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الشُّعَرَاء
الشُّعَرَاء
Surah Ash-Shu'arâ' for kids content

सीखने के बिंदु
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मक्के के मुशरिक सत्य को नकारते रहते हैं और अल्लाह की निशानियों को अनदेखा करते रहते हैं।
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इस सूरह में कई कहानियों का उल्लेख है जो यह सिद्ध करती हैं कि दुष्टों की अंततः हार होती है।
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अल्लाह हमेशा अपने नबियों का समर्थन करता है।
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नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धैर्य रखने का निर्देश दिया गया है, यह जानते हुए कि अल्लाह सदैव उनके साथ रहेगा।
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कुरान वास्तव में अल्लाह की ओर से एक वह्यी है।
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मोमिनों को अल्लाह पर ईमान रखने और सत्य पर डटे रहने के लिए सराहा जाता है।
- •
दुश्मन कवियों की इस्लाम के बारे में झूठ फैलाने के लिए निंदा की जाती है।

काफ़िरों को चेतावनी
1ता-सीन-मीम।
2ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं।
3क्या आप (ऐ पैगंबर) अपने आप को इसलिए हलाक कर लेंगे कि वे ईमान नहीं लाते?
4अगर हम चाहते, तो हम उन पर आसमान से एक ऐसी ज़बरदस्त निशानी उतार देते, जिससे उनकी गर्दनें पूरी तरह झुकने पर मजबूर हो जातीं।
5जब कभी भी उनके पास अत्यंत दयालु (अल्लाह) की ओर से कोई नई नसीहत आती है, तो वे बस उससे मुँह मोड़ लेते हैं।
6उन्होंने हक़ को झुठला दिया है, तो वे जल्द ही अपने उपहास के परिणाम भुगतेंगे।
7क्या उन्होंने धरती पर नज़र नहीं डाली कि हमने उसमें कितनी ही प्रकार की उत्तम वनस्पतियाँ पैदा की हैं?
8बेशक इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाएँगे।
9और तुम्हारा रब वास्तव में प्रभुत्वशाली, परम दयालु है।
طسٓمٓ1
تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡمُبِينِ2
لَعَلَّكَ بَٰخِعٞ نَّفۡسَكَ أَلَّا يَكُونُواْ مُؤۡمِنِينَ3
إِن نَّشَأۡ نُنَزِّلۡ عَلَيۡهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةٗ فَظَلَّتۡ أَعۡنَٰقُهُمۡ لَهَا خَٰضِعِينَ4
وَمَا يَأۡتِيهِم مِّن ذِكۡرٖ مِّنَ ٱلرَّحۡمَٰنِ مُحۡدَثٍ إِلَّا كَانُواْ عَنۡهُ مُعۡرِضِينَ5
فَقَدۡ كَذَّبُواْ فَسَيَأۡتِيهِمۡ أَنۢبَٰٓؤُاْ مَا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ6
أَوَ لَمۡ يَرَوۡاْ إِلَى ٱلۡأَرۡضِ كَمۡ أَنۢبَتۡنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوۡجٖ كَرِيمٍ7
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ8
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ9
नबी मूसा
10स्मरण करो जब तुम्हारे रब ने मूसा को पुकारा, "उन ज़ालिमों के पास जाओ-
11फ़िरऔन की क़ौम के पास।
क्या वे मुझसे डरेंगे नहीं?
"
12उसने कहा, "ऐ मेरे रब!
मुझे डर है कि वे मुझे झुठला देंगे
13मेरा सीना तंग हो जाएगा और मेरी ज़बान नहीं चलेगी।
तो हारून को भी मेरे साथ रसूल बनाकर भेज।
14और उन पर मेरा एक गुनाह है, तो मुझे डर है कि वे मुझे क़त्ल कर देंगे।
"
15अल्लाह ने फ़रमाया, "हरगिज़ नहीं!
