Surah 37
Volume 4

Those ˹Angels˺ Lined up in Ranks

الصَّافَّات

الصَّافّات

Surah Aṣ-Ṣâffât for kids content

LEARNING POINTS

सीखने के बिंदु

  • यह सूरह कुछ मूलभूत सच्चाइयों को उजागर करती है, जिनमें अल्लाह की एकता, मृत्यु के बाद का जीवन और मुहम्मद (ﷺ) की पैगंबरी शामिल है।

  • नूह, इब्राहिम, लूत और इलियास (अ.स.) की कौमों की कहानियों का उल्लेख सच्चाई को ठुकराने वाले काफ़िरों के लिए एक चेतावनी के रूप में किया गया है।

  • मूर्तिपूजकों की आलोचना की गई है क्योंकि उन्होंने पैगंबर (ﷺ) को एक पागल कवि कहा, यह दावा किया कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं, और मृत्यु के बाद के जीवन का मज़ाक उड़ाया।

  • अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है, जैसा कि हम यूनुस (अ.स.) की कौम की कहानी में देख सकते हैं।

  • यह सूरह आखिरत में काफ़िरों की सज़ा और मोमिनों के इनाम पर अधिक विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।

  • क़यामत के दिन काफ़िर इतने स्तब्ध होंगे कि वे एक-दूसरे की या यहाँ तक कि अपनी भी मदद नहीं कर पाएँगे।

  • पैगंबर (ﷺ) से कहा गया है कि अल्लाह के रसूल अंत में हमेशा जीतते हैं।

Illustration

एक ही अल्लाह

1क़सम है उन फ़रिश्तों की जो उपासना में पंक्तिबद्ध खड़े हैं।

2और उन की जो बादलों को हाँकते हैं।

3और उन की जो ज़िक्र (अनुस्मारक) की तिलावत करते हैं।

4निश्चित रूप से तुम्हारा पूज्य एक ही है—

5आकाशों और धरती का रब और जो कुछ उन दोनों के बीच है, और सभी मशरिक़ों (सूर्योदय स्थलों) का भी रब।

وَٱلصَّٰٓفَّٰتِ صَفّٗا1

فَٱلزَّٰجِرَٰتِ زَجۡرٗا2

فَٱلتَّٰلِيَٰتِ ذِكۡرًا3

إِنَّ إِلَٰهَكُمۡ لَوَٰحِدٞ4

رَّبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا وَرَبُّ ٱلۡمَشَٰرِقِ5

सजा हुआ और महफूज़ आसमान

6बेशक हमने सबसे निचले आसमान को तारों से सजाया है, शोभा के लिए।

7और हर सरकश शैतान से हिफाज़त के लिए।

8वे मला-ए-आ'ला की बातें नहीं सुन सकते, क्योंकि उन्हें हर तरफ से मारा जाता है।

9उन्हें भगाने के लिए। और उनके लिए एक निरंतर अज़ाब है।

10लेकिन जो कोई कोई बात चुराने में कामयाब हो जाता है, तो एक शोला-ए-साक़िब उसका पीछा करता है।

إِنَّا زَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنۡيَا بِزِينَةٍ ٱلۡكَوَاكِبِ6

وَحِفۡظٗا مِّن كُلِّ شَيۡطَٰنٖ مَّارِدٖ7

لَّا يَسَّمَّعُونَ إِلَى ٱلۡمَلَإِ ٱلۡأَعۡلَىٰ وَيُقۡذَفُونَ مِن كُلِّ جَانِبٖ8

دُحُورٗاۖ وَلَهُمۡ عَذَابٞ وَاصِبٌ9

إِلَّا مَنۡ خَطِفَ ٱلۡخَطۡفَةَ فَأَتۡبَعَهُۥ شِهَابٞ ثَاقِبٞ10

आख़िरत के मुनकिरों से एक प्रश्न

11अब उनसे पूछिए, 'ऐ पैगंबर', क्या उन्हें बनाना अधिक कठिन है या हमारी अन्य अद्भुत रचनाओं को? निःसंदेह हमने उन्हें चिपचिपी मिट्टी से बनाया।

12बल्कि, आप हैरान हैं 'क्योंकि वे कुफ़्र करते हैं' जबकि वे 'आपका' उपहास करते हैं।

13जब उन्हें नसीहत दी जाती है, तो वे उस पर कभी गौर नहीं करते।

14और जब भी वे कोई आयत देखते हैं, तो वे उसका उपहास करते हैं,

15कहते हैं, "यह तो बस खुला जादू है।"

16क्या! जब हम मर जाएँगे और मिट्टी तथा हड्डियाँ बन जाएँगे, तो क्या हमें सचमुच उठाया जाएगा?

17ओह! और हमारे बाप-दादा भी?

