينَ وَٱلۡخَبِيثُونَ لِلۡخَبِيثَٰتِۖ وَٱلطَّيِّبَٰتُ لِلطَّيِّبِينَ وَٱلطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَٰتِۚ أُوْلَٰٓئِكَ مُبَرَّءُونَ مِمَّا يَقُولُونَۖ لَهُم مَّغۡفِرَةٞ وَرِزۡقٞ كَرِيمٞ26

निजी और सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश

27ऐ ईमानवालो!

अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में दाख़िल न हो जब तक कि इजाज़त न ले लो और उन पर रहने वालों को सलाम न कर लो।

यह तुम्हारे लिए बेहतर है, ताकि तुम नसीहत हासिल करो।

28और अगर तुम वहाँ किसी को न पाओ तो उसमें दाख़िल न हो जब तक कि तुम्हें इजाज़त न दी जाए।

और अगर तुमसे कहा जाए कि वापस जाओ, तो वापस चले जाओ।

यह तुम्हारे लिए ज़्यादा पाकीज़ा है।

और अल्लाह तुम्हारे सब कामों को ख़ूब जानता है।

29उन घरों में दाख़िल होने में तुम पर कोई गुनाह नहीं जो गैर-आबाद हों और जिनमें तुम्हारा कोई सामान रखा हो।

और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपाते हो।

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَدۡخُلُواْ بُيُوتًا غَيۡرَ بُيُوتِكُمۡ حَتَّىٰ تَسۡتَأۡنِسُواْ وَتُسَلِّمُواْ عَلَىٰٓ أَهۡلِهَاۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ27

فَإِن لَّمۡ تَجِدُواْ فِيهَآ أَحَدٗا فَلَا تَدۡخُلُوهَا حَتَّىٰ يُؤۡذَنَ لَكُمۡۖ وَإِن قِيلَ لَكُمُ ٱرۡجِعُواْ فَٱرۡجِعُواْۖ هُوَ أَزۡكَىٰ لَكُمۡۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ عَلِيمٞ28

لَّيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَن تَدۡخُلُواْ بُيُوتًا غَيۡرَ مَسۡكُونَةٖ فِيهَا مَتَٰعٞ لَّكُمۡۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مَا تُبۡدُونَ وَمَا تَكۡتُمُونَ29

मुस्लिम पुरुषों को नसीहत

30ऐ पैग़म्बर!

ईमान वाले पुरुषों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें।

यह उनके लिए अधिक पवित्र है।

निश्चित रूप से अल्लाह उनके सभी कर्मों से पूरी तरह वाकिफ़ है।

قُل لِّلۡمُؤۡمِنِينَ يَغُضُّواْ مِنۡ أَبۡصَٰرِهِمۡ وَيَحۡفَظُواْ فُرُوجَهُمۡۚ ذَٰلِكَ أَزۡكَىٰ لَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرُۢ بِمَا يَصۡنَعُونَ30

मुस्लिम महिलाओं को नसीहत

31और मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें, और अपनी ज़ीनत (सजावट) को ज़ाहिर न करें सिवाय उसके

जो खुद-ब-खुद ज़ाहिर हो जाए।

और अपनी ओढ़नियों को अपने सीनों पर डाल लें, और अपनी ज़ीनत (सजावट) को ज़ाहिर न करें सिवाय अपने शौहरों के, या अपने बापों के, या अपने शौहरों

के बापों के, या अपने बेटों के, या अपने सौतेले बेटों के, या अपने भाइयों के, या अपने भाइयों के बेटों के, या अपनी बहनों के बेटों के,

या अपनी औरतों के, या अपनी लौंडियों के, या ऐसे मर्द नौकरों के जिन्हें औरतों से कोई इच्छा न हो, या ऐसे बच्चों के जो औरतों की पर्दापोशी

की बातों को न समझते हों।

और वे अपने पैर ज़मीन पर न मारें ताकि उनकी छिपी हुई ज़ीनत की तरफ़ ध्यान आकर्षित न हो।

ऐ ईमान वालो!