तो तुम दोनों हमारी निशानियों के साथ जाओ।
हम तुम्हारे साथ होंगे, सुनते रहेंगे।
"
16फ़िरऔन के पास जाओ और कहो, 'हम सारे जहानों के रब के रसूल हैं,
17'यह कहने का हुक्म दिया गया है:' 'बनी इस्राईल को हमारे साथ जाने दो।
'"
وَإِذۡ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱئۡتِ ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ10
قَوۡمَ فِرۡعَوۡنَۚ أَلَا يَتَّقُونَ11
قَالَ رَبِّ إِنِّيٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ12
وَيَضِيقُ صَدۡرِي وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِي فَأَرۡسِلۡ إِلَىٰ هَٰرُونَ13
وَلَهُمۡ عَلَيَّ ذَنۢبٞ فَأَخَافُ أَن يَقۡتُلُونِ14
قَالَ كَلَّاۖ فَٱذۡهَبَا بَِٔايَٰتِنَآۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسۡتَمِعُونَ15
فَأۡتِيَا فِرۡعَوۡنَ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولُ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ16
أَنۡ أَرۡسِلۡ مَعَنَا بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ17
मूसा बनाम फ़िरौन
18फ़िरौन चिल्लाया, "क्या हमने तुम्हें बचपन में अपने पास नहीं पाला, और तुमने अपने जीवन के कई साल हमारी देखरेख में बिताए?
"
19फिर तुमने वह किया जो तुमने किया, और तुम नितांत कृतघ्न निकले!
"
20मूसा ने उत्तर दिया, "मैंने वह तब किया, जब मुझे कोई मार्गदर्शन प्राप्त नहीं था।
21इसलिए मैं तुमसे भाग गया जब मुझे तुम्हारा भय था।
फिर मेरे रब ने मुझे बुद्धि प्रदान की और मुझे रसूलों में से एक बना दिया।
22तुम इसे मुझ पर एहसान कैसे गिन सकते हो, जब तुमने बनी इस्राईल को गुलामों की तरह रखा?
"
23फ़िरऔन ने पूछा, "और सारे जहानों का रब क्या है?
"
24मूसा ने जवाब दिया, "वह आसमानों और ज़मीन का और उन सब चीज़ों का रब है जो उनके दरमियान हैं, अगर तुम यक़ीन रखते हो।
"
25फ़िरऔन ने अपने इर्द-गिर्द वालों से कहा, 'क्या तुमने सुना?
'
26मूसा ने आगे कहा, "वह तुम्हारा रब और तुम्हारे अगले बाप-दादाओं का रब है।
"
27फ़िरऔन ने मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा, 'यह रसूल जो तुम्हारी तरफ़ भेजा गया है, यक़ीनन पागल है।
'
28मूसा ने जवाब दिया: "वह" पूरब और पश्चिम का रब है, और जो कुछ उनके बीच है, अगर तुम अक्ल रखते।
قَالَ أَلَمۡ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدٗا وَلَبِثۡتَ فِينَا مِنۡ عُمُرِكَ سِنِينَ18
وَفَعَلۡتَ فَعۡلَتَكَ ٱلَّتِي فَعَلۡتَ وَأَنتَ مِنَ ٱلۡكَٰفِرِينَ19
قَالَ فَعَلۡتُهَآ إِذٗا وَأَنَا۠ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ20
فَفَرَرۡتُ مِنكُمۡ لَمَّا خِفۡتُكُمۡ فَوَهَبَ لِي رَبِّي حُكۡمٗا وَجَعَلَنِي مِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ21
وَتِلۡكَ نِعۡمَةٞ تَمُنُّهَا عَلَيَّ أَنۡ عَبَّدتَّ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ22
قَالَ فِرۡعَوۡنُ وَمَا رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ23
قَالَ رَبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَآۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ24
قَالَ لِمَنۡ حَوۡلَهُۥٓ أَلَا تَسۡتَمِعُونَ25
قَالَ رَبُّكُمۡ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلۡأَوَّلِينَ26
قَالَ إِنَّ رَسُولَكُمُ ٱلَّذِيٓ أُرۡسِلَ إِلَيۡكُمۡ لَمَجۡنُون27
قَالَ رَبُّ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَمَا بَيۡنَهُمَآۖ إِن كُنتُمۡ تَعۡقِلُونَ28
चुनौती
29फ़िरौन ने धमकी दी, "यदि तुम मेरे अतिरिक्त किसी और पूज्य को अपनाओगे, तो मैं तुम्हें कारागार में डलवा दूँगा।
"
30मूसा ने उत्तर दिया, "भले ही मैं तुम्हें कोई स्पष्ट प्रमाण ला दूँ?
"
31फ़िरौन ने कहा, "तो उसे पेश करो, यदि तुम सच्चे हो।
"
32तो उसने अपनी लाठी फेंकी और - देखो!
- वह एक असली साँप बन गई।
33फिर उसने अपना हाथ अपने गिरेबान से निकाला और वह सबके देखने के लिए 'चमकता हुआ' सफेद था।
34फ़िरऔन ने अपने आस-पास के सरदारों से कहा, "यह तो यक़ीनन एक माहिर जादूगर है,
35जो तुम्हें अपनी ज़मीन से अपने जादू के बल पर निकालना चाहता है।
तो तुम क्या मशवरा देते हो?