18कहो, "हाँ! और तुम ज़लील किए जाओगे।"

فَٱسۡتَفۡتِهِمۡ أَهُمۡ أَشَدُّ خَلۡقًا أَم مَّنۡ خَلَقۡنَآۚ إِنَّا خَلَقۡنَٰهُم مِّن طِينٖ لَّازِبِۢ11

بَلۡ عَجِبۡتَ وَيَسۡخَرُونَ12

وَإِذَا ذُكِّرُواْ لَا يَذۡكُرُونَ13

وَإِذَا رَأَوۡاْ ءَايَةٗ يَسۡتَسۡخِرُونَ14

وَقَالُوٓاْ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّا سِحۡرٞ مُّبِينٌ15

أَءِذَا مِتۡنَا وَكُنَّا تُرَابٗا وَعِظَٰمًا أَءِنَّا لَمَبۡعُوثُونَ16

أَوَ ءَابَآؤُنَا ٱلۡأَوَّلُونَ17

قُلۡ نَعَمۡ وَأَنتُمۡ دَٰخِرُونَ18

क़यामत के दिन झुठलाने वाले

19यह केवल एक चीख होगी, फिर वे तुरंत सब कुछ देख लेंगे।

20वे चिल्लाएँगे, "हाय अफ़सोस! हम बर्बाद हो गए! यह तो क़यामत का दिन है!"

21उनसे कहा जाएगा, "यह फ़ैसले का दिन है जिसका तुम इनकार किया करते थे।"

22अल्लाह फ़रिश्तों से कहेगा, "उन सब को इकट्ठा करो जिन्होंने ज़ुल्म किया, और उनके जैसे दूसरों को भी, और जिन (माबूदों) की वे पूजा किया करते थे

23अल्लाह के सिवा, फिर उन सब को जहन्नम के रास्ते पर ले जाओ।"

24और उन्हें ठहराओ। उनसे पूछताछ की जाएगी।

25फिर उनसे पूछा जाएगा, 'तुम्हें क्या हुआ है कि तुम अब एक-दूसरे की सहायता नहीं कर सकते?'

26बेशक, उस दिन वे पूर्णतः समर्पण करेंगे।

فَإِنَّمَا هِيَ زَجۡرَةٞ وَٰحِدَةٞ فَإِذَا هُمۡ يَنظُرُونَ19

وَقَالُواْ يَٰوَيۡلَنَا هَٰذَا يَوۡمُ ٱلدِّينِ20

هَٰذَا يَوۡمُ ٱلۡفَصۡلِ ٱلَّذِي كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ21

ٱحۡشُرُواْ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ وَأَزۡوَٰجَهُمۡ وَمَا كَانُواْ يَعۡبُدُونَ22

مِن دُونِ ٱللَّهِ فَٱهۡدُوهُمۡ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلۡجَحِيمِ23

وَقِفُوهُمۡۖ إِنَّهُم مَّسۡ‍ُٔولُونَ24

مَا لَكُمۡ لَا تَنَاصَرُونَ25

بَلۡ هُمُ ٱلۡيَوۡمَ مُسۡتَسۡلِمُونَ26

गुमराह करने वाले बनाम गुमराह

27वे एक-दूसरे पर पलटेंगे, इल्ज़ाम लगाते हुए।

28गुमराह लोग कहेंगे, "तुम ही थे जिन्होंने हमें सीधी राह से भटकाया।"

29गुमराह करने वाले जवाब देंगे, "नहीं! तुमने खुद ही कुफ़्र किया था।

30हमारा तुम पर कोई अधिकार नहीं था। बल्कि, तुम तो स्वयं ही हद से ज़्यादा सरकश थे।

31हमारे रब का फ़ैसला हम सब के विरुद्ध सच हो गया है: हम अवश्य ही अज़ाब चखेंगे।

32हमने तुम्हें गुमराह किया क्योंकि हम रास्ता भटक गए थे।

33बेशक उस दिन वे सब अज़ाब में शरीक होंगे।

وَأَقۡبَلَ بَعۡضُهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖ يَتَسَآءَلُونَ27

قَالُوٓاْ إِنَّكُمۡ كُنتُمۡ تَأۡتُونَنَا عَنِ ٱلۡيَمِينِ28

قَالُواْ بَل لَّمۡ تَكُونُواْ مُؤۡمِنِينَ29

وَمَا كَانَ لَنَا عَلَيۡكُم مِّن سُلۡطَٰنِۢۖ بَلۡ كُنتُمۡ قَوۡمٗا طَٰغِينَ30

فَحَقَّ عَلَيۡنَا قَوۡلُ رَبِّنَآۖ إِنَّا لَذَآئِقُونَ31

فَأَغۡوَيۡنَٰكُمۡ إِنَّا كُنَّا غَٰوِينَ32

فَإِنَّهُمۡ يَوۡمَئِذٖ فِي ٱلۡعَذَابِ مُشۡتَرِكُونَ33

मूर्ति पूजकों को चेतावनी

34निश्चय ही हम अपराधियों के साथ ऐसा ही करते हैं।

إِنَّا كَذَٰلِكَ نَفۡعَلُ بِٱلۡمُجۡرِمِينَ34

ईमान वालों का इनाम

40लेकिन यह अल्लाह के चुने हुए बंदों के लिए अलग होगा।

41उनके लिए ज्ञात प्रावधान होंगे:

