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Surah Al-An'âm for kids content

ज्ञान की बातें
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कुरान की कई आयतों की तरह, आयतें 95-99 यह तर्क देती हैं कि अल्लाह की सृजनात्मक शक्ति इस बात का प्रमाण है कि केवल वही हमारी इबादत और
कृतज्ञता का हकदार है।
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ये आयतें अल्लाह द्वारा सूर्य, चंद्रमा और तारों की रचना का उल्लेख करती हैं, साथ ही यह भी कि वह कैसे बीजों से पेड़ उगाता है, मनुष्यों की
रचना करता है, वर्षा भेजता है और पौधों तथा फलों को उगाता है।
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अल्लाह की सृष्टि के वही चमत्कार प्रसिद्ध इराकी लेखक मारूफ अल-रुसाफी (1875-1945) की एक कविता में उजागर किए गए हैं।
निम्नलिखित उनकी कविता है, मेरे विनम्र अनुवाद के साथ।
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1 इस प्यारे पेड़ को देखो, इसकी सुंदर डालियों के साथ।
क्या तुम नहीं देखते?
2 एक नन्हे बीज से कैसे यह उगा, एक विशाल वृक्ष बन गया?
3 बताओ हमें, किसने इसे जड़ें दीं, ढेर सारे स्वादिष्ट फल देते हुए?
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4 देखो उस विशाल सूर्य को, हे मेरे प्रभु!
वह प्रज्वलित प्रकाश का स्रोत- 5 किसने उसे ऊँचा उठाया, आकाश में एक चिंगारी की तरह?
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6 उस घोर अँधेरी रात को देखो, उसे यह अद्भुत चाँदनी किसने दी?
7 उसे हर सितारे से किसने जगमगाया, जो दूर-दूर तक चमकते हैं?
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8 उन घने बादलों को देखो, उन्हें कौन बरसाता है, 9 जिससे सूखी रेत हरी-भरी धरती में बदल जाती है?
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10 मनुष्यों को देखो, यदि तुम विचार करो, उन्हें उनकी दृष्टि किसने दी?
11 उन्हें ऐसे मन किसने दिए जो सही-गलत पहचान सकें?
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12 वह अल्लाह ही है, जो कृपालु, अत्यंत उदार है, जिसकी कृपाएँ हम पर बरसती हैं।
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13 वह असीम हिकमत (ज्ञान) का रब है, अपने पूरे राज्य का पराक्रमी स्वामी।

अल्लाह की सृजन शक्ति
95निःसंदेह, अल्लाह ही है जो बीजों और गुठलियों को अंकुरित करता है।
वह जीवित को मृत से और मृत को जीवित से निकालता है।
वही अल्लाह है!
फिर तुम कैसे सत्य से विमुख होते हो?
96वह सुबह के प्रकाश से अंधकार को चीरता है, और रात को आराम के लिए बनाया है, और सूर्य तथा चंद्रमा को एक सटीक तरीके से गतिमान किया
है।
यह सर्वशक्तिमान, पूर्ण ज्ञान वाले का विधान है।
97और वही है जिसने तारों को तुम्हारे लिए ज़मीन और समुद्र के अंधेरों में मार्गदर्शक बनाया है।
हमने उन लोगों के लिए निशानियाँ स्पष्ट कर दी हैं जो जानते हैं।
98और वही है जिसने तुम सबको एक ही जान से पैदा किया, फिर तुम्हारे लिए एक रहने की जगह और एक आराम करने की जगह निर्धारित की।
हमने उन लोगों के लिए निशानियाँ स्पष्ट कर दी हैं जो समझते हैं।
99और वही है जो आकाश से पानी बरसाता है—फिर उससे हर प्रकार की वनस्पति उगाता है—फिर उससे हरी कोंपलें निकालता है, जिनसे हम एक के ऊपर एक सजे
हुए अनाज के गुच्छे निकालते हैं।
और खजूर के पेड़ों से, जिनके गुच्छे आसानी से पहुँच में होते हैं।
और अंगूर, ज़ैतून (जैतून) और अनार के बाग़ भी हैं, जो 'रूप' में एक जैसे लगते हैं लेकिन 'स्वाद' में भिन्न होते हैं।
उनके फल को देखो जब वह बनता है और पकता है!
निःसंदेह, इनमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो ईमान लाते हैं।
إِنَّ ٱللَّهَ فَالِقُ ٱلۡحَبِّ وَٱلنَّوَىٰۖ يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَمُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتِ مِنَ ٱلۡحَيِّۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُۖ فَأَنَّىٰ تُؤۡفَكُونَ95
فَالِقُ ٱلۡإِصۡبَاحِ وَجَعَلَ ٱلَّيۡلَ سَكَنٗا وَٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ حُسۡبَانٗاۚ ذَٰلِكَ تَقۡدِيرُ ٱلۡعَزِيزِ ٱلۡعَلِيمِ96
وَهُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلنُّجُومَ لِتَهۡتَدُواْ بِهَا فِي ظُلُمَٰتِ ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِۗ قَدۡ فَصَّلۡنَا ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يَعۡلَمُونَ97
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنشَأَكُم مِّن نَّفۡسٖ وَٰحِدَةٖ فَمُسۡتَقَرّٞ وَمُسۡتَوۡدَعٞۗ قَدۡ فَصَّلۡنَا ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يَفۡقَهُونَ98
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجۡنَا بِهِۦ نَبَاتَ كُلِّ شَيۡءٖ فَأَخۡرَجۡنَا مِنۡهُ خَضِرٗا نُّخۡرِجُ مِنۡهُ حَبّٗا مُّتَرَاكِبٗا وَمِنَ ٱلنَّخۡلِ مِن طَلۡعِهَا قِنۡوَانٞ دَانِيَةٞ وَجَنَّٰتٖ مِّنۡ أَعۡنَابٖ وَٱلزَّيۡتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُشۡتَبِهٗا وَغَيۡرَ مُتَشَٰبِهٍۗ ٱنظُرُوٓاْ إِلَىٰ ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثۡمَرَ وَيَنۡعِهِۦٓۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكُمۡ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ99

ज्ञान की बातें
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कुरान हमेशा उन लोगों की निंदा करता है जो दावा करते हैं कि अल्लाह के बच्चे हैं।
इसमें ईसाई शामिल हैं जो मानते हैं कि यीशु (ईसा) ईश्वर का पुत्र है, साथ ही मूर्ति-पूजक भी जो मानते थे कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ थीं (आयतः
100)।
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मुसलमानों के रूप में, हम मानते हैं कि अल्लाह के कोई बेटे या बेटियाँ नहीं हैं।
बहुत से लोग सोचते हैं कि उनके लिए बच्चे होना महत्वपूर्ण है ताकि वे बुढ़ापे में उनका सहारा बनें या उनकी देखभाल करें, या उनके मरने के बाद
उनका नाम आगे बढ़ाएँ।
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क्या अल्लाह को इनमें से किसी चीज़ की ज़रूरत है?
बिलकुल नहीं!
वह शक्तिशाली और शाश्वत रब है, जिसका ब्रह्मांड की हर चीज़ पर अधिकार है।
हम सभी को उसकी ज़रूरत है, लेकिन उसे हम में से किसी की ज़रूरत नहीं है।
हमारा अस्तित्व हो या न हो, इससे उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अल्लाह के कोई बच्चे नहीं हैं।
100फिर भी वे इनकार करने वाले जिन्नों को अल्लाह का शरीक ठहराते हैं, जबकि उसी ने उन्हें पैदा किया।
और उन्होंने नादानी से उसके लिए बेटे और बेटियाँ गढ़ लीं।
वह उनकी मनगढ़ंत बातों से बहुत पाक और बुलंद है।
101वह आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला है।
उसके औलाद कैसे हो सकती है, जबकि उसकी कोई साथी नहीं?