"
36उन्होंने जवाब दिया, "उसे और उसके भाई को ठहराओ और सभी शहरों में आदमी भेजो
37जो तुम्हारे पास हर माहिर जादूगर को ले आएँ।
"
38तो जादूगरों को एक तयशुदा तारीख़ के लिए इकट्ठा किया गया।
39और लोगों से पूछा गया, "क्या तुम सभा में शामिल होगे,
40जादूगरों का अनुसरण करने के लिए, यदि वे जीतते हैं?
"
قَالَ لَئِنِ ٱتَّخَذۡتَ إِلَٰهًا غَيۡرِي لَأَجۡعَلَنَّكَ مِنَ ٱلۡمَسۡجُونِينَ29
قَالَ أَوَلَوۡ جِئۡتُكَ بِشَيۡءٖ مُّبِينٖ30
قَالَ فَأۡتِ بِهِۦٓ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ31
فَأَلۡقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ ثُعۡبَانٞ مُّبِينٞ32
وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِيَ بَيۡضَآءُ لِلنَّٰظِرِينَ33
قَالَ لِلۡمَلَإِ حَوۡلَهُۥٓ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرٌ عَلِيمٞ34
يُرِيدُ أَن يُخۡرِجَكُم مِّنۡ أَرۡضِكُم بِسِحۡرِهِۦ فَمَاذَا تَأۡمُرُونَ35
قَالُوٓاْ أَرۡجِهۡ وَأَخَاهُ وَٱبۡعَثۡ فِي ٱلۡمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ36
يَأۡتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيم37
فَجُمِعَ ٱلسَّحَرَةُ لِمِيقَٰتِ يَوۡمٖ مَّعۡلُومٖ38
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلۡ أَنتُم مُّجۡتَمِعُونَ39
لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ ٱلسَّحَرَةَ إِن كَانُواْ هُمُ ٱلۡغَٰلِبِينَ40
मूसा बनाम जादूगरों
41जब जादूगर आए, तो उन्होंने फ़िरौन से पूछा, "क्या हमें एक बड़ा इनाम मिलेगा, यदि हम जीतते हैं?
"
42उसने जवाब दिया, "हाँ, और तुम मेरे निकटतम लोगों में से होगे।
"
43मूसा ने उनसे कहा, "जो कुछ तुम्हें फेंकना है, फेंक दो!
"
44तो उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं, यह कहते हुए, "फ़िरौन की ताक़त की क़सम, हम ज़रूर जीतेंगे।
"
45फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, और - तो क्या देखते हैं!
- उसने उनके जादू की चीज़ों को निगल लिया!
46तो जादूगर सजदे में गिर पड़े।
47वे बोले, "हम अब सारे जहानों के रब पर ईमान लाए हैं,
48मूसा और हारून के रब पर।
"
49फ़िरऔन ने धमकी दी, "इससे पहले कि मैं तुम्हें इजाज़त दूँ, तुम उस पर ईमान ले आए?
वह ज़रूर तुम्हारा उस्ताद होगा जिसने तुम्हें जादू सिखाया है।
मगर जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा।
मैं यकीनन तुम्हारे हाथ और पैर एक-दूसरे के उलट कटवा दूँगा, फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा।
"
50उन्होंने जवाब दिया, "कोई परवाह नहीं; हम अपने रब की ओर लौटेंगे।
"
51हमें पूरी उम्मीद है कि हमारा रब हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, क्योंकि हम सबसे पहले ईमान लाए हैं।
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالُواْ لِفِرۡعَوۡنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجۡرًا إِن كُنَّا نَحۡنُ ٱلۡغَٰلِبِينَ41
قَالَ نَعَمۡ وَإِنَّكُمۡ إِذٗا لَّمِنَ ٱلۡمُقَرَّبِينَ42
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلۡقُواْ مَآ أَنتُم مُّلۡقُونَ43
فَأَلۡقَوۡاْ حِبَالَهُمۡ وَعِصِيَّهُمۡ وَقَالُواْ بِعِزَّةِ فِرۡعَوۡنَ إِنَّا لَنَحۡنُ ٱلۡغَٰلِبُونَ44
فَأَلۡقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ تَلۡقَفُ مَا يَأۡفِكُونَ45
فَأُلۡقِيَ ٱلسَّحَرَةُ سَٰجِدِينَ46
قَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ47
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ48
قَالَ ءَامَنتُمۡ لَهُۥ قَبۡلَ أَنۡ ءَاذَنَ لَكُمۡۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِي عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحۡرَ فَلَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيۡدِيَكُمۡ وَأَرۡجُلَكُم مِّنۡ خِلَٰفٖ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمۡ أَجۡمَعِينَ49