तुम सब मिलकर अल्लाह की तरफ़ तौबा करो, ताकि तुम कामयाब हो जाओ।

وَقُل لِّلۡمُؤۡمِنَٰتِ يَغۡضُضۡنَ مِنۡ أَبۡصَٰرِهِنَّ وَيَحۡفَظۡنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبۡدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنۡهَاۖ وَلۡيَضۡرِبۡنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّۖ وَلَا يُبۡدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوۡ ءَابَآئِهِنَّ أَوۡ ءَابَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوۡ أَبۡنَآئِهِنَّ أَوۡ أَبۡنَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوۡ إِخۡوَٰنِهِنَّ أَوۡ بَنِيٓ إِخۡوَٰنِهِنَّ أَوۡ بَنِيٓ أَخَوَٰتِهِنَّ أَوۡ نِسَآئِهِنَّ أَوۡ مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُهُنَّ أَوِ ٱلتَّٰبِعِينَ غَيۡرِ أُوْلِي ٱلۡإِرۡبَةِ مِنَ ٱلرِّجَالِ أَوِ ٱلطِّفۡلِ ٱلَّذِينَ لَمۡ يَظۡهَرُواْ عَلَىٰ عَوۡرَٰتِ ٱلنِّسَآءِۖ وَلَا يَضۡرِبۡنَ بِأَرۡجُلِهِنَّ لِيُعۡلَمَ مَا يُخۡفِينَ مِن زِينَتِهِنَّۚ وَتُوبُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ31

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • अब्दुल्लाह इब्न उबैय इब्न सलूल मदीना में रहने वाला एक मुनाफिक (कपटी) था।

    वह अपनी दासियों को अवैध संबंधों में धकेलने के लिए मजबूर करता था ताकि वह पैसा कमा सके।

    उन दासियों ने पैगंबर (ﷺ) से शिकायत की, इसलिए इस बुरी प्रथा को समाप्त करने के लिए आयत 33 नाजिल हुई।

    {इमाम मुस्लिम}

अभिभावकों को मार्गदर्शन

32तुममें से जो अविवाहित हों, उनका निकाह करा दो, और अपने गुलामों और लौंडियों में से जो नेक हों उनका भी।

यदि वे निर्धन हों, तो अल्लाह उन्हें अपने फ़ज़्ल से मालदार कर देगा।

अल्लाह बड़ा बरकत वाला, सब कुछ जानने वाला है।

33और जो निकाह करने की सामर्थ्य न रखते हों, उन्हें चाहिए कि वे अपने मन को रोके रखें, जब तक कि अल्लाह उन्हें अपने फ़ज़्ल से मालदार न

कर दे।

और तुम्हारे गुलामों में से जो अपनी आज़ादी के लिए मुकातिबत चाहें, तो उनसे मुकातिबत कर लो, यदि तुम उनमें भलाई पाओ।

और उन्हें अल्लाह के उस माल में से दो जो उसने तुम्हें दिया है।

और अपनी लौंडियों को दुनियावी ज़िंदगी के लाभ के लिए अवैध संबंधों में ज़बरदस्ती न डालो, जबकि वे पाक दामन रहना चाहती हों।

और यदि कोई उन्हें ज़बरदस्ती करता है, तो अल्लाह उनके लिए, ज़बरदस्ती किए जाने के कारण, बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान होगा।

34हमने तुम्हारे पास स्पष्ट आयतें उतार दी हैं, और उन लोगों के उदाहरण भी जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं, और उन लोगों के लिए नसीहत जो अल्लाह

को याद रखते हैं।

وَأَنكِحُواْ ٱلۡأَيَٰمَىٰ مِنكُمۡ وَٱلصَّٰلِحِينَ مِنۡ عِبَادِكُمۡ وَإِمَآئِكُمۡۚ إِن يَكُونُواْ فُقَرَآءَ يُغۡنِهِمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٞ32