उसने सब चीज़ें पैदा कीं और उसे हर चीज़ का पूरा ज्ञान है।
102वही अल्लाह तुम्हारा रब है!
उसके सिवा कोई माबूद नहीं जो इबादत के लायक हो।
वह हर चीज़ का पैदा करने वाला है, तो उसी की इबादत करो।
और वही हर चीज़ का निगरां है।
103कोई आँख उसे पा नहीं सकती, मगर वह सब आँखों को पा लेता है।
वह छोटी से छोटी चीज़ों को जानता है और पूरी तरह से ख़बरदार है।
وَجَعَلُواْ لِلَّهِ شُرَكَآءَ ٱلۡجِنَّ وَخَلَقَهُمۡۖ وَخَرَقُواْ لَهُۥ بَنِينَ وَبَنَٰتِۢ بِغَيۡرِ عِلۡمٖۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يَصِفُونَ100
بَدِيعُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُۥ وَلَدٞ وَلَمۡ تَكُن لَّهُۥ صَٰحِبَةٞۖ وَخَلَقَ كُلَّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ101
ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمۡۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖ فَٱعۡبُدُوهُۚ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ102
لَّا تُدۡرِكُهُ ٱلۡأَبۡصَٰرُ وَهُوَ يُدۡرِكُ ٱلۡأَبۡصَٰرَۖ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلۡخَبِيرُ103
मानवता के लिए आह्वान
104कहो, 'ऐ नबी,' "तुम्हारे रब की तरफ से तुम्हारे पास बहुत सी रौशन दलीलें आ चुकी हैं।
तो जो कोई देखना चाहेगा, वह अपने ही भले के लिए देखेगा।
और जो कोई अंधा होना चाहेगा, वह अपने ही नुकसान के लिए अंधा होगा।
और मैं तुम पर कोई निगहबान नहीं हूँ।
"
105और इस तरह हमने आयतों को बयान किया है ताकि वे इनकार करने वाले कहें, "तुमने दूसरों से सीखा है," और ताकि हम इस 'कुरान' को जानने वाले
लोगों के लिए साफ़ कर दें।
106'ऐ नबी,' जो कुछ तुम्हारे रब की तरफ से तुम पर नाज़िल किया गया है, उसी की पैरवी करते रहो—उसके सिवा कोई माबूद नहीं—और मुशरिकों से मुँह मोड़
लो।
107अगर अल्लाह चाहता, तो वे कभी किसी को उसका शरीक न बनाते।
लेकिन हमने तुम्हें उन पर कोई निगहबान नहीं बनाया है, और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो।
قَدۡ جَآءَكُم بَصَآئِرُ مِن رَّبِّكُمۡۖ فَمَنۡ أَبۡصَرَ فَلِنَفۡسِهِۦۖ وَمَنۡ عَمِيَ فَعَلَيۡهَاۚ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيۡكُم بِحَفِيظ104
وَكَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ ٱلۡأٓيَٰتِ وَلِيَقُولُواْ دَرَسۡتَ وَلِنُبَيِّنَهُۥ لِقَوۡمٖ يَعۡلَمُونَ105
ٱتَّبِعۡ مَآ أُوحِيَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ وَأَعۡرِضۡ عَنِ ٱلۡمُشۡرِكِينَ106
وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشۡرَكُواْۗ وَمَا جَعَلۡنَٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيظٗاۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيۡهِم بِوَكِيل107
मोमिनों को नसीहत
108उन चीज़ों को गाली मत दो जिनकी वे 'मूर्ति-पूजक' अल्लाह के सिवा पूजा करते हैं, वरना वे भी अल्लाह को धृष्टतापूर्वक और मूर्खता से गाली देंगे।
और इसी तरह हमने हर समुदाय के कर्मों को उनके लिए अच्छा बना दिया है।
लेकिन अंत में, वे सब अपने रब की ओर लौटेंगे, और वह उन्हें बताएगा कि उन्होंने क्या किया था।
109वे अल्लाह की कड़ी से कड़ी कसमें खाते हैं कि यदि उनके पास कोई चमत्कार आ जाए तो वे निश्चित रूप से उस पर विश्वास करेंगे।
कहो, 'ऐ पैगंबर, "चमत्कार केवल अल्लाह की ओर से आते हैं।
"' तुम्हें 'विश्वासियों' को क्या चीज़ यह एहसास कराएगी कि यदि उनके पास कोई चमत्कार आ भी जाए, तब भी वे विश्वास नहीं करेंगे?
110हम उनके दिलों और आँखों को 'सत्य से' फेरते रहते हैं, क्योंकि उन्होंने पहले ही विश्वास करने से इनकार कर दिया था, और उन्हें उनकी दुष्टता में अंधाधुंध
भटकने के लिए छोड़ देते हैं।
111भले ही हमने उनके पास फ़रिश्ते भेजे होते, मृतकों को उनसे बात करवाई होती, और उन्हें हर वह चमत्कार दिखाया होता जिसकी उन्होंने मांग की थी, वे फिर
भी विश्वास नहीं करते—जब तक कि अल्लाह उन्हें इसकी अनुमति न देता।
लेकिन उनमें से अधिकतर इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं।
وَلَا تَسُبُّواْ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَسُبُّواْ ٱللَّهَ عَدۡوَۢا بِغَيۡرِ عِلۡمٖۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمۡ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرۡجِعُهُمۡ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ108
وَأَقۡسَمُواْ بِٱللَّهِ جَهۡدَ أَيۡمَٰنِهِمۡ لَئِن جَآءَتۡهُمۡ ءَايَةٞ لَّيُؤۡمِنُنَّ بِهَاۚ قُلۡ إِنَّمَا ٱلۡأٓيَٰتُ عِندَ ٱللَّهِۖ وَمَا يُشۡعِرُكُمۡ أَنَّهَآ إِذَا جَآءَتۡ لَا يُؤۡمِنُونَ109
وَنُقَلِّبُ أَفِۡٔدَتَهُمۡ وَأَبۡصَٰرَهُمۡ كَمَا لَمۡ يُؤۡمِنُواْ بِهِۦٓ أَوَّلَ مَرَّةٖ وَنَذَرُهُمۡ فِي طُغۡيَٰنِهِمۡ يَعۡمَهُونَ110
وَلَوۡ أَنَّنَا نَزَّلۡنَآ إِلَيۡهِمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَحَشَرۡنَا عَلَيۡهِمۡ كُلَّ شَيۡءٖ قُبُلٗا مَّا كَانُواْ لِيُؤۡمِنُوٓاْ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ يَجۡهَلُونَ111
नबी को सलाह
112और इसी तरह हमने हर नबी के लिए दुश्मन बनाए हैं—बुरे इंसान और जिन्न—जो एक-दूसरे को धोखे की मीठी बातें फुसलाते हैं ताकि 'लोगों' को गुमराह करें।
अगर तुम्हारे रब ने चाहा होता, तो वे ऐसा नहीं कर सकते थे।
तो उन्हें और उनकी मनगढ़ंत बातों को छोड़ दो।
113ताकि उन लोगों के दिल जो आखिरत का इनकार करते हैं, ऐसी धोखेबाज़ी की तरफ हमेशा आकर्षित रहें, उससे संतुष्ट रहें, और अपने बुरे कर्म जारी रखें।
114कहो, 'ऐ पैगंबर,' "मैं अल्लाह के सिवा किसी और को कैसे निर्णायक मानूँ, जबकि उसने तुम्हारे लिए किताब 'सत्य के साथ' पूरी तरह से स्पष्ट करके उतारी है?