قَالُواْ لَا ضَيۡرَۖ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ50
إِنَّا نَطۡمَعُ أَن يَغۡفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَٰيَٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ51

फिरौन का अंत
52और हमने मूसा पर वह्यी नाज़िल की कि मेरे बंदों को लेकर रात में निकल जाओ, क्योंकि तुम्हारा पीछा ज़रूर किया जाएगा।
53फिर फ़िरऔन ने सभी शहरों में संदेशवाहक भेजे,
54और कहा, "ये तो बस मुट्ठी भर लोग हैं,
55जिन्होंने हमें सचमुच गुस्सा दिलाया है,
56लेकिन हम सब पूरी तरह चौकस हैं।
"
57तो हमने अत्याचारियों को उनके बागों और चश्मों से निकाल दिया,
58ख़ज़ानों और आलीशान घरों से।
59ऐसा ही हुआ।
और हमने वैसी ही चीज़ें बनी इस्राईल को अता कीं।
60और फिर लश्कर ने सूर्योदय के समय उनका पीछा किया।
61जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए, तो मूसा के साथियों ने पुकार कर कहा, "हम तो पकड़े गए!
"
62मूसा ने कहा, "हरगिज़ नहीं!
मेरा रब यकीनन मेरे साथ है; वह मुझे राह दिखाएगा।
"
63तो हमने मूसा को वह्यी की, "अपनी लाठी से समुद्र पर मारो," और समुद्र फट गया, हर तरफ एक विशाल पहाड़ की तरह था।
64हम पीछा करने वालों को उस जगह पर ले आए,
65और मूसा को और उनके साथ वालों को सब को एक साथ बचा लिया।
66फिर हमने दूसरों को डुबो दिया।
67बेशक इसमें एक निशानी है, लेकिन उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाएँगे।
68और तुम्हारा रब बेशक सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयावान है।
وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنۡ أَسۡرِ بِعِبَادِيٓ إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ52
فَأَرۡسَلَ فِرۡعَوۡنُ فِي ٱلۡمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ53
إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَشِرۡذِمَةٞ قَلِيلُونَ54
وَإِنَّهُمۡ لَنَا لَغَآئِظُونَ55
وَإِنَّا لَجَمِيعٌ حَٰذِرُونَ56
فَأَخۡرَجۡنَٰهُم مِّن جَنَّٰتٖ وَعُيُون57
وَكُنُوزٖ وَمَقَامٖ كَرِيم58
كَذَٰلِكَۖ وَأَوۡرَثۡنَٰهَا بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ59
فَأَتۡبَعُوهُم مُّشۡرِقِينَ60
فَلَمَّا تَرَٰٓءَا ٱلۡجَمۡعَانِ قَالَ أَصۡحَٰبُ مُوسَىٰٓ إِنَّا لَمُدۡرَكُونَ61
قَالَ كَلَّآۖ إِنَّ مَعِيَ رَبِّي سَيَهۡدِينِ62
فَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱضۡرِب بِّعَصَاكَ ٱلۡبَحۡرَۖ فَٱنفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرۡقٖ كَٱلطَّوۡدِ ٱلۡعَظِيمِ63
وَأَزۡلَفۡنَا ثَمَّ ٱلۡأٓخَرِينَ64
وَأَنجَيۡنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ أَجۡمَعِينَ65
ثُمَّ أَغۡرَقۡنَا ٱلۡأٓخَرِينَ66
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ67
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ68

ज्ञान की बातें
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आयत 89 शुद्ध हृदय रखने के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो हमें न्याय के लिए अल्लाह के समक्ष उपस्थित होने पर लाभान्वित करेगा।
इमाम इब्न अल-क़य्यिम के अनुसार, किसी का हृदय शुद्ध होने के लिए, उसे सच्चा और पूरी तरह से अल्लाह के प्रति समर्पित होना चाहिए; क्षमा करने को तैयार
होना चाहिए; अच्छे समय में कृतज्ञ और कठिन समय में धैर्यवान होना चाहिए; दूसरों के प्रति कोई ईर्ष्या, लालच, घृणा या अहंकार नहीं होना चाहिए; सत्य का पालन
करना चाहिए और असत्य को अनदेखा करना चाहिए; और अच्छाई से प्रेम करना चाहिए तथा बुराई से घृणा करनी चाहिए।

छोटी कहानी
- •
इमाम इब्राहीम इब्न अधम एक दिन बाज़ार में चल रहे थे जब लोग उनके पास एक सवाल लेकर आए।
उन्होंने कहा, "हमारी दुआएँ क्यों क़बूल नहीं होतीं?