وَلۡيَسۡتَعۡفِفِ ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتَّىٰ يُغۡنِيَهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦۗ وَٱلَّذِينَ يَبۡتَغُونَ ٱلۡكِتَٰبَ مِمَّا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُكُمۡ فَكَاتِبُوهُمۡ إِنۡ عَلِمۡتُمۡ فِيهِمۡ خَيۡرٗاۖ وَءَاتُوهُم مِّن مَّالِ ٱللَّهِ ٱلَّذِيٓ ءَاتَىٰكُمۡۚ وَلَا تُكۡرِهُواْ فَتَيَٰتِكُمۡ عَلَى ٱلۡبِغَآءِ إِنۡ أَرَدۡنَ تَحَصُّنٗا لِّتَبۡتَغُواْ عَرَضَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَمَن يُكۡرِههُّنَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ مِنۢ بَعۡدِ إِكۡرَٰهِهِنَّ غَفُورٞ رَّحِيمٞ33

وَلَقَدۡ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكُمۡ ءَايَٰتٖ مُّبَيِّنَٰتٖ وَمَثَلٗا مِّنَ ٱلَّذِينَ خَلَوۡاْ مِن قَبۡلِكُمۡ وَمَوۡعِظَةٗ لِّلۡمُتَّقِينَ34

Illustration

नूर-ए-ईमान

35अल्लाह आसमानों और ज़मीन का नूर है।

उसके नूर की मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ (दीवार में बनी जगह) में एक चिराग़ (दीपक) हो।

वह चिराग़ एक शीशे (क्रिस्टल) में है।

वह शीशा (क्रिस्टल) मानो एक चमकता हुआ सितारा है, जिसे एक मुबारक ज़ैतून के पेड़ के तेल से जलाया जाता है, जो न पूरब का है और न

पश्चिम का।

उसका तेल तो ऐसा है कि बिना आग छुए ही चमक उठे।

नूर पर नूर!

अल्लाह जिसे चाहता है अपने नूर की तरफ़ हिदायत देता है।

अल्लाह लोगों के लिए मिसालें बयान करता है।

और अल्लाह हर चीज़ का पूरा इल्म रखता है।

36वह नूर उन घरों (इबादतगाहों) में चमकता है जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, और जहाँ उसके नाम का ज़िक्र किया जाता है।

वहाँ सुबह और शाम उसकी तस्बीह की जाती है।

37ऐसे मर्दों (पुरुषों) द्वारा जो ख़रीद-फ़रोख़्त (खरीदने और बेचने) से अल्लाह के ज़िक्र से, नमाज़ क़ायम करने से, और ज़कात अदा करने से ग़ाफ़िल नहीं होते।

वे उस दिन से डरते हैं जब दिल और आँखें बेचैन होंगी।

38इस उम्मीद में कि अल्लाह उन्हें उनके बेहतरीन आमाल (कर्मों) के बदले में अजर (इनाम) देगा और अपने फ़ज़्ल (कृपा) से उन्हें और ज़्यादा देगा।

और अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ (रोज़ी/जीविका) देता है।

ٱللَّهُ نُورُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ مَثَلُ نُورِهِۦ كَمِشۡكَوٰةٖ فِيهَا مِصۡبَاحٌۖ ٱلۡمِصۡبَاحُ فِي زُجَاجَةٍۖ ٱلزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوۡكَبٞ دُرِّيّٞ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٖ مُّبَٰرَكَةٖ زَيۡتُونَةٖ لَّا شَرۡقِيَّةٖ وَلَا غَرۡبِيَّةٖ يَكَادُ زَيۡتُهَا يُضِيٓءُ وَلَوۡ لَمۡ تَمۡسَسۡهُ نَارٞۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٖۚ يَهۡدِي ٱللَّهُ لِنُورِهِۦ مَن يَشَآءُۚ وَيَضۡرِبُ ٱللَّهُ ٱلۡأَمۡثَٰلَ لِلنَّاسِۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ35

فِي بُيُوتٍ أَذِنَ ٱللَّهُ أَن تُرۡفَعَ وَيُذۡكَرَ فِيهَا ٱسۡمُهُۥ يُسَبِّحُ لَهُۥ فِيهَا بِٱلۡغُدُوِّ وَٱلۡأٓصَالِ36