42हर प्रकार के फल। और वे सम्मानित होंगे

43आनंद के बागों में,

44तख्तों पर एक-दूसरे के सामने।

45उन्हें बहती हुई धारा से एक शुद्ध पेय पिलाया जाएगा।

46जो सफेद और पीने में स्वादिष्ट होगा।

47इससे उन्हें न तो कोई हानि होगी और न ही यह उन्हें मदहोश करेगा।

48और उनके साथ बड़ी-बड़ी आँखों वाली हूरें होंगी, जो अपने पतियों के सिवा किसी और को नहीं देखेंगी।

49मानो वे शुद्ध मोती हों।

إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلۡمُخۡلَصِينَ40

أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ رِزۡقٞ مَّعۡلُومٞ41

فَوَٰكِهُ وَهُم مُّكۡرَمُونَ42

فِي جَنَّٰتِ ٱلنَّعِيمِ43

عَلَىٰ سُرُرٖ مُّتَقَٰبِلِينَ44

يُطَافُ عَلَيۡهِم بِكَأۡسٖ مِّن مَّعِينِۢ45

بَيۡضَآءَ لَذَّةٖ لِّلشَّٰرِبِينَ46

لَا فِيهَا غَوۡلٞ وَلَا هُمۡ عَنۡهَا يُنزَفُونَ47

وَعِندَهُمۡ قَٰصِرَٰتُ ٱلطَّرۡفِ عِينٞ48

كَأَنَّهُنَّ بَيۡضٞ مَّكۡنُونٞ49

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • दो दोस्त थे जिन्होंने अपना व्यवसाय बांटने का फैसला किया। उनमें से एक आस्तिक था जो दान देता था, परलोक में सवाब पाने की उम्मीद में। दूसरा परलोक को नहीं मानता था और आस्तिक का मज़ाक उड़ाता था।

  • काफ़िर कहता था, 'क्या तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है? क्या तुम सच में इस 'परलोक' की बातों पर यक़ीन करते हो? क्या हम सच में मरने के बाद और हमारे शरीर क़ब्र में सड़ जाने के बाद हिसाब के लिए खड़े होंगे?' वह आस्तिक पर हिसाब को नकारने का दबाव डालता रहा, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।

  • आख़िरकार, वे दोनों मर गए। आस्तिक जन्नत (स्वर्ग) में पहुँचा और इनकार करने वाला जहन्नम (नरक) में। आयतें 51-59 हमें आस्तिक की प्रतिक्रिया बताती हैं जब वह अपने व्यापारिक साथी को आग में देखता है।

जन्नती बातें करते हुए

50फिर वे एक-दूसरे की ओर मुड़कर आपस में पूछेंगे।

51उनमें से कोई कहेगा, "दुनिया में मेरा एक साथी था।"

52जो मुझसे पूछा करता था, "क्या तुम सचमुच आख़िरत पर यक़ीन रखते हो?"

53"जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ हो जाएँगे, तो क्या हमें सचमुच हिसाब के लिए खड़ा किया जाएगा?"

54वह फिर पूछेगा, "क्या तुम उसका हश्र देखना चाहोगे?"

55फिर वह (और दूसरे) उसे जहन्नम के बीच में देखेंगे और पा लेंगे।

56फिर वह कहेगा, "अल्लाह की क़सम! मैं तुम्हारी वजह से लगभग बर्बाद हो गया था।

57अगर मेरे रब की रहमत न होती, तो मैं भी (जहन्नम में) फँस गया होता।"

58फिर वह अपने साथी मोमिनों से पूछेगा, "क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि हम कभी नहीं मरेंगे,

59सिवाय हमारी पहली मौत के, और हमें दूसरों की तरह सज़ा नहीं दी जाएगी?"