" उन्होंने जवाब दिया, "क्योंकि तुम्हारे दिल 10 कारणों से बेजान हो गए हैं: 1.
तुम दावा करते हो कि तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो, लेकिन उसकी नाफ़रमानी करते रहते हो।
2.
तुम उसके संसाधनों से खाते हो, लेकिन उसका शुक्र अदा करने में नाकाम रहते हो।
3.
तुम क़ुरआन पढ़ते हो, लेकिन उस पर अमल नहीं करते।
4.
तुम दावा करते हो कि तुम नबी से मोहब्बत करते हो, लेकिन उनके तरीक़े पर नहीं चलते।
5.
तुम दावा करते हो कि शैतान तुम्हारा दुश्मन है, लेकिन तुम उसे दोस्त बना लेते हो।
6.
तुम दावा करते हो कि जन्नत हक़ीक़त है, लेकिन उसके लिए काम नहीं करते।
7.
तुम दावा करते हो कि जहन्नम हक़ीक़त है, लेकिन उससे दूर नहीं भागते।
8.
तुम दावा करते हो कि मौत हक़ीक़त है, लेकिन उसके लिए तैयारी नहीं करते।
9.
तुम मुर्दों को दफ़नाते हो, लेकिन कभी नहीं सोचते कि एक दिन तुम भी उनसे जा मिलोगे।
10.
तुम लोगों की ग़लतियों में व्यस्त रहते हो, लेकिन अपनी ग़लतियों को भूल जाते हो।
"
पैगंबर इब्राहिम और उनकी क़ौम
69और उन्हें (हे पैगंबर) इब्राहीम का वृत्तांत सुनाओ,
70जब उसने अपने पिता और अपनी क़ौम से पूछा, "तुम किसकी इबादत करते हो?
"
71उन्होंने जवाब दिया, "हम बुतों की इबादत करते हैं, और हम उनके प्रति बहुत निष्ठावान हैं।
"
72इब्राहीम ने पूछा, "क्या वे तुम्हें सुन सकते हैं जब तुम उन्हें पुकारते हो?
73या क्या वे तुम्हें लाभ पहुँचा सकते हैं या हानि?
"
74उन्होंने कहा, "नहीं!
बल्कि हमने अपने बाप-दादाओं को ऐसा ही करते पाया।
"
75इब्राहीम ने कहा, "क्या तुमने कभी गौर किया है कि तुम किसकी इबादत करते हो-
76तुम और तुम्हारे पूर्वज?
77वे सब मेरे दुश्मन हैं, सिवाय सारे जहानों के रब के।
78वही है जिसने मुझे पैदा किया, और वही मुझे हिदायत देता है।
79वही है जो मुझे भोजन और पेय प्रदान करता है।
80और वही मुझे शिफ़ा देता है जब मैं बीमार होता हूँ।
81और वही मुझे मृत्यु देगा, और फिर मुझे जीवित करेगा।
82और मुझे उम्मीद है कि वह क़यामत के दिन मेरी गलतियों को माफ़ करेगा।
83मेरे रब!