رِجَالٞ لَّا تُلۡهِيهِمۡ تِجَٰرَةٞ وَلَا بَيۡعٌ عَن ذِكۡرِ ٱللَّهِ وَإِقَامِ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءِ ٱلزَّكَوٰةِ يَخَافُونَ يَوۡمٗا تَتَقَلَّبُ فِيهِ ٱلۡقُلُوبُ وَٱلۡأَبۡصَٰرُ37

لِيَجۡزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحۡسَنَ مَا عَمِلُواْ وَيَزِيدَهُم مِّن فَضۡلِهِۦۗ وَٱللَّهُ يَرۡزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيۡرِ حِسَاب38

कुफ़्र का अंधकार

39और जो काफ़िर हैं, उनके कर्म रेगिस्तान में एक मृगतृष्णा के समान हैं, जिसे प्यासा पानी समझता है।

परन्तु जब वह उसके पास आता है, तो उसे कुछ भी नहीं पाता।

बल्कि वह वहाँ अल्लाह को पाता है, जो उसका पूरा हिसाब चुकाता है।

और अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।

40या उनके कर्म ऐसे गहरे अंधकार की तरह हैं जो एक अथाह सागर में हो, जिसे एक के ऊपर एक लहरें ढके हुए हों, और जिसके ऊपर काले

बादल छाए हों।

अंधकार पर अंधकार!

अगर कोई अपना हाथ निकाले, तो उसे देख भी न पाए।

और जिसे अल्लाह प्रकाश न दे, उसके लिए कोई प्रकाश नहीं है!

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ أَعۡمَٰلُهُمۡ كَسَرَابِۢ بِقِيعَةٖ يَحۡسَبُهُ ٱلظَّمۡ‍َٔانُ مَآءً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَهُۥ لَمۡ يَجِدۡهُ شَيۡ‍ٔٗا وَوَجَدَ ٱللَّهَ عِندَهُۥ فَوَفَّىٰهُ حِسَابَهُۥۗ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ39

أَوۡ كَظُلُمَٰتٖ فِي بَحۡرٖ لُّجِّيّٖ يَغۡشَىٰهُ مَوۡجٞ مِّن فَوۡقِهِۦ مَوۡجٞ مِّن فَوۡقِهِۦ سَحَابٞۚ ظُلُمَٰتُۢ بَعۡضُهَا فَوۡقَ بَعۡضٍ إِذَآ أَخۡرَجَ يَدَهُۥ لَمۡ يَكَدۡ يَرَىٰهَاۗ وَمَن لَّمۡ يَجۡعَلِ ٱللَّهُ لَهُۥ نُورٗا فَمَا لَهُۥ مِن نُّورٍ40

अल्लाह को पूर्ण समर्पण

41क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह की पाकी बयान करते हैं वे सब जो आसमानों और ज़मीन में हैं, और पर फैलाए हुए परिंदे भी?

हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीका जानता है।

और अल्लाह को पूरी ख़बर है जो कुछ वे करते हैं।

42आसमानों और ज़मीन की बादशाहत अल्लाह ही की है।

और अल्लाह ही की तरफ़ है लौटना।

أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَٱلطَّيۡرُ صَٰٓفَّٰتٖۖ كُلّٞ قَدۡ عَلِمَ صَلَاتَهُۥ وَتَسۡبِيحَهُۥۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِمَا يَفۡعَلُونَ41

وَلِلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلۡمَصِيرُ42

बारिश का चमत्कार

43क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह बादलों को धीरे-धीरे हाँकता है, फिर उन्हें आपस में मिलाता है, फिर उन्हें ढेर कर देता है, फिर तुम देखते हो कि

उसमें से वर्षा निकलती है?