60यह वास्तव में सबसे बड़ी सफलता है।

61ऐसे 'सम्मान' के लिए सभी को 'कड़ी मेहनत' करनी चाहिए।

فَأَقۡبَلَ بَعۡضُهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖ يَتَسَآءَلُونَ50

قَالَ قَآئِلٞ مِّنۡهُمۡ إِنِّي كَانَ لِي قَرِينٞ51

يَقُولُ أَءِنَّكَ لَمِنَ ٱلۡمُصَدِّقِينَ52

أَءِذَا مِتۡنَا وَكُنَّا تُرَابٗا وَعِظَٰمًا أَءِنَّا لَمَدِينُونَ53

قَالَ هَلۡ أَنتُم مُّطَّلِعُونَ54

فَٱطَّلَعَ فَرَءَاهُ فِي سَوَآءِ ٱلۡجَحِيمِ55

قَالَ تَٱللَّهِ إِن كِدتَّ لَتُرۡدِينِ56

وَلَوۡلَا نِعۡمَةُ رَبِّي لَكُنتُ مِنَ ٱلۡمُحۡضَرِينَ57

أَفَمَا نَحۡنُ بِمَيِّتِينَ58

إِلَّا مَوۡتَتَنَا ٱلۡأُولَىٰ وَمَا نَحۡنُ بِمُعَذَّبِينَ59

إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ60

لِمِثۡلِ هَٰذَا فَلۡيَعۡمَلِ ٱلۡعَٰمِلُونَ61

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • अबू जहल और अन्य मक्का के मूर्तिपूजकों ने पैगंबर (ﷺ) का उपहास किया जब उन्होंने उन्हें ज़क़्क़ूम के बारे में चेतावनी दी, जो नरक की गहराइयों से उगने वाला एक भयानक पेड़ है। उन्होंने कहा, 'नरक में पेड़ कैसे उग सकता है?'

  • अबू जहल ने अन्य मूर्तिपूजकों से कहा, 'यह ज़क़्क़ूम तो मक्खन के साथ स्वादिष्ट खजूरों से ज़्यादा कुछ नहीं है!' तब आयतें 62-65 अवतरित हुईं, जिनमें कहा गया कि यह पेड़ दिखने में और स्वाद में भयानक है।

जहन्नम वालों का अंजाम

62क्या यह 'सुख' बेहतर सत्कार है या ज़क़्क़ूम का पेड़?

63हमने इसे निश्चित रूप से उन लोगों के लिए एक आज़माइश बनाया है जो ज़ुल्म करते हैं।

64निश्चित रूप से यह एक ऐसा पेड़ है जो जहन्नम की गहराइयों से उगता है,

65जिसके फल शैतानों के सिरों जैसे दिखते हैं।

66गुनहगार यक़ीनन इससे खाएँगे, अपने पेट भरकर।

67फिर इसके अतिरिक्त उन्हें खौलते हुए पेय का मिश्रण दिया जाएगा।

68फिर वे जहन्नम में अपने ठिकाने पर लौटेंगे।

أَذَٰلِكَ خَيۡرٞ نُّزُلًا أَمۡ شَجَرَةُ ٱلزَّقُّومِ62

إِنَّا جَعَلۡنَٰهَا فِتۡنَةٗ لِّلظَّٰلِمِينَ63

إِنَّهَا شَجَرَةٞ تَخۡرُجُ فِيٓ أَصۡلِ ٱلۡجَحِيمِ64

طَلۡعُهَا كَأَنَّهُۥ رُءُوسُ ٱلشَّيَٰطِينِ65

فَإِنَّهُمۡ لَأٓكِلُونَ مِنۡهَا فَمَالِ‍ُٔونَ مِنۡهَا ٱلۡبُطُونَ66

ثُمَّ إِنَّ لَهُمۡ عَلَيۡهَا لَشَوۡبٗا مِّنۡ حَمِيمٖ67

ثُمَّ إِنَّ مَرۡجِعَهُمۡ لَإِلَى ٱلۡجَحِيمِ68

Illustration

अंधानुकरण

69निश्चय ही उन्होंने अपने बाप-दादाओं को गुमराह पाया,

70तो वे उनके पदचिह्नों पर दौड़ पड़े!

71और बेशक उनसे पहले अधिकतर पिछली पीढ़ियाँ गुमराह हो चुकी थीं,

72हालाँकि हमने उनके बीच डराने वाले पहले ही भेज दिए थे।

73तो देखो उन लोगों का क्या अंजाम हुआ जिन्हें डराया गया था।

74लेकिन अल्लाह के चुने हुए बंदों के लिए यह अलग होगा।

إِنَّهُمۡ أَلۡفَوۡاْ ءَابَآءَهُمۡ ضَآلِّينَ69

فَهُمۡ عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِمۡ يُهۡرَعُونَ70

وَلَقَدۡ ضَلَّ قَبۡلَهُمۡ أَكۡثَرُ ٱلۡأَوَّلِينَ71

وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا فِيهِم مُّنذِرِينَ72

فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُنذَرِينَ73

إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلۡمُخۡلَصِينَ74

नबी नूह

75बेशक नूह ने हमें पुकारा, और हम क्या ही ख़ूब जवाब देने वाले हैं!