मुझे हिकमत दे, और मुझे ईमान वालों के साथ जोड़ दे।
84मुझे बाद की पीढ़ियों में नेक नामी अता फ़रमा।
85मुझे जन्नतुल नईम के वारिसों में से बना दे।
86और मेरे बाप को बख़्श दे, बेशक वह गुमराहों में से है।
87और मुझे उस दिन रुसवा न करना जिस दिन लोग उठाए जाएँगे।
88जिस दिन न माल काम आएगा और न औलाद।
89कोई नहीं बचाया जाएगा सिवाय उनके जो अल्लाह के पास शुद्ध हृदय लेकर आएंगे।
وَٱتۡلُ عَلَيۡهِمۡ نَبَأَ إِبۡرَٰهِيمَ69
إِذۡ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦ مَا تَعۡبُدُونَ70
قَالُواْ نَعۡبُدُ أَصۡنَامٗا فَنَظَلُّ لَهَا عَٰكِفِينَ71
قَالَ هَلۡ يَسۡمَعُونَكُمۡ إِذۡ تَدۡعُونَ72
أَوۡ يَنفَعُونَكُمۡ أَوۡ يَضُرُّونَ73
قَالُواْ بَلۡ وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا كَذَٰلِكَ يَفۡعَلُونَ74
قَالَ أَفَرَءَيۡتُم مَّا كُنتُمۡ تَعۡبُدُونَ75
أَنتُمۡ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلۡأَقۡدَمُونَ76
فَإِنَّهُمۡ عَدُوّٞ لِّيٓ إِلَّا رَبَّ ٱلۡعَٰلَمِينَ77
ٱلَّذِي خَلَقَنِي فَهُوَ يَهۡدِينِ78
وَٱلَّذِي هُوَ يُطۡعِمُنِي وَيَسۡقِينِ79
وَإِذَا مَرِضۡتُ فَهُوَ يَشۡفِينِ80
وَٱلَّذِي يُمِيتُنِي ثُمَّ يُحۡيِينِ81
وَٱلَّذِيٓ أَطۡمَعُ أَن يَغۡفِرَ لِي خَطِيَٓٔتِي يَوۡمَ ٱلدِّينِ82
رَبِّ هَبۡ لِي حُكۡمٗا وَأَلۡحِقۡنِي بِٱلصَّٰلِحِينَ83
وَٱجۡعَل لِّي لِسَانَ صِدۡقٖ فِي ٱلۡأٓخِرِينَ84
وَٱجۡعَلۡنِي مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ ٱلنَّعِيمِ85
وَٱغۡفِرۡ لِأَبِيٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ86
وَلَا تُخۡزِنِي يَوۡمَ يُبۡعَثُونَ87
يَوۡمَ لَا يَنفَعُ مَالٞ وَلَا بَنُونَ88
إِلَّا مَنۡ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلۡبٖ سَلِيمٖ89
क़यामत का दिन
90उस दिन जन्नत ईमानवालों के करीब लाई जाएगी,
91और जहन्नम गुमराहों को दिखाई जाएगी।
92फिर उनसे कहा जाएगा, "कहाँ हैं वे बुत जिनकी तुम पूजा करते थे
93अल्लाह के सिवा?
क्या वे तुम्हारी मदद कर सकते हैं या खुद अपनी मदद कर सकते हैं?
"
94फिर वे बुत गुमराहों के साथ जहन्नम में डाल दिए जाएँगे।
95और इब्लीस के सिपाही, सब के सब।
⁴
96वहाँ गुमराह लोग अपने बुतों पर चिल्लाते हुए रोएँगे,
97"अल्लाह की क़सम!
हम साफ़ तौर पर ग़लत थे,
98जब हमने तुम्हें सारे जहानों के रब के बराबर ठहराया।
99और बदकारों के सिवा किसी ने हमें गुमराह नहीं किया।
100अब हमारा कोई पैरवी करने वाला नहीं है,
101और न ही कोई घनिष्ठ मित्र।
102काश हमें दूसरा अवसर मिल पाता, तो हम अवश्य ईमान लाने वालों में से होते।
103निःसंदेह इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकांश ईमान नहीं लाते।
104और तुम्हारा रब वास्तव में सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयावान है।
وَأُزۡلِفَتِ ٱلۡجَنَّةُ لِلۡمُتَّقِينَ90
وَبُرِّزَتِ ٱلۡجَحِيمُ لِلۡغَاوِينَ91
وَقِيلَ لَهُمۡ أَيۡنَ مَا كُنتُمۡ تَعۡبُدُونَ92
مِن دُونِ ٱللَّهِ هَلۡ يَنصُرُونَكُمۡ أَوۡ يَنتَصِرُونَ93
فَكُبۡكِبُواْ فِيهَا هُمۡ وَٱلۡغَاوُۥنَ94
وَجُنُودُ إِبۡلِيسَ أَجۡمَعُونَ95
قَالُواْ وَهُمۡ فِيهَا يَخۡتَصِمُونَ96
تَٱللَّهِ إِن كُنَّا لَفِي ضَلَٰلٖ مُّبِينٍ97
إِذۡ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ98
وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلۡمُجۡرِمُونَ99
فَمَا لَنَا مِن شَٰفِعِينَ100
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيم101
فَلَوۡ أَنَّ لَنَا كَرَّةٗ فَنَكُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ102
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ103
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ104
पैगंबर नूह और उनकी कौम
105नूह की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया।
106जब उनके भाई नूह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते?