और वह आकाश से ओलों से लदे हुए बादलों के पहाड़ उतारता है, फिर उसे जिस पर चाहता है बरसाता है और जिससे चाहता है उसे हटा देता

है।

बिजली की चमक ऐसी होती है कि लगभग आँखों की रौशनी छीन लेती है।

44अल्लाह दिन और रात को फेरता है।

निश्चय ही इसमें समझदारों के लिए एक नसीहत है।

أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُزۡجِي سَحَابٗا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيۡنَهُۥ ثُمَّ يَجۡعَلُهُۥ رُكَامٗا فَتَرَى ٱلۡوَدۡقَ يَخۡرُجُ مِنۡ خِلَٰلِهِۦ وَيُنَزِّلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن جِبَالٖ فِيهَا مِنۢ بَرَدٖ فَيُصِيبُ بِهِۦ مَن يَشَآءُ وَيَصۡرِفُهُۥ عَن مَّن يَشَآءُۖ يَكَادُ سَنَا بَرۡقِهِۦ يَذۡهَبُ بِٱلۡأَبۡصَٰرِ43

يُقَلِّبُ ٱللَّهُ ٱلَّيۡلَ وَٱلنَّهَارَۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَعِبۡرَةٗ لِّأُوْلِي ٱلۡأَبۡصَٰرِ44

सृष्टि का चमत्कार

45और अल्लाह ने हर जानदार चीज़ को पानी से पैदा किया है।

तो उनमें से कुछ अपने पेट के बल चलते हैं, और कुछ दो पाँव पर चलते हैं, और कुछ चार पर चलते हैं।

अल्लाह जो कुछ चाहता है, पैदा करता है।

बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।

وَٱللَّهُ خَلَقَ كُلَّ دَآبَّةٖ مِّن مَّآءٖۖ فَمِنۡهُم مَّن يَمۡشِي عَلَىٰ بَطۡنِهِۦ وَمِنۡهُم مَّن يَمۡشِي عَلَىٰ رِجۡلَيۡنِ وَمِنۡهُم مَّن يَمۡشِي عَلَىٰٓ أَرۡبَعٖۚ يَخۡلُقُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِير45

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • बिश्र नाम का एक मुनाफिक़ (कपटी) था जिसका एक यहूदी व्यक्ति के साथ ज़मीन के एक टुकड़े को लेकर विवाद था।

    यहूदी ने उससे कहा, "चलो, हमारे बीच फैसला कराने के लिए मुहम्मद (ﷺ) के पास चलते हैं।

    " लेकिन बिश्र ने यह कहते हुए इनकार कर दिया, "हमें किसी और के पास जाना चाहिए, क्योंकि नबी (ﷺ) हमारे बीच निष्पक्ष फैसला नहीं करेंगे।

    " तो इस अश्रद्धापूर्ण रवैये की आलोचना करने के लिए आयतें 47-50 अवतरित हुईं।

    {इमाम अत-तबरी और इमाम अल-क़ुर्तुबी}

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • कई मदनी सूरतों की तरह, यह सूरह मुनाफिकों (कपटियों) के बुरे रवैयों और हरकतों के बारे में बात करती है।

    विद्वान कहते हैं कि मुनाफिकत (कपट) दो प्रकार की होती है: अकीदे में मुनाफिकत, जिसका मतलब है कि एक व्यक्ति मुसलमान होने का दिखावा करता है लेकिन दिल

    से वे काफ़िर होते हैं।

    कुरान कहता है कि ये लोग जहन्नम की गहराइयों में होंगे और वे वहाँ हमेशा रहेंगे (4:145)।

  • दूसरा प्रकार अमल में मुनाफिकत है, जिसका मतलब है कि एक व्यक्ति असल में मुसलमान होता है लेकिन वे कुछ बुरे काम करते हैं।

    उदाहरण के लिए, नबी (ﷺ) ने फरमाया कि मुनाफिकों में 4 लक्षण होते हैं: 1) जब वे बात करते हैं तो झूठ बोलते हैं, 2) जब वे वादा

    करते हैं तो उसे तोड़ देते हैं, 3) जब उन्हें किसी चीज़ का अमानतदार बनाया जाता है तो वे उस अमानत में खयानत करते हैं, 4) जब वे