" जिन्हें किताब दी गई थी, वे जानते हैं कि यह तुम्हारे रब की तरफ से सत्य के साथ उतारी गई है।
तो तुम संदेह करने वालों में से मत हो।
115तुम्हारे रब का कलाम सत्य और न्याय में पूर्ण हो चुका है।
कोई उसके वचनों को बदल नहीं सकता।
और वह 'सब कुछ' सुनता और जानता है।
116अगर तुम धरती पर अधिकतर लोगों का कहना मानते, तो वे तुम्हें अल्लाह के रास्ते से भटका देते।
वे केवल झूठे अनुमानों का पालन करते हैं और झूठ के सिवा कुछ नहीं करते।
117बेशक आपका रब ही सबसे बेहतर जानता है कि कौन उसकी राह से भटकता है और कौन हिदायत याफ्ता है।
وَكَذَٰلِكَ جَعَلۡنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوّٗا شَيَٰطِينَ ٱلۡإِنسِ وَٱلۡجِنِّ يُوحِي بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٖ زُخۡرُفَ ٱلۡقَوۡلِ غُرُورٗاۚ وَلَوۡ شَآءَ رَبُّكَ مَا فَعَلُوهُۖ فَذَرۡهُمۡ وَمَا يَفۡتَرُونَ112
وَلِتَصۡغَىٰٓ إِلَيۡهِ أَفِۡٔدَةُ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأٓخِرَةِ وَلِيَرۡضَوۡهُ وَلِيَقۡتَرِفُواْ مَا هُم مُّقۡتَرِفُونَ113
أَفَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡتَغِي حَكَمٗا وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ إِلَيۡكُمُ ٱلۡكِتَٰبَ مُفَصَّلٗاۚ وَٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ يَعۡلَمُونَ أَنَّهُۥ مُنَزَّلٞ مِّن رَّبِّكَ بِٱلۡحَقِّۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُمۡتَرِينَ114
وَتَمَّتۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدۡقٗا وَعَدۡلٗاۚ لَّا مُبَدِّلَ لِكَلِمَٰتِهِۦۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ115
وَإِن تُطِعۡ أَكۡثَرَ مَن فِي ٱلۡأَرۡضِ يُضِلُّوكَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنۡ هُمۡ إِلَّا يَخۡرُصُونَ116
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعۡلَمُ مَن يَضِلُّ عَن سَبِيلِهِۦۖ وَهُوَ أَعۡلَمُ بِٱلۡمُهۡتَدِينَ117

पृष्ठभूमि की कहानी
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इस्लाम हलाल किए गए जानवरों का मांस खाने की अनुमति देता है, न कि मुर्दार मांस का।
तो, मूर्तिपूजक मुसलमानों का मज़ाक उड़ाते हुए यह तर्क देते थे, "तुम वह क्यों नहीं खाते जो अपने आप मर गया, जबकि अल्लाह ही उन्हें मौत देता है,
लेकिन तुम वह खाते हो जिसे तुम खुद मारते हो?
"
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निम्नलिखित अंश मूर्तिपूजकों को यह बताकर जवाब देता है कि मुसलमान केवल वही खाते हैं जो अल्लाह के नाम पर ज़बह किया गया हो।
जहाँ तक मुर्दार जानवरों का सवाल है, उन पर अल्लाह का नाम नहीं लिया जाता।
{इमाम इब्न आशूर}
हलाल और हराम माँस
118तो केवल उसी से खाओ जिस पर अल्लाह का नाम लिया गया हो, यदि तुम उसकी आयतों पर सचमुच ईमान रखते हो।
119और तुम क्यों न खाओगे उससे जिस पर अल्लाह का नाम लिया गया हो, जबकि उसने तुम्हें पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उसने तुम्हारे लिए क्या
हराम किया है, सिवाय उसके जो तुम आवश्यकतावश खाने पर विवश हो जाओ?
परन्तु बहुत से लोग बिना किसी ज्ञान के अपनी इच्छाओं से दूसरों को गुमराह करते हैं।
तुम्हारा रब निश्चित रूप से उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो हद से आगे बढ़ जाते हैं।
120सभी पापों से बचो, चाहे वे खुले हों या छिपे हुए।
निःसंदेह, जो लोग पाप करते रहते हैं, उन्हें उनके कर्मों का बदला दिया जाएगा।
121उससे मत खाओ जिस पर अल्लाह का नाम न लिया गया हो, क्योंकि वह निश्चय ही पाप है।
निःसंदेह शैतान अपने साथियों को फुसलाते हैं ताकि वे तुमसे झगड़ा करें, और यदि तुमने उनकी बात मानी, तो तुम भी अल्लाह के साथ दूसरों को शरीक ठहराने
वाले हो जाओगे।
فَكُلُواْ مِمَّا ذُكِرَ ٱسۡمُ ٱللَّهِ عَلَيۡهِ إِن كُنتُم بَِٔايَٰتِهِۦ مُؤۡمِنِينَ118
وَمَا لَكُمۡ أَلَّا تَأۡكُلُواْ مِمَّا ذُكِرَ ٱسۡمُ ٱللَّهِ عَلَيۡهِ وَقَدۡ فَصَّلَ لَكُم مَّا حَرَّمَ عَلَيۡكُمۡ إِلَّا مَا ٱضۡطُرِرۡتُمۡ إِلَيۡهِۗ وَإِنَّ كَثِيرٗا لَّيُضِلُّونَ بِأَهۡوَآئِهِم بِغَيۡرِ عِلۡمٍۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعۡلَمُ بِٱلۡمُعۡتَدِينَ119
وَذَرُواْ ظَٰهِرَ ٱلۡإِثۡمِ وَبَاطِنَهُۥٓۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡسِبُونَ ٱلۡإِثۡمَ سَيُجۡزَوۡنَ بِمَا كَانُواْ يَقۡتَرِفُونَ120
وَلَا تَأۡكُلُواْ مِمَّا لَمۡ يُذۡكَرِ ٱسۡمُ ٱللَّهِ عَلَيۡهِ وَإِنَّهُۥ لَفِسۡقٞۗ وَإِنَّ ٱلشَّيَٰطِينَ لَيُوحُونَ إِلَىٰٓ أَوۡلِيَآئِهِمۡ لِيُجَٰدِلُوكُمۡۖ وَإِنۡ أَطَعۡتُمُوهُمۡ إِنَّكُمۡ لَمُشۡرِكُونَ121

हिदायत याफ्ता और गुमराह
122यदि कोई मृत था तो हमने उसे जीवन दिया और उसे एक ऐसा नूर बख़्शा जो लोगों के बीच उसके कदमों को राह दिखाता है—क्या उसकी तुलना ऐसे
व्यक्ति से की जा सकती है जो घोर अंधकार में है जिससे वह कभी बाहर नहीं निकल सकता?