"
107मैं यक़ीनन तुम्हारा एक अमीन रसूल हूँ।
108पस अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो।
109मैं तुमसे इस पर कोई अजर नहीं माँगता।
मेरा अजर तो सिर्फ़ रबुल आलमीन के पास है।
110तो अल्लाह से डरो और मेरी आज्ञा का पालन करो।
111उन्होंने तर्क किया, "हम तुम पर कैसे ईमान लाएँ, जबकि तुम्हारे पीछे तो केवल निम्नतम लोग ही हैं?
"
112उसने जवाब दिया, "और मुझे क्या पता कि उनकी नीयत क्या है?
"
113उनका हिसाब मेरे रब के पास है, यदि तुम कुछ समझ रखते हो!
114मैं मोमिनों को निकालने वाला नहीं हूँ।
115मैं तो केवल एक स्पष्ट चेतावनी के साथ भेजा गया हूँ।
116उन्होंने धमकी दी, "अगर तुम नहीं रुकते, ऐ नूह, तो तुम्हें निश्चित रूप से पत्थरों से मार डाला जाएगा।
"
117नूह ने दुआ की, "ऐ मेरे रब!
मेरी क़ौम मुझे लगातार झुठला रही है।
"
118तो हमारे बीच निर्णायक रूप से फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे साथ के ईमान वालों को बचा ले।
119तो हमने उसे और उसके साथ वालों को भरी हुई कश्ती में बचा लिया।
120फिर हमने दूसरों को डुबो दिया।
121बेशक इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाते।
122और तुम्हारा रब यक़ीनन सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयावान है।
كَذَّبَتۡ قَوۡمُ نُوحٍ ٱلۡمُرۡسَلِينَ105
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ106
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِين107
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ108
وَمَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ109
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ110
قَالُوٓاْ أَنُؤۡمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلۡأَرۡذَلُونَ111
قَالَ وَمَا عِلۡمِي بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ112
إِنۡ حِسَابُهُمۡ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّيۖ لَوۡ تَشۡعُرُونَ113
وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ114
إِنۡ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٞ مُّبِينٞ115
قَالُواْ لَئِن لَّمۡ تَنتَهِ يَٰنُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمَرۡجُومِينَ116
١١٦ قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوۡمِي كَذَّبُونِ117
فَٱفۡتَحۡ بَيۡنِي وَبَيۡنَهُمۡ فَتۡحٗا وَنَجِّنِي وَمَن مَّعِيَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ118
فَأَنجَيۡنَٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِي ٱلۡفُلۡكِ ٱلۡمَشۡحُونِ119
ثُمَّ أَغۡرَقۡنَا بَعۡدُ ٱلۡبَاقِينَ120
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ121
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ122
नबी हूद और उनकी कौम
123आद ने रसूलों को झुठलाया।
124जब उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरोगे?
"
125मैं बेशक तुम्हारा एक अमानतदार रसूल हूँ।
126तो अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
127मैं तुमसे इस पर कोई मज़दूरी नहीं माँगता।
मेरा बदला तो बस सारे जहानों के रब के पास है।
128तुम हर ऊँची जगह पर व्यर्थ में एक निशान क्यों बनाते हो,
129और विशाल महल बनाते हो, जैसे कि तुम हमेशा रहने वाले हो,
130और जब तुम हमला करते हो तो ज़ालिमों की तरह करते हो?
131तो अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
132उससे डरो जिसने तुम्हें वह सब कुछ दिया है जो तुम जानते हो:
133उसने तुम्हें चौपाए और संतान प्रदान की,
134और बाग़ और चश्मे दिए।
135मुझे सचमुच तुम पर एक भयानक दिन के अज़ाब का डर है।
136उन्होंने जवाब दिया, "हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम हमें चेतावनी दो या न दो।
137हम तो बस वही कर रहे हैं जो गुज़रे ज़माने में दूसरों ने किया।
"
138और हमें कभी दंडित नहीं किया जाएगा।
139वे उसे झुठलाते रहे, तो हमने उन्हें तबाह कर दिया।
निःसंदेह इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाए।
140और तुम्हारा रब यक़ीनन सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयावान है।
كَذَّبَتۡ عَادٌ ٱلۡمُرۡسَلِينَ123
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ124
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِين125
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ126
وَمَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ127
أَتَبۡنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ ءَايَةٗ تَعۡبَثُونَ128
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمۡ تَخۡلُدُونَ129
وَإِذَا بَطَشۡتُم بَطَشۡتُمۡ جَبَّارِينَ130
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ131
وَٱتَّقُواْ ٱلَّذِيٓ أَمَدَّكُم بِمَا تَعۡلَمُونَ132
أَمَدَّكُم بِأَنۡعَٰمٖ وَبَنِينَ133
وَجَنَّٰتٖ وَعُيُونٍ134
إِنِّيٓ أَخَافُ عَلَيۡكُمۡ عَذَابَ يَوۡمٍ عَظِيمٖ135
قَالُواْ سَوَآءٌ عَلَيۡنَآ أَوَعَظۡتَ أَمۡ لَمۡ تَكُن مِّنَ ٱلۡوَٰعِظِينَ136
إِنۡ هَٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلۡأَوَّلِينَ137
وَمَا نَحۡنُ بِمُعَذَّبِينَ138
فَكَذَّبُوهُ فَأَهۡلَكۡنَٰهُمۡۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ139
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ140
नबी सालिह और उनकी क़ौम
141समूद क़ौम ने रसूलों को झुठलाया।
142जब उनके भाई सालेह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते?