76हमने उसे और उसकी क़ौम को भयानक अज़ाब से बचाया,

77और उसकी औलाद को ही बाक़ी रहने वाला बनाया।

78और हमने बाद की नस्लों में उसके लिए अच्छा ज़िक्र छोड़ा:

79"नूह पर सलाम हो तमाम जहानों में।"

80निश्चित रूप से हम इसी प्रकार सत्कर्म करने वालों को प्रतिफल देते हैं।

81वह वास्तव में हमारे निष्ठावान बंदों में से एक था।

82फिर हमने दूसरों को ग़र्क़ कर दिया।

وَلَقَدۡ نَادَىٰنَا نُوحٞ فَلَنِعۡمَ ٱلۡمُجِيبُونَ75

وَنَجَّيۡنَٰهُ وَأَهۡلَهُۥ مِنَ ٱلۡكَرۡبِ ٱلۡعَظِيمِ76

وَجَعَلۡنَا ذُرِّيَّتَهُۥ هُمُ ٱلۡبَاقِينَ77

وَتَرَكۡنَا عَلَيۡهِ فِي ٱلۡأٓخِرِينَ78

سَلَٰمٌ عَلَىٰ نُوحٖ فِي ٱلۡعَٰلَمِينَ79

إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُحۡسِنِينَ80

إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ81

ثُمَّ أَغۡرَقۡنَا ٱلۡأٓخَرِينَ82

पैगंबर इब्राहिम

83और निःसंदेह उसके मार्ग पर चलने वालों में से एक इब्राहीम था।

84(वह समय) याद करो जब वह अपने रब के पास एक पवित्र हृदय के साथ आया,

85और अपने पिता और अपनी क़ौम से कहा, "तुम किसकी इबादत कर रहे हो?"

86क्या तुम अल्लाह के बजाय झूठे देवताओं को चाहते हो?

87तो फिर तुम सारे जहान के रब से क्या उम्मीद रखते हो?

88फिर उसने तारों की ओर देखा और निश्चय किया।

89फिर उसने कहा, "मैं तो बीमार हूँ।"

90तो वे उससे मुँह फेर कर चले गए।

91फिर वह चुपके से उनकी पूज्य-प्रतिमाओं के पास गया और उपहास करते हुए बोला, "क्या तुम खाते नहीं?"

92तुम्हें क्या हो गया है कि तुम बात नहीं करते?

93फिर वह तेज़ी से उनकी ओर पलटा और अपने दाहिने हाथ से उन पर वार किया।

94फिर उसकी क़ौम क्रोधित होकर उसकी ओर दौड़ती हुई आई।

95उसने तर्क दिया, "तुम उसकी पूजा कैसे कर सकते हो जिसे तुम अपने हाथों से तराशते हो,

96जबकि अल्लाह ही वह है जिसने तुम्हें और जो कुछ तुम करते हो उसे पैदा किया है?"

97उन्होंने कहा, "उसके लिए एक भट्ठी बनाओ, और उसे धधकती आग में फेंक दो।"

98और उन्होंने उसे हानि पहुँचाने का प्रयास किया, परन्तु हमने उन्हें विफल कर दिया।

وَإِنَّ مِن شِيعَتِهِۦ لَإِبۡرَٰهِيمَ83

إِذۡ جَآءَ رَبَّهُۥ بِقَلۡبٖ سَلِيمٍ84

إِذۡ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦ مَاذَا تَعۡبُدُونَ85

أَئِفۡكًا ءَالِهَةٗ دُونَ ٱللَّهِ تُرِيدُونَ86

فَمَا ظَنُّكُم بِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ87

فَنَظَرَ نَظۡرَةٗ فِي ٱلنُّجُومِ88

فَقَالَ إِنِّي سَقِيمٞ89

فَتَوَلَّوۡاْ عَنۡهُ مُدۡبِرِينَ90

فَرَاغَ إِلَىٰٓ ءَالِهَتِهِمۡ فَقَالَ أَلَا تَأۡكُلُونَ91

مَا لَكُمۡ لَا تَنطِقُونَ92

فَرَاغَ عَلَيۡهِمۡ ضَرۡبَۢا بِٱلۡيَمِينِ93

فَأَقۡبَلُوٓاْ إِلَيۡهِ يَزِفُّونَ94

قَالَ أَتَعۡبُدُونَ مَا تَنۡحِتُونَ95

وَٱللَّهُ خَلَقَكُمۡ وَمَا تَعۡمَلُونَ96

قَالُواْ ٱبۡنُواْ لَهُۥ بُنۡيَٰنٗا فَأَلۡقُوهُ فِي ٱلۡجَحِيمِ97

فَأَرَادُواْ بِهِۦ كَيۡدٗا فَجَعَلۡنَٰهُمُ ٱلۡأَسۡفَلِينَ98

BACKGROUND STORY

पृष्ठभूमि की कहानी

  • इब्राहीम (अ.स.) महानतम पैगंबरों में से एक थे, जिन्होंने अपना जीवन अल्लाह की सेवा में बिताया। जब वे 86 वर्ष के हुए, तो वे संतान प्राप्ति के लिए बहुत उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने एक नेक संतान के लिए दुआ की। अंततः, अल्लाह ने उन्हें इस्माईल (अ.स.) से नवाज़ा।