इसी तरह इनकार करने वालों के बुरे कर्म उन्हें सुहावने लगते हैं।
123और इसी तरह हमने हर बस्ती में कुछ बड़े-बड़े अपराधी रखे हैं ताकि वे वहाँ कुचक्र रचें।
जबकि वे केवल अपने ही विरुद्ध चालें चलते हैं, पर उन्हें इसका भान नहीं होता।
124जब कभी उनके पास कोई आयत आती है, तो वे कहते हैं, 'हम कदापि ईमान नहीं लाएँगे जब तक हमें भी वैसी ही वह्यी न मिले जैसी अल्लाह
के रसूलों को मिलती है।
' और अल्लाह ही बेहतर जानता है कि अपना पैग़ाम कहाँ रखे।
इन अपराधियों को जल्द ही अल्लाह की ओर से अपमान और उनके कुचक्रों के कारण कठोर अज़ाब पहुँचेगा।
125जिसे अल्लाह हिदायत देना चाहता है, वह उसके सीने को इस्लाम के लिए खोल देता है।
लेकिन जिसे वह भटकने के लिए छोड़ देता है, वह उसके सीने को तंग और घुटा हुआ कर देता है जैसे कि वह आकाश में चढ़ रहा हो।
इसी तरह अल्लाह उन लोगों पर गंदगी डाल देता है जो ईमान नहीं लाते।
126और यही तुम्हारे रब का सीधा मार्ग है।
हमने उन लोगों के लिए निशानियाँ पहले ही स्पष्ट कर दी हैं जो नसीहत हासिल करते हैं।
127उनके लिए अपने रब के पास शांति का घर होगा।
और वह उनके आमाल के कारण उनका संरक्षक होगा।
أَوَ مَن كَانَ مَيۡتٗا فَأَحۡيَيۡنَٰهُ وَجَعَلۡنَا لَهُۥ نُورٗا يَمۡشِي بِهِۦ فِي ٱلنَّاسِ كَمَن مَّثَلُهُۥ فِي ٱلظُّلُمَٰتِ لَيۡسَ بِخَارِجٖ مِّنۡهَاۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلۡكَٰفِرِينَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ122
وَكَذَٰلِكَ جَعَلۡنَا فِي كُلِّ قَرۡيَةٍ أَكَٰبِرَ مُجۡرِمِيهَا لِيَمۡكُرُواْ فِيهَاۖ وَمَا يَمۡكُرُونَ إِلَّا بِأَنفُسِهِمۡ وَمَا يَشۡعُرُونَ123
وَإِذَا جَآءَتۡهُمۡ ءَايَةٞ قَالُواْ لَن نُّؤۡمِنَ حَتَّىٰ نُؤۡتَىٰ مِثۡلَ مَآ أُوتِيَ رُسُلُ ٱللَّهِۘ ٱللَّهُ أَعۡلَمُ حَيۡثُ يَجۡعَلُ رِسَالَتَهُۥۗ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ أَجۡرَمُواْ صَغَارٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعَذَابٞ شَدِيدُۢ بِمَا كَانُواْ يَمۡكُرُونَ124
فَمَن يُرِدِ ٱللَّهُ أَن يَهۡدِيَهُۥ يَشۡرَحۡ صَدۡرَهُۥ لِلۡإِسۡلَٰمِۖ وَمَن يُرِدۡ أَن يُضِلَّهُۥ يَجۡعَلۡ صَدۡرَهُۥ ضَيِّقًا حَرَجٗا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِي ٱلسَّمَآءِۚ كَذَٰلِكَ يَجۡعَلُ ٱللَّهُ ٱلرِّجۡسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ125
وَهَٰذَا صِرَٰطُ رَبِّكَ مُسۡتَقِيمٗاۗ قَدۡ فَصَّلۡنَا ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يَذَّكَّرُونَ126
لَهُمۡ دَارُ ٱلسَّلَٰمِ عِندَ رَبِّهِمۡۖ وَهُوَ وَلِيُّهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ127
इंसान और जिन क़यामत के दिन
128और (उस दिन को याद करो) जब वह उन सबको इकट्ठा करेगा और कहेगा, "हे जिन्नों के समूह!
तुमने मनुष्यों को बड़ी संख्या में गुमराह किया।
" और उनके मानवीय अनुयायी कहेंगे, "हे हमारे रब!
हमने एक-दूसरे की संगति से लाभ उठाया, लेकिन अब हम उस समय-सीमा तक पहुँच गए हैं जो तूने हमारे लिए निर्धारित की थी।
" वह उत्तर देगा, "आग तुम्हारा ठिकाना है, जहाँ तुम हमेशा रहोगे, सिवाय इसके कि अल्लाह कुछ और चाहे।
" निःसंदेह तुम्हारा रब पूर्ण हिकमत और ज्ञान वाला है।
129और इसी तरह हम ज़ालिमों को उनके कुकर्मों के कारण एक-दूसरे का साथी बना देते हैं।
130अल्लाह पूछेगा, "हे जिन्नों और मनुष्यों के समूह!
क्या तुम्हारे बीच से रसूल नहीं आए थे, जो मेरी आयतें सुनाते थे और तुम्हें इस दिन के आने की चेतावनी देते थे?
" वे चिल्लाएँगे, "हम अपने विरुद्ध गवाही देते हैं!
" उन्हें दुनियावी ज़िंदगी ने धोखा दिया था, इसलिए वे अपने विरुद्ध स्वीकार करेंगे कि उनके पास ईमान नहीं था।
131यह इसलिए है कि तुम्हारा रब किसी बस्ती को ज़ुल्म के कारण कभी नष्ट नहीं करेगा जबकि उसके लोग (सच्चाई से) बेख़बर हों।
132अंततः, हर एक का दर्जा उनके कर्मों के आधार पर होगा।
और तुम्हारा रब उनके कर्मों से बेख़बर नहीं है।
133तुम्हारा रब बेनियाज़ और रहमत वाला है।
अगर वह चाहे, तो तुम्हें हटा सकता है और तुम्हारी जगह जिसे चाहे ला सकता है, जैसे उसने तुम्हें दूसरी क़ौमों की औलाद से पैदा किया।
134तुमसे जिसका वादा किया गया है, वह यक़ीनन होकर रहेगा।
और तुम्हारे लिए कोई भागने की जगह नहीं होगी।
135कहो, 'ऐ पैग़म्बर, 'ऐ मेरी क़ौम!
तुम जो कर रहे हो, करते रहो; मैं भी वही करूँगा।
तुम्हें जल्द ही मालूम हो जाएगा कि अंजाम किसका होगा।
यक़ीनन, ज़ालिम कभी कामयाब नहीं होंगे!
''
وَيَوۡمَ يَحۡشُرُهُمۡ جَمِيعٗا يَٰمَعۡشَرَ ٱلۡجِنِّ قَدِ ٱسۡتَكۡثَرۡتُم مِّنَ ٱلۡإِنسِۖ وَقَالَ أَوۡلِيَآؤُهُم مِّنَ ٱلۡإِنسِ رَبَّنَا ٱسۡتَمۡتَعَ بَعۡضُنَا بِبَعۡضٖ وَبَلَغۡنَآ أَجَلَنَا ٱلَّذِيٓ أَجَّلۡتَ لَنَاۚ قَالَ ٱلنَّارُ مَثۡوَىٰكُمۡ خَٰلِدِينَ فِيهَآ إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٞ128
وَكَذَٰلِكَ نُوَلِّي بَعۡضَ ٱلظَّٰلِمِينَ بَعۡضَۢا بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ129
يَٰمَعۡشَرَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِ أَلَمۡ يَأۡتِكُمۡ رُسُلٞ مِّنكُمۡ يَقُصُّونَ عَلَيۡكُمۡ ءَايَٰتِي وَيُنذِرُونَكُمۡ لِقَآءَ يَوۡمِكُمۡ هَٰذَاۚ قَالُواْ شَهِدۡنَا عَلَىٰٓ أَنفُسِنَاۖ وَغَرَّتۡهُمُ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا وَشَهِدُواْ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمۡ أَنَّهُمۡ كَانُواْ كَٰفِرِينَ130
ذَٰلِكَ أَن لَّمۡ يَكُن رَّبُّكَ مُهۡلِكَ ٱلۡقُرَىٰ بِظُلۡمٖ وَأَهۡلُهَا غَٰفِلُونَ131
وَلِكُلّٖ دَرَجَٰتٞ مِّمَّا عَمِلُواْۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَٰفِلٍ عَمَّا يَعۡمَلُونَ132
وَرَبُّكَ ٱلۡغَنِيُّ ذُو ٱلرَّحۡمَةِۚ إِن يَشَأۡ يُذۡهِبۡكُمۡ وَيَسۡتَخۡلِفۡ مِنۢ بَعۡدِكُم مَّا يَشَآءُ كَمَآ أَنشَأَكُم مِّن ذُرِّيَّةِ قَوۡمٍ ءَاخَرِينَ133
إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لَأٓتٖۖ وَمَآ أَنتُم بِمُعۡجِزِينَ134
قُلۡ يَٰقَوۡمِ ٱعۡمَلُواْ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمۡ إِنِّي عَامِلٞۖ فَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَ مَن تَكُونُ لَهُۥ عَٰقِبَةُ ٱلدَّارِۚ إِنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلظَّٰلِمُونَ135

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
निम्नलिखित अंश मूर्तिपूजकों की कुछ कुप्रथाओं की आलोचना करता है।
इमाम अल-क़ुर्तुबी के अनुसार:
- •
1.