"
143मैं यक़ीनन तुम्हारे लिए एक अमीन रसूल हूँ।
144तो अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो।
145मैं तुमसे इस पर कोई अजर नहीं माँगता।
मेरा अजर तो बस रब्बुल आलमीन के पास है।
146क्या तुम समझते हो कि तुम उन सब चीज़ों में हमेशा सुरक्षित रहोगे जो तुम्हारे पास यहाँ हैं:
147बाग़ों और चश्मों के बीच,
148और तरह-तरह की फ़सलें, और पके फलों से लदे हुए खजूर के पेड़;
149पहाड़ों में शानदार घर तराशने के लिए?
150तो अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
151और अत्याचारियों की आज्ञा मत मानो,
152जो ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं और सुधार नहीं करते।
"
153उन्होंने जवाब दिया, "तुम पर तो बस जादू कर दिया गया है!
"
154तुम तो बस हमारे जैसे ही एक इंसान हो, तो कोई निशानी लाओ अगर तुम सच्चे हो।
"
155सालेह ने कहा, "यह एक ऊँटनी है।
उसका पानी पीने का एक दिन होगा और तुम्हारा एक दिन।
"
156और उसे हानि न पहुँचाओ, अन्यथा तुम पर एक भयानक दिन का अज़ाब आ पड़ेगा।
157लेकिन उन्होंने उसे मार डाला और जल्द ही पछताए।
158तो उन पर अज़ाब आ पड़ा।
निश्चय ही इसमें एक आयत है।
फिर भी उनमें से अधिकांश ईमान न लाए।
159और तुम्हारा रब निश्चय ही ज़बरदस्त, बड़ा मेहरबान है।
كَذَّبَتۡ ثَمُودُ ٱلۡمُرۡسَلِينَ141
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ صَٰلِحٌ أَلَا تَتَّقُونَ142
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِين143
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ144
وَمَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ145
أَتُتۡرَكُونَ فِي مَا هَٰهُنَآ ءَامِنِينَ146
فِي جَنَّٰتٖ وَعُيُونٖ147
وَزُرُوعٖ وَنَخۡلٖ طَلۡعُهَا هَضِيمٞ148
وَتَنۡحِتُونَ مِنَ ٱلۡجِبَالِ بُيُوتٗا فَٰرِهِينَ149
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ150
وَلَا تُطِيعُوٓاْ أَمۡرَ ٱلۡمُسۡرِفِينَ151
ٱلَّذِينَ يُفۡسِدُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا يُصۡلِحُونَ152
قَالُوٓاْ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلۡمُسَحَّرِينَ153
مَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٞ مِّثۡلُنَا فَأۡتِ بَِٔايَةٍ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ154
قَالَ هَٰذِهِۦ نَاقَةٞ لَّهَا شِرۡبٞ وَلَكُمۡ شِرۡبُ يَوۡمٖ مَّعۡلُومٖ155
وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٖ فَيَأۡخُذَكُمۡ عَذَابُ يَوۡمٍ عَظِيمٖ156
فَعَقَرُوهَا فَأَصۡبَحُواْ نَٰدِمِينَ157
فَأَخَذَهُمُ ٱلۡعَذَابُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ158
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ159

ज्ञान की बातें
- •
कुरान लूत (अ.
स.
) की कौम के बारे में बहुत कुछ बताता है।
उदाहरण के लिए, सूरह 29, आयत 29 हमें सिखाती है कि उन्हें निम्नलिखित कारणों से दंडित किया गया था: उन्होंने अल्लाह पर विश्वास नहीं किया और पैगंबर लूत