    झगड़ते हैं तो बदतमीज़ी करते हैं।

    {इमाम अल-बुखारी और इमाम मुस्लिम} इस समूह के लिए, यह अल्लाह पर निर्भर करता है कि वह उन्हें माफ करे या सज़ा दे।

    अगर वे जहन्नम में जाते हैं, तो उन्हें उनके गुनाहों की सज़ा मिलेगी लेकिन अंततः वे जन्नत में जाएंगे।

    कोई भी मुसलमान जहन्नम में हमेशा नहीं रहेगा।

  • Illustration

منافقین اور حساب

46हमने स्पष्ट आयतें नाज़िल की हैं, लेकिन अल्लाह ही जिसे चाहता है, सीधे मार्ग पर मार्गदर्शन देता है।

47वे मुनाफिक कहते हैं, "हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए हैं, और हम आज्ञापालन करते हैं।

" फिर उनमें से एक गिरोह उसके बाद तुरंत मुँह मोड़ लेता है।

ये सच्चे मोमिन नहीं हैं।

48और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है ताकि वह उनके बीच निर्णय करे, तो उनमें से एक गिरोह आने से इनकार कर देता

है।

¹³

49लेकिन यदि निर्णय उनके पक्ष में होने वाला हो, तो वे तुरंत उसके पास आते हैं, पूर्णतः समर्पित होकर।

50क्या उनके दिलों में कोई बीमारी है?

या वे संदेह में हैं?

या वे डरते हैं कि अल्लाह और उसके रसूल उनके साथ अन्याय करेंगे?

वास्तव में, वे ही हैं जो वास्तव में ज़ुल्म कर रहे हैं।

لَّقَدۡ أَنزَلۡنَآ ءَايَٰتٖ مُّبَيِّنَٰتٖۚ وَٱللَّهُ يَهۡدِي مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيم46

وَيَقُولُونَ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلرَّسُولِ وَأَطَعۡنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٞ مِّنۡهُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۚ وَمَآ أُوْلَٰٓئِكَ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ47

وَإِذَا دُعُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ إِذَا فَرِيقٞ مِّنۡهُم مُّعۡرِضُونَ48

وَإِن يَكُن لَّهُمُ ٱلۡحَقُّ يَأۡتُوٓاْ إِلَيۡهِ مُذۡعِنِينَ49

أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ٱرۡتَابُوٓاْ أَمۡ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِمۡ وَرَسُولُهُۥۚ بَلۡ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ50

मोमिन और क़यामत

51सच्चे मोमिनों का तो बस यही कहना होता है, जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करे, तो वे

कहते हैं, "हमने सुना और हमने आज्ञा मानी।

" ऐसे ही लोग वास्तव में सफल होंगे।

52जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करता है, और अल्लाह से डरता है और उसका ख़्याल रखता है, ऐसे ही लोग वास्तव में सफल होंगे।

إِنَّمَا كَانَ قَوۡلَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ إِذَا دُعُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ أَن يَقُولُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ51

وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَيَخۡشَ ٱللَّهَ وَيَتَّقۡهِ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَآئِزُونَ52

मुनाफ़िक़ों की चिकनी-चुपड़ी बातें

53वे अल्लाह की बहुत कड़ी क़समें खाते हैं कि यदि आप (हे पैग़म्बर) उन्हें आदेश दें, तो वे निश्चित रूप से (अल्लाह के मार्ग में) निकल पड़ेंगे।

कहो, "तुम्हें क़सम खाने की ज़रूरत नहीं है; तुम्हारी आज्ञाकारिता तो जानी-पहचानी है!