  • Illustration
  • स्वाभाविक रूप से, इब्राहीम (अ.स.) अपने बेटे से पूरे दिल से प्यार करते थे। एक रात, उन्होंने सपने में देखा कि वे अपने इकलौते बेटे (जो अब 13 वर्ष का था) की कुर्बानी दे रहे हैं।

    उन्होंने यह सपना कुछ बार देखा, इसलिए उन्होंने इस्माईल (अ.स.) से पूछा, 'हमें क्या करना चाहिए?' इस्माईल (अ.स.) ने जवाब दिया, 'जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ से हुक्म दिया गया है, वही करो!'

  • जब इब्राहीम (अ.स.) और उनके बेटे कुर्बानी के लिए तैयार हुए, तो अल्लाह ने उन्हें पुकारा: 'ऐ इब्राहीम! तुमने पहले ही सपने के अनुसार अमल कर लिया है।

    अब तुमने अपना दिल पूरी तरह से हमें समर्पित कर दिया है, तो तुम्हारा बेटा तुम्हें वापस लौटाया जाता है!' तब स्वर्ग से एक नर भेड़ भेजी गई और उसकी जगह कुर्बानी के तौर पर पेश की गई। हम हर साल 'ईद अल-अज़हा' के दौरान इस कहानी का सम्मान करते हैं।

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • कोई पूछ सकता है, 'किसकी कुर्बानी दी जाने वाली थी: इस्माईल या इसहाक (अ.स.) की?' संक्षिप्त उत्तर है इस्माईल (अ.स.), जिसके कारण निम्नलिखित हैं। आयतों 100-111 में वर्णित कहानी इब्राहीम (अ.स.) को अपने बेटे की कुर्बानी देने के आदेश के बारे में है।

    कहानी समाप्त होने के बाद, आयत 112 के अनुसार, इब्राहीम (अ.स.) को दूसरे बेटे, इसहाक (अ.स.) से नवाज़ा गया।

  • Illustration
  • इब्राहीम (अ.स.) को अपने पहले बेटे की कुर्बानी देने का आदेश दिया गया था। इसहाक (अ.स.) उनके दूसरे बेटे थे। कुर्बानी की कहानी मक्का में हुई थी, जहाँ इस्माईल (अ.स.) रहते थे। इसहाक (अ.स.) कभी मक्का नहीं आए।

  • सूरह हूद (11:71) में, इब्राहीम (अ.स.) की पहली पत्नी सारा को फरिश्तों ने बताया था कि उन्हें इसहाक (अ.स.) नाम का एक बेटा होगा, जो बड़ा होकर याकूब (अ.स.) नाम के एक बेटे का पिता बनेगा। उस समय इब्राहीम (अ.स.) 99 वर्ष के थे।

    जिस बेटे की कुर्बानी दी जाने वाली थी वह एक युवा था, इसलिए वह इस्माईल (अ.स.) ही होने चाहिए।

WORDS OF WISDOM

ज्ञान की बातें

  • कुरान में कई नबियों और हस्तियों के नाम गहरे अर्थ रखते हैं जो उनकी मूल भाषाओं जैसे अरामाईक, हिब्रू और प्राचीन मिस्री में निहित हैं। ये अर्थ अक्सर व्यक्ति के गुणों या कहानी को दर्शाते हैं, जिससे उनकी कथा को समझने की एक गहरी परत जुड़ जाती है।

  • आस्था और आशा के नामों में शामिल हैं: **इब्राहिम** (अ.स.), जिसका अर्थ है 'आदर्श,' और **इशाक** (अ.स.), 'मुस्कुराने वाला।' आतिथ्य और दिव्य उत्तरों से संबंधित नाम हैं **यूसुफ** (अ.स.), 'मेजबानी करने वाला,' और **इस्माईल** (अ.स.), 'ईश्वर सुनता है।'

  • धैर्य और दृढ़ता नामों में परिलक्षित होती है: **नूह** (अ.स.), 'ठहरने वाला,' और **अय्यूब** (अ.स.), 'नुकसान से प्रभावित,' जो चुनौतियों के माध्यम से उनकी दृढ़ता को उजागर करती है।