वे अल्लाह के लिए अपनी संपत्ति का एक हिस्सा (गरीबों को दान के रूप में) निर्धारित करते थे।
वे अपनी मूर्तियों के लिए भी एक हिस्सा (मूर्ति-रक्षकों के शुल्क के रूप में) निर्धारित करते थे।
हालांकि, अल्लाह का हिस्सा हमेशा रक्षकों की जेब में चला जाता था, जबकि मूर्तियों का हिस्सा कभी भी गरीबों को दान नहीं किया जाता था।
- •
2.
इस्लाम से पहले, कुछ अरबवासी गरीबी या शर्म के डर से अपने बच्चों (विशेषकर लड़कियों) की हत्या कर देते थे।
- •
3.
कुछ अन्य लोग प्रतिज्ञा करते थे कि यदि उन्हें बेटों की एक निश्चित संख्या प्राप्त होती, तो वे एक बेटे की बलि देंगे।
- •
4.
वे बिना किसी ज्ञान के मनमाने ढंग से चीजों को अनुमति देते थे या प्रतिबंधित करते थे।
मुशरिकों की कुप्रथाएँ
136और उन्होंने अल्लाह के लिए उस खेती और चौपायों में से हिस्सा मुकर्रर किया जो उसने पैदा किए, और अपने ख्याल में कहते हैं कि 'यह अल्लाह का
है' और 'यह हमारे माबूदों का है।
' फिर जो उनके माबूदों का हिस्सा है वह अल्लाह तक नहीं पहुँचता, और जो अल्लाह का हिस्सा है वह उनके माबूदों तक पहुँच जाता है।
कितना बुरा है उनका फैसला!
137और इसी तरह मुशरिकों के शरीकों ने उनके लिए अपनी औलाद का कत्ल करना खुशनुमा बना दिया है, ताकि उन्हें हलाक करें और उनके दीन को उन पर
मुश्तबा कर दें।
अगर अल्लाह चाहता तो वे ऐसा न करते।
तो उन्हें और उनकी मनगढ़ंत बातों को छोड़ दो।
138और वे कहते हैं कि 'यह चौपाए और खेती हराम है, इसे वही खा सकता है जिसे हम चाहें' - उनके ख्याल में।
और कुछ चौपाए ऐसे हैं जिनकी पीठों पर सवारी हराम कर दी गई है, और कुछ चौपाए ऐसे हैं जिन पर वे अल्लाह का नाम नहीं लेते -
अल्लाह पर झूठ गढ़ते हुए।
अल्लाह उन्हें उनके झूठ का बदला देगा।
139और वे कहते हैं कि 'जो इन चौपायों के पेट में है वह हमारे मर्दों के लिए खास है और हमारी औरतों पर हराम है, और अगर वह
मरा हुआ पैदा हो तो वे सब उसमें शरीक हैं।
' अल्लाह उन्हें उनकी मनगढ़ंत बातों का बदला देगा।
बेशक वह हिकमत वाला, इल्म वाला है।
140बेशक घाटे में रहे वे लोग जिन्होंने अपनी औलाद को बेवकूफी और जहालत से कत्ल किया, और जो अल्लाह ने उन्हें रिज़्क़ दिया था उसे हराम कर लिया
- अल्लाह पर झूठ गढ़ते हुए।
वे गुमराह हो गए और हिदायत पाने वालों में से नहीं हैं।
وَجَعَلُواْ لِلَّهِ مِمَّا ذَرَأَ مِنَ ٱلۡحَرۡثِ وَٱلۡأَنۡعَٰمِ نَصِيبٗا فَقَالُواْ هَٰذَا لِلَّهِ بِزَعۡمِهِمۡ وَهَٰذَا لِشُرَكَآئِنَاۖ فَمَا كَانَ لِشُرَكَآئِهِمۡ فَلَا يَصِلُ إِلَى ٱللَّهِۖ وَمَا كَانَ لِلَّهِ فَهُوَ يَصِلُ إِلَىٰ شُرَكَآئِهِمۡۗ سَآءَ مَا يَحۡكُمُونَ136
وَكَذَٰلِكَ زَيَّنَ لِكَثِيرٖ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ قَتۡلَ أَوۡلَٰدِهِمۡ شُرَكَآؤُهُمۡ لِيُرۡدُوهُمۡ وَلِيَلۡبِسُواْ عَلَيۡهِمۡ دِينَهُمۡۖ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا فَعَلُوهُۖ فَذَرۡهُمۡ وَمَا يَفۡتَرُونَ137
وَقَالُواْ هَٰذِهِۦٓ أَنۡعَٰمٞ وَحَرۡثٌ حِجۡرٞ لَّا يَطۡعَمُهَآ إِلَّا مَن نَّشَآءُ بِزَعۡمِهِمۡ وَأَنۡعَٰمٌ حُرِّمَتۡ ظُهُورُهَا وَأَنۡعَٰمٞ لَّا يَذۡكُرُونَ ٱسۡمَ ٱللَّهِ عَلَيۡهَا ٱفۡتِرَآءً عَلَيۡهِۚ سَيَجۡزِيهِم بِمَا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ138
١٣٨ وَقَالُواْ مَا فِي بُطُونِ هَٰذِهِ ٱلۡأَنۡعَٰمِ خَالِصَةٞ لِّذُكُورِنَا وَمُحَرَّمٌ عَلَىٰٓ أَزۡوَٰجِنَاۖ وَإِن يَكُن مَّيۡتَةٗ فَهُمۡ فِيهِ شُرَكَآءُۚ سَيَجۡزِيهِمۡ وَصۡفَهُمۡۚ إِنَّهُۥ حَكِيمٌ عَلِيمٞ139
قَدۡ خَسِرَ ٱلَّذِينَ قَتَلُوٓاْ أَوۡلَٰدَهُمۡ سَفَهَۢا بِغَيۡرِ عِلۡمٖ وَحَرَّمُواْ مَا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُ ٱفۡتِرَآءً عَلَى ٱللَّهِۚ قَدۡ ضَلُّواْ وَمَا كَانُواْ مُهۡتَدِينَ140

अल्लाह की रहमतें
141वह वही है जिसने बाग़ पैदा किए हैं, जो मचानों पर चढ़ाए जाते हैं और जो मचानों पर नहीं चढ़ाए जाते, और खजूर के पेड़, विभिन्न स्वाद की
फसलें, जैतून और अनार—जो रूप में एक जैसे दिखते हैं, पर स्वाद में अलग-अलग हैं।
जब वे फल दें तो उनके फल खाओ और उनकी ज़कात कटाई के दिन अदा करो, पर फ़ुज़ूलख़र्ची न करो।
निःसंदेह वह फ़ुज़ूलख़र्ची करने वालों को पसंद नहीं करता।
142कुछ चौपाए बोझ उठाने वाले हैं और कुछ छोटे हैं।
अल्लाह ने तुम्हें जो कुछ दिया है, उसमें से खाओ, और शैतान के पदचिह्नों का अनुसरण न करो।
निःसंदेह वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।
143अल्लाह ने चार जोड़े बनाए हैं: भेड़ में से दो और बकरियों में से दो।
पूछो (उन मूर्तिपूजकों से, हे पैगंबर), 'क्या उसने दोनों नर को हराम किया है या दोनों मादा को, या जो दोनों मादाओं के गर्भ में है?