" निःसंदेह अल्लाह तुम्हारे हर काम से पूरी तरह अवगत है।

54कहो, "अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो।

लेकिन यदि तुम मुँह मोड़ते हो, तो वह केवल अपने कर्तव्य के लिए ज़िम्मेदार है¹⁴ और तुम अपने कर्तव्य के लिए ज़िम्मेदार हो।

¹⁵ और यदि तुम उसका आज्ञापालन करोगे, तो तुम सही मार्गदर्शन पाओगे।

रसूल का कर्तव्य केवल संदेश को स्पष्ट रूप से पहुँचाना है।

"

وَأَقۡسَمُواْ بِٱللَّهِ جَهۡدَ أَيۡمَٰنِهِمۡ لَئِنۡ أَمَرۡتَهُمۡ لَيَخۡرُجُنَّۖ قُل لَّا تُقۡسِمُواْۖ طَاعَةٞ مَّعۡرُوفَةٌۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ53

قُلۡ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَۖ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَإِنَّمَا عَلَيۡهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيۡكُم مَّا حُمِّلۡتُمۡۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهۡتَدُواْۚ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلۡبَلَٰغُ ٱلۡمُبِينُ54

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • मुस्लिम समुदाय को मदीना के भीतर और बाहर, विभिन्न शत्रुओं से लगातार खतरा रहता था।

    पैगंबर के कुछ साथियों ने उनसे पूछा कि क्या वे इसी तरह डर में जीते रहेंगे।

    पैगंबर (ﷺ) ने उन्हें बताया कि जल्द ही वे शांति से रहेंगे और दुनिया के विशाल हिस्सों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेंगे।

    कुछ ही वर्षों के भीतर, पूरा अरब पैगंबर (ﷺ) के अधिकार में आ गया।

  • उनकी वफ़ात के कुछ ही समय बाद, एक छोटी मुस्लिम सेना दुनिया की दो महाशक्तियों (रोमन और फ़ारसी साम्राज्यों) को एक साथ पराजित करने में सफल रही।

    मुस्लिम शासन एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बड़े हिस्सों में फैल गया—पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में अटलांटिक महासागर तक, जिसमें पूरा उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के

    कुछ हिस्से जैसे तुर्की और स्पेन शामिल थे।

    {इमाम इब्न कसीर}

Illustration

अल्लाह का वादा ईमान वालों से

55अल्लाह ने तुम में से उन लोगों से वादा किया है जो ईमान लाए और नेक अमल किए कि वह उन्हें ज़मीन में ज़रूर ख़लीफ़ा बनाएगा, जैसा कि

उसने उनसे पहले वालों को बनाया था; और उनके लिए उनके उस दीन को मज़बूती देगा जिसे उसने उनके लिए पसंद किया है; और उनके डर को अमन

में बदल देगा – बशर्ते कि वे मेरी इबादत करें और मेरे साथ किसी को शरीक न करें।

और जो कोई इस वादे के बाद कुफ़्र करेगा, तो वही फ़ासिक़ होंगे।

56और नमाज़ क़ायम करो, और ज़कात अदा करो, और रसूल की इताअत करो, ताकि तुम पर रहम किया जाए।

57ऐ पैग़म्बर, यह गुमान न करो कि काफ़िर ज़मीन में (अल्लाह से) बच निकलेंगे।

उनका ठिकाना आग है।

और वह कितना बुरा ठिकाना है!

وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مِنكُمۡ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَيَسۡتَخۡلِفَنَّهُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ كَمَا ٱسۡتَخۡلَفَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمۡ دِينَهُمُ ٱلَّذِي ٱرۡتَضَىٰ لَهُمۡ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّنۢ بَعۡدِ خَوۡفِهِمۡ أَمۡنٗاۚ يَعۡبُدُونَنِي لَا يُشۡرِكُونَ بِي شَيۡ‍ٔٗاۚ وَمَن كَفَرَ بَعۡدَ ذَٰلِكَ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ55

وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ56

لَا تَحۡسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مُعۡجِزِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ وَمَأۡوَىٰهُمُ ٱلنَّارُۖ وَلَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ57

How to study Surah An-Nûr with children

Use this children's lesson as a guided path: read the short explanation, look at the Arabic verse, listen to related recitation, and return to the full surah when your child is ready for more detail.

Parents can review one section at a time, ask the child to repeat the main idea, and then continue with the next part or a nearby surah. This keeps the lesson connected with Quran reading, audio, and daily practice.