  • अन्य नाम विशिष्ट भूमिकाओं पर जोर देते हैं: **मूसा** (अ.स.) का अर्थ है 'छोटा लड़का/बेटा,' जो उनके प्रारंभिक जीवन की याद दिलाता है, और **दाऊद** (अ.स.) का अर्थ है 'शक्तिशाली व्यक्ति,' जो उनकी शक्ति और अधिकार को दर्शाता है।

  • **जिब्रील** (अ.स.), 'महान शक्तियों वाला,' और **मरियम** (अ.स.), 'पूजा में समर्पित होने वाली,' जैसे नाम उनकी दिव्य भूमिकाओं और गहरी भक्ति को रेखांकित करते हैं।

  • अंततः, फ़िरौन और क़ारून सांसारिक अवधारणाओं को दर्शाते हैं। 'फ़िरौन' का अर्थ है 'महान घर,' जो भव्यता का प्रतीक है, जबकि 'क़ारून' का अर्थ है 'धन से लदा हुआ व्यक्ति,' जो उसके चरित्र के सांसारिक केंद्र बिंदु को स्पष्ट करता है।

इब्राहीम, इस्माईल और क़ुर्बानी

99बाद में इब्राहीम ने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ, वह मुझे मार्गदर्शन देगा।"

100ऐ मेरे रब! मुझे एक नेक औलाद प्रदान कर।

101तो हमने उसे एक सहनशील बेटे की खुशखबरी दी।

102फिर जब वह लड़का उसके साथ काम करने की उम्र को पहुँचा, इब्राहीम ने कहा, "ऐ मेरे प्यारे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं तुम्हें ज़बह कर रहा हूँ। तो बताओ तुम्हारी क्या राय है?" उसने जवाब दिया, "ऐ मेरे प्यारे अब्बा! जो तुम्हें हुक्म दिया गया है, वही करो। इंशाअल्लाह, तुम मुझे सब्र करने वाला पाओगे।"

103फिर जब उन दोनों ने अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाया, और इब्राहीम ने उसे उसके माथे के बल लिटा दिया (क़ुर्बानी के लिए),

104हमने उसे पुकारा, "ऐ इब्राहीम!"

105तुम ने सपने को सच कर दिखाया है। निश्चय ही हम नेक काम करने वालों को ऐसे ही बदला देते हैं।

106निःसंदेह वह एक स्पष्ट परीक्षा थी।

107और हमने उसके बेटे को एक बड़ी कुर्बानी के मेमने से बदल दिया।

108और हमने इब्राहीम को बाद की पीढ़ियों में शुभ कीर्ति से नवाज़ा:

109इब्राहीम पर सलाम हो।

110इसी प्रकार हम भलाई करने वालों को प्रतिफल देते हैं।

111वह निःसंदेह हमारे निष्ठावान बंदों में से था।

112फिर हमने उसे इसहाक़ की खुशखबरी दी - एक नबी और निष्ठावानों में से एक।

113हमने उसे और इसहाक़ को भी बरकत दी। उनकी कुछ संतान ने भलाई की, जबकि दूसरों ने स्पष्टतः स्वयं पर अत्याचार किया।

وَقَالَ إِنِّي ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّي سَيَهۡدِينِ99

رَبِّ هَبۡ لِي مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ100

فَبَشَّرۡنَٰهُ بِغُلَٰمٍ حَلِيمٖ101

فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ ٱلسَّعۡيَ قَالَ يَٰبُنَيَّ إِنِّيٓ أَرَىٰ فِي ٱلۡمَنَامِ أَنِّيٓ أَذۡبَحُكَ فَٱنظُرۡ مَاذَا تَرَىٰۚ قَالَ يَٰٓأَبَتِ ٱفۡعَلۡ مَا تُؤۡمَرُۖ سَتَجِدُنِيٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّٰبِرِينَ102

فَلَمَّآ أَسۡلَمَا وَتَلَّهُۥ لِلۡجَبِينِ103

وَنَٰدَيۡنَٰهُ أَن يَٰٓإِبۡرَٰهِيمُ104

قَدۡ صَدَّقۡتَ ٱلرُّءۡيَآۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُحۡسِنِينَ105

إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ ٱلۡبَلَٰٓؤُاْ ٱلۡمُبِينُ106

وَفَدَيۡنَٰهُ بِذِبۡحٍ عَظِيمٖ107

وَتَرَكۡنَا عَلَيۡهِ فِي ٱلۡأٓخِرِينَ108

سَلَٰمٌ عَلَىٰٓ إِبۡرَٰهِيمَ109

كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُحۡسِنِينَ110

إِنَّهُۥ مِنۡ عِبَادِنَا ٱلۡمُؤۡمِنِينَ111

وَبَشَّرۡنَٰهُ بِإِسۡحَٰقَ نَبِيّٗا مِّنَ ٱلصَّٰلِحِينَ112

وَبَٰرَكۡنَا عَلَيۡهِ وَعَلَىٰٓ إِسۡحَٰقَۚ وَمِن ذُرِّيَّتِهِمَا مُحۡسِنٞ وَظَالِمٞ لِّنَفۡسِهِۦ مُبِينٞ113