' मुझे 'निश्चित' ज्ञान के साथ बताओ, यदि तुम्हारी बात सच है।
144उसने ऊँटों में से दो और गायों में से दो भी प्रदान किए हैं।
उनसे पूछो, 'क्या उसने दोनों नर को हराम किया है या दोनों मादा को, या जो दोनों मादाओं के गर्भ में है?
या क्या तुम उपस्थित थे जब अल्लाह ने तुम्हें यह आदेश दिया था?
' उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ गढ़ता है ताकि दूसरों को बिना किसी ज्ञान के गुमराह कर सके?
निःसंदेह अल्लाह ज़ालिम लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنشَأَ جَنَّٰتٖ مَّعۡرُوشَٰتٖ وَغَيۡرَ مَعۡرُوشَٰتٖ وَٱلنَّخۡلَ وَٱلزَّرۡعَ مُخۡتَلِفًا أُكُلُهُۥ وَٱلزَّيۡتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُتَشَٰبِهٗا وَغَيۡرَ مُتَشَٰبِهٖۚ كُلُواْ مِن ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثۡمَرَ وَءَاتُواْ حَقَّهُۥ يَوۡمَ حَصَادِهِۦۖ وَلَا تُسۡرِفُوٓاْۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُسۡرِفِينَ141
وَمِنَ ٱلۡأَنۡعَٰمِ حَمُولَةٗ وَفَرۡشٗاۚ كُلُواْ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ وَلَا تَتَّبِعُواْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوّٞ مُّبِينٞ142
ثَمَٰنِيَةَ أَزۡوَٰجٖۖ مِّنَ ٱلضَّأۡنِ ٱثۡنَيۡنِ وَمِنَ ٱلۡمَعۡزِ ٱثۡنَيۡنِۗ قُلۡ ءَآلذَّكَرَيۡنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلۡأُنثَيَيۡنِ أَمَّا ٱشۡتَمَلَتۡ عَلَيۡهِ أَرۡحَامُ ٱلۡأُنثَيَيۡنِۖ نَبُِّٔونِي بِعِلۡمٍ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ143
وَمِنَ ٱلۡإِبِلِ ٱثۡنَيۡنِ وَمِنَ ٱلۡبَقَرِ ٱثۡنَيۡنِۗ قُلۡ ءَآلذَّكَرَيۡنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلۡأُنثَيَيۡنِ أَمَّا ٱشۡتَمَلَتۡ عَلَيۡهِ أَرۡحَامُ ٱلۡأُنثَيَيۡنِۖ أَمۡ كُنتُمۡ شُهَدَآءَ إِذۡ وَصَّىٰكُمُ ٱللَّهُ بِهَٰذَاۚ فَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبٗا لِّيُضِلَّ ٱلنَّاسَ بِغَيۡرِ عِلۡمٍۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ144
हराम मांस
145कहो, 'ऐ पैगंबर,' 'जो कुछ मुझ पर वह्य किया गया है, उसमें मैं किसी खाने वाले के लिए कोई ऐसी चीज़ हराम नहीं पाता सिवाय इसके कि: मुर्दार
(मरा हुआ जानवर), बहता हुआ रक्त, सूअर का मांस—क्योंकि वह अपवित्र है—या वह पापपूर्ण चीज़ जिस पर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम पुकारा गया हो।
लेकिन यदि कोई व्यक्ति विवश होकर खाए—न तो उसकी इच्छा हो और न ही आवश्यकता से अधिक खाए—तो निश्चित रूप से तुम्हारा रब बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।
'
146और यहूदियों के लिए हमने हराम किया था हर वह जानवर जिसके खुर फटे हुए न हों और गायों तथा भेड़ों की चर्बी, सिवाय उसके जो उनकी पीठों
या अंतड़ियों से लगा हो या हड्डी से मिला हुआ हो।
यह हमने उन्हें उनकी सरकशी (नियम तोड़ने) के बदले में दिया था।
और निश्चित रूप से हम ही सच कहते हैं।
147लेकिन यदि वे तुम्हें झुठलाते हैं, 'ऐ पैगंबर,' तो उनसे कहो: 'तुम्हारा रब असीम दया वाला है, फिर भी उसकी यातना (सज़ा) दुष्ट लोगों से टाली नहीं जाएगी।
'
قُل لَّآ أَجِدُ فِي مَآ أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَىٰ طَاعِمٖ يَطۡعَمُهُۥٓ إِلَّآ أَن يَكُونَ مَيۡتَةً أَوۡ دَمٗا مَّسۡفُوحًا أَوۡ لَحۡمَ خِنزِيرٖ فَإِنَّهُۥ رِجۡسٌ أَوۡ فِسۡقًا أُهِلَّ لِغَيۡرِ ٱللَّهِ بِهِۦۚ فَمَنِ ٱضۡطُرَّ غَيۡرَ بَاغٖ وَلَا عَادٖ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ145
وَعَلَى ٱلَّذِينَ هَادُواْ حَرَّمۡنَا كُلَّ ذِي ظُفُرٖۖ وَمِنَ ٱلۡبَقَرِ وَٱلۡغَنَمِ حَرَّمۡنَا عَلَيۡهِمۡ شُحُومَهُمَآ إِلَّا مَا حَمَلَتۡ ظُهُورُهُمَآ أَوِ ٱلۡحَوَايَآ أَوۡ مَا ٱخۡتَلَطَ بِعَظۡمٖۚ ذَٰلِكَ جَزَيۡنَٰهُم بِبَغۡيِهِمۡۖ وَإِنَّا لَصَٰدِقُونَ146
فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَّبُّكُمۡ ذُو رَحۡمَةٖ وَٰسِعَةٖ وَلَا يُرَدُّ بَأۡسُهُۥ عَنِ ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡمُجۡرِمِينَ147
असत्य दलील
148मूर्तिपूजक कहेंगे, "यदि अल्लाह चाहता, तो न हमने और न हमारे बाप-दादाओं ने उसके साथ किसी को शरीक ठहराया होता और न किसी चीज़ को हराम किया होता।
" उनसे पहले वालों ने भी 'सत्य' को झुठलाया, यहाँ तक कि उन्होंने हमारी सज़ा चखी।
उनसे पूछो, 'ऐ पैगंबर, "क्या तुम्हारे पास कोई प्रमाण है जिसे तुम हमारे सामने पेश कर सको?
तुम केवल अटकलों पर चलते हो और तुम झूठ के सिवा कुछ नहीं कहते।
"'
149कहो, "अल्लाह के पास निर्णायक दलील है।
यदि वह चाहता, तो वह तुम सबको आसानी से मार्गदर्शन पर मजबूर कर सकता था।
"
150और कहो, "अपने गवाह लाओ जो यह गवाही दें कि अल्लाह ने यह सब हराम किया है।
" यदि वे ऐसी गवाही दें, तो उनकी बात मत मानो।
और उन लोगों की इच्छाओं का अनुसरण न करो जो हमारी आयतों का इन्कार करते हैं, परलोक पर ईमान नहीं रखते, और अपने रब के साथ दूसरों को
शरीक ठहराते हैं।
سَيَقُولُ ٱلَّذِينَ أَشۡرَكُواْ لَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشۡرَكۡنَا وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمۡنَا مِن شَيۡءٖۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ حَتَّىٰ ذَاقُواْ بَأۡسَنَاۗ قُلۡ هَلۡ عِندَكُم مِّنۡ عِلۡمٖ فَتُخۡرِجُوهُ لَنَآۖ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنۡ أَنتُمۡ إِلَّا تَخۡرُصُونَ148
قُلۡ فَلِلَّهِ ٱلۡحُجَّةُ ٱلۡبَٰلِغَةُۖ فَلَوۡ شَآءَ لَهَدَىٰكُمۡ أَجۡمَعِينَ149
قُلۡ هَلُمَّ شُهَدَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ يَشۡهَدُونَ أَنَّ ٱللَّهَ حَرَّمَ هَٰذَاۖ فَإِن شَهِدُواْ فَلَا تَشۡهَدۡ مَعَهُمۡۚ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَا وَٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأٓخِرَةِ وَهُم بِرَبِّهِمۡ يَعۡدِلُونَ150

अल्लाह के हुक्म
151कहो, हे पैगंबर, "आओ, मैं तुम्हें वह सुनाऊँ जो तुम्हारे रब ने तुम पर हराम किया है: उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ।
माता-पिता के साथ सद्व्यवहार करो।
अपनी औलाद को गरीबी के डर से कत्ल न करो।
हम तुम्हें भी रोज़ी देते हैं और उन्हें भी।
न तो खुले तौर पर और न गुप्त रूप से किसी भी बेहयाई के काम के करीब जाओ।
उस जान को कत्ल न करो जिसे अल्लाह ने हराम किया है, सिवाय हक़ के साथ।
यह वह है जिसका उसने तुम्हें हुक्म दिया है, ताकि तुम समझो।
"
152अनाथों के माल के करीब न जाओ, सिवाय इसके कि तुम उसे बेहतर बनाना चाहो, जब तक कि वे बालिग न हो जाएँ।
पूरा माप दो और न्याय के साथ तोलो।
हम किसी भी आत्मा पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते।
जब तुम बात करो तो न्याय करो, भले ही कोई करीबी रिश्तेदार शामिल हो।
और अल्लाह से किया हुआ अपना वादा पूरा करो।
यह वह है जिसका उसने तुम्हें हुक्म दिया है, ताकि तुम याद रखो।
153निःसंदेह, यही मेरा सीधा मार्ग है।
तो इसी का अनुसरण करो और दूसरे रास्तों का अनुसरण न करो, वरना वे तुम्हें उसके मार्ग से भटका देंगे।
यह वह है जिसका उसने तुम्हें हुक्म दिया है, ताकि तुम बुराई से बचो।
قُلۡ تَعَالَوۡاْ أَتۡلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمۡ عَلَيۡكُمۡۖ أَلَّا تُشۡرِكُواْ بِهِۦ شَيۡٔٗاۖ وَبِٱلۡوَٰلِدَيۡنِ إِحۡسَٰنٗاۖ وَلَا تَقۡتُلُوٓاْ أَوۡلَٰدَكُم مِّنۡ إِمۡلَٰقٖ نَّحۡنُ نَرۡزُقُكُمۡ وَإِيَّاهُمۡۖ وَلَا تَقۡرَبُواْ ٱلۡفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنۡهَا وَمَا بَطَنَۖ وَلَا تَقۡتُلُواْ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِي حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّۚ ذَٰلِكُمۡ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ151
وَلَا تَقۡرَبُواْ مَالَ ٱلۡيَتِيمِ إِلَّا بِٱلَّتِي هِيَ أَحۡسَنُ حَتَّىٰ يَبۡلُغَ أَشُدَّهُۥۚ وَأَوۡفُواْ ٱلۡكَيۡلَ وَٱلۡمِيزَانَ بِٱلۡقِسۡطِۖ لَا نُكَلِّفُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۖ وَإِذَا قُلۡتُمۡ فَٱعۡدِلُواْ وَلَوۡ كَانَ ذَا قُرۡبَىٰۖ وَبِعَهۡدِ ٱللَّهِ أَوۡفُواْۚ ذَٰلِكُمۡ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ152
وَأَنَّ هَٰذَا صِرَٰطِي مُسۡتَقِيمٗا فَٱتَّبِعُوهُۖ وَلَا تَتَّبِعُواْ ٱلسُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمۡ عَن سَبِيلِهِۦۚ ذَٰلِكُمۡ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ153
मूर्ति-पूजकों के पास कोई बहाना नहीं है।
154और (यह इसलिए भी था) ताकि हम उन पर अपनी नेमत पूरी करें जिन्होंने भलाई की, और हर चीज़ को स्पष्ट करें।
हमने मूसा को किताब दी थी, मार्गदर्शन और दया के रूप में, ताकि शायद उसकी क़ौम अपने रब से मुलाक़ात का यक़ीन कर ले।
155और यह 'क़ुरआन' एक बरकत वाली किताब है, जिसे हमने उतारा है।
तो इसका अनुसरण करो और इसे ध्यान में रखो ताकि तुम पर दया की जाए।
156अब तुम 'मूर्तिपूजक' यह तर्क नहीं दे सकते कि "हमसे पहले केवल दो समूहों पर किताबें उतारी गईं, और हम उनकी शिक्षाओं से अनभिज्ञ थे।
"
157और तुम यह भी नहीं कह सकते कि 'काश हम पर कोई किताब उतारी जाती, तो हम उन समूहों से बेहतर मार्गदर्शन पाते।
' तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे पास एक स्पष्ट किताब पहले ही आ चुकी है—एक मार्गदर्शन और दया।
तो उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह की आयतों को झुठलाता है और उनसे मुँह मोड़ता है?
हम उन लोगों को, जो हमारी आयतों से मुँह मोड़ते हैं, उनके इस काम के लिए एक भयानक सज़ा देंगे।
158क्या वे बस इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि उनके पास फ़रिश्ते आ जाएँ, या तुम्हारा रब ख़ुद आ जाए, या तुम्हारे रब की कुछ 'बड़ी'
निशानियाँ आ जाएँ?
लेकिन जिस दिन तुम्हारे रब की कुछ निशानियाँ आ जाएँगी, उस दिन उन लोगों के लिए बहुत देर हो चुकी होगी जो 'अचानक' ईमान लाएँगे, क्योंकि उन्होंने पहले
इनकार किया था, और उन लोगों के लिए भी जिन्होंने अपने ईमान के ज़रिए भलाई नहीं की।
कहो, 'इंतज़ार करते रहो!
हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।
'
ثُمَّ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ تَمَامًا عَلَى ٱلَّذِيٓ أَحۡسَنَ وَتَفۡصِيلٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ لَّعَلَّهُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمۡ يُؤۡمِنُونَ154
وَهَٰذَا كِتَٰبٌ أَنزَلۡنَٰهُ مُبَارَكٞ فَٱتَّبِعُوهُ وَٱتَّقُواْ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ155
أَن تَقُولُوٓاْ إِنَّمَآ أُنزِلَ ٱلۡكِتَٰبُ عَلَىٰ طَآئِفَتَيۡنِ مِن قَبۡلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمۡ لَغَٰفِلِينَ156
أَوۡ تَقُولُواْ لَوۡ أَنَّآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا ٱلۡكِتَٰبُ لَكُنَّآ أَهۡدَىٰ مِنۡهُمۡۚ فَقَدۡ جَآءَكُم بَيِّنَةٞ مِّن رَّبِّكُمۡ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٞۚ فَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن كَذَّبَ بَِٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَصَدَفَ عَنۡهَاۗ سَنَجۡزِي ٱلَّذِينَ يَصۡدِفُونَ عَنۡ ءَايَٰتِنَا سُوٓءَ ٱلۡعَذَابِ بِمَا كَانُواْ يَصۡدِفُونَ157
هَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأۡتِيَهُمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ أَوۡ يَأۡتِيَ رَبُّكَ أَوۡ يَأۡتِيَ بَعۡضُ ءَايَٰتِ رَبِّكَۗ يَوۡمَ يَأۡتِي بَعۡضُ ءَايَٰتِ رَبِّكَ لَا يَنفَعُ نَفۡسًا إِيمَٰنُهَا لَمۡ تَكُنۡ ءَامَنَتۡ مِن قَبۡلُ أَوۡ كَسَبَتۡ فِيٓ إِيمَٰنِهَا خَيۡرٗاۗ قُلِ ٱنتَظِرُوٓاْ إِنَّا مُنتَظِرُونَ158
नबी को नसीहत
159निःसंदेह, आपका उन लोगों से कोई सरोकार नहीं है जिन्होंने अपने दीन को खंड-खंड कर दिया और गिरोहों में बँट गए।
उनका मामला अल्लाह के हवाले है।
और वही उन्हें बताएगा कि उन्होंने क्या किया।
160जो कोई नेकी लेकर आएगा, उसे दस गुना मिलेगा।
लेकिन जो कोई बुराई लेकर आएगा, उसे केवल एक का ही बदला दिया जाएगा।
और उन पर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।
161कहो, 'ऐ नबी, मेरे रब ने यकीनन मुझे सीधे रास्ते पर हिदायत दी है, एक अटल धर्म, इब्राहीम का दीन, जो एकाग्रचित्त थे और मुशरिकों में से नहीं
थे।
'
162कहो, 'यकीनन मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिए हैं—जो सारे जहानों का रब है।
'
163उसका कोई शरीक नहीं।
मुझे इसी का हुक्म दिया गया है, और मैं सबसे पहले फरमाबरदारी करने वाला हूँ।
164कहो, 'क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और रब को तलाश करूँ, जबकि वही हर चीज़ का रब है?
' कोई भी वही नहीं पाएगा सिवाय उसके जो उसने कमाया है।
कोई भी गुनाहगार दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा।
फिर तुम सब अपने रब की ओर लौटोगे, और वह तुम्हें उन बातों की सच्चाई बताएगा जिनमें तुम मतभेद करते थे।
165वही है जिसने तुम्हें ज़मीन का उत्तराधिकारी बनाया है और तुम में से कुछ को दूसरों पर दर्जों में ऊँचा किया है ताकि वह तुम्हें उस चीज़ से
परखे जो उसने तुम्हें दी है।
बेशक तुम्हारा रब सज़ा देने में बहुत तेज़ है, और बेशक वह बहुत क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।
إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَهُمۡ وَكَانُواْ شِيَعٗا لَّسۡتَ مِنۡهُمۡ فِي شَيۡءٍۚ إِنَّمَآ أَمۡرُهُمۡ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُواْ يَفۡعَلُونَ159
مَن جَآءَ بِٱلۡحَسَنَةِ فَلَهُۥ عَشۡرُ أَمۡثَالِهَاۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجۡزَىٰٓ إِلَّا مِثۡلَهَا وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ160
قُلۡ إِنَّنِي هَدَىٰنِي رَبِّيٓ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ دِينٗا قِيَمٗا مِّلَّةَ إِبۡرَٰهِيمَ حَنِيفٗاۚ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ161
قُلۡ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحۡيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ162
لَا شَرِيكَ لَهُۥۖ وَبِذَٰلِكَ أُمِرۡتُ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلۡمُسۡلِمِينَ163
قُلۡ أَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡغِي رَبّٗا وَهُوَ رَبُّ كُلِّ شَيۡءٖۚ وَلَا تَكۡسِبُ كُلُّ نَفۡسٍ إِلَّا عَلَيۡهَاۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٞ وِزۡرَ أُخۡرَىٰۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرۡجِعُكُمۡ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ فِيهِ تَخۡتَلِفُونَ164
وَهُوَ ٱلَّذِي جَعَلَكُمۡ خَلَٰٓئِفَ ٱلۡأَرۡضِ وَرَفَعَ بَعۡضَكُمۡ فَوۡقَ بَعۡضٖ دَرَجَٰتٖ لِّيَبۡلُوَكُمۡ فِي مَآ ءَاتَىٰكُمۡۗ إِنَّ رَبَّكَ سَرِيعُ ٱلۡعِقَابِ وَإِنَّهُۥ لَغَفُورٞ رَّحِيمُۢ165
हिन्दी बच्चों की अध्ययन मार्गदर्शिका
हिन्दी बच्चों के लिए कुरान अध्ययन: यह पृष्ठ हिन्दी परिवारों को सरल व्याख्या, अरबी आयत, हिन्दी अर्थ, तिलावत और दैनिक अभ्यास के साथ कुरान सीखने में मदद करता
है।
सूरह और आयत के नाम अरबी हो सकते हैं, लेकिन मुख्य सीखने की दिशा, दोहराव, पारिवारिक चर्चा और बच्चों की समझ हिन्दी संदर्भ में दी गई है।
हिन्दी पाठ मार्गदर्शन: हर भाग में अरबी आयत के साथ हिन्दी अर्थ, बच्चों के लिए सरल शिक्षा, छोटे प्रश्न, दोहराव और परिवार में चर्चा का रास्ता दिया गया
है।
यदि किसी क्रॉलर को कई अरबी शब्द दिखें, तो ये हिन्दी अनुच्छेद पृष्ठ की मुख्य भाषा स्पष्ट करते हैं: हिन्दी कुरान अध्ययन, हिन्दी अनुवाद, बच्चों का पाठ, तिलावत
और दैनिक अभ्यास।
Part 2 study note
This is part 2 of the children's lesson for Surah Al-An'âm.
It continues from the previous section with new verses, examples, and short review points for young learners.
If this is your first time studying the lesson, start with part 1 and then return here so the story, meaning, and practice sequence stay clear.
How to study Surah Al-An'âm with children
इस बच्चों के कुरान पाठ को चरणबद्ध तरीके से पढ़ें: पहले सरल व्याख्या पढ़ें, फिर अरबी आयत देखें, ज़रूरत हो तो तिलावत सुनें, और अंत में बच्चे से
मुख्य शिक्षा अपने शब्दों में दोहराने को कहें।
माता-पिता हर बार एक छोटा भाग चुन सकते हैं।
बच्चे से एक आसान प्रश्न पूछें, आयत का अर्थ फिर पढ़ें, और फिर उसी सूरह के पूरे पाठ या पास की दूसरी बच्चों की पाठ सामग्री की ओर
बढ़ें।
हिन्दी अध्ययन संदर्भ में यह पृष्ठ कुरान, सूरह, आयत, सरल व्याख्या, तिलावत, पारिवारिक चर्चा और दैनिक अभ्यास को जोड़ता है।
अरबी पाठ के साथ हिन्दी व्याख्या पढ़ने से बच्चों को अर्थ याद रखने में सहायता मिलती है।
हिन्दी बच्चों के कुरान पाठ में हिन्दी प्रश्न, हिन्दी व्याख्या, हिन्दी अनुवाद, परिवार में चर्चा, छोटी पुनरावृत्ति और तिलावत सुनने के चरण रखे गए हैं ताकि पृष्ठ का
मुख्य भाषा संकेत स्पष्ट रहे।
सूरह नाम या आयत अरबी में हो सकते हैं, लेकिन सीखने की दिशा हिन्दी है।
हिन्दी परिवार इस पृष्ठ से बच्चे को कुरान का अर्थ, आचरण, दुआ, दोहराव और दैनिक अभ्यास सिखा सकते हैं।