पैगंबर मूसा और पैगंबर हारून

114और हमने मूसा और हारून पर यक़ीनन एहसान किया,

115और उन्हें और उनकी क़ौम को कठोर यातना से बचाया।

116हमने उनकी मदद की तो वही विजयी हुए।

117हमने उन्हें खुली किताब दी,

118और उन्हें सीधे रास्ते की हिदायत दी।

119और हमने बाद की नस्लों में उनके लिए नेक ज़िक्र छोड़ा।

120मूसा और हारून पर सलाम हो।

121बेशक हम एहसान करने वालों को इसी तरह बदला देते हैं।

122यक़ीनन वे हमारे वफ़ादार बंदों में से दो थे।

وَلَقَدۡ مَنَنَّا عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ114

وَنَجَّيۡنَٰهُمَا وَقَوۡمَهُمَا مِنَ ٱلۡكَرۡبِ ٱلۡعَظِيمِ115

وَنَصَرۡنَٰهُمۡ فَكَانُواْ هُمُ ٱلۡغَٰلِبِينَ116

وَءَاتَيۡنَٰهُمَا ٱلۡكِتَٰبَ ٱلۡمُسۡتَبِينَ117

وَهَدَيۡنَٰهُمَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلۡمُسۡتَقِيمَ118

وَتَرَكۡنَا عَلَيۡهِمَا فِي ٱلۡأٓخِرِينَ119

سَلَٰمٌ عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ120

إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُحۡسِنِينَ121

إِنَّهُمَا مِنۡ عِبَادِنَا ٱلۡمُؤۡمِنِينَ122

पैगंबर इलियास

123और इल्यास अवश्य ही रसूलों में से एक था।

124जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरोगे?

125तुम बा'ल को कैसे पुकारते हो और सबसे उत्तम सृष्टिकर्ता को छोड़ देते हो—

126अल्लाह को, जो तुम्हारा रब है और तुम्हारे पूर्वजों का रब है?"

127लेकिन उन्होंने उसे झुठलाया, अतः वे अवश्य ही पकड़े जाएँगे।

128लेकिन अल्लाह के मुखलिस बंदों के लिए यह भिन्न होगा।

129हमने बाद की पीढ़ियों में उसके लिए नेक नामी छोड़ी:

130"सलाम हो इल्यास पर।"

131बेशक हम एहसान करने वालों को इसी तरह बदला देते हैं।

132वह यकीनन हमारे मोमिन बंदों में से था।

وَإِنَّ إِلۡيَاسَ لَمِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ123

إِذۡ قَالَ لِقَوۡمِهِۦٓ أَلَا تَتَّقُونَ124

أَتَدۡعُونَ بَعۡلٗا وَتَذَرُونَ أَحۡسَنَ ٱلۡخَٰلِقِينَ125

ٱللَّهَ رَبَّكُمۡ وَرَبَّ ءَابَآئِكُمُ ٱلۡأَوَّلِينَ126

فَكَذَّبُوهُ فَإِنَّهُمۡ لَمُحۡضَرُونَ127

إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلۡمُخۡلَصِينَ128

وَتَرَكۡنَا عَلَيۡهِ فِي ٱلۡأٓخِرِينَ129

سَلَٰمٌ عَلَىٰٓ إِلۡ يَاسِينَ130

إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُحۡسِنِينَ131

إِنَّهُۥ مِنۡ عِبَادِنَا ٱلۡمُؤۡمِنِينَ132

नबी लूत

133और लूत निःसंदेह रसूलों में से थे।

134याद करो, जब हमने उसे और उसके समस्त परिवार को बचाया,

135सिवाय एक बूढ़ी स्त्री के, जो तबाह होने वालों में से थी।

136फिर हमने शेष को पूरी तरह नष्ट कर दिया।

137तुम मक्कावासी अवश्य उनके खंडहरों से सुबह के वक़्त गुज़रते हो।

138और रात। क्या तुम फिर भी नहीं समझोगे?

وَإِنَّ لُوطٗا لَّمِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ133

إِذۡ نَجَّيۡنَٰهُ وَأَهۡلَهُۥٓ أَجۡمَعِينَ134

إِلَّا عَجُوزٗا فِي ٱلۡغَٰبِرِينَ135

ثُمَّ دَمَّرۡنَا ٱلۡأٓخَرِينَ136

وَإِنَّكُمۡ لَتَمُرُّونَ عَلَيۡهِم مُّصۡبِحِينَ137

وَبِٱلَّيۡلِۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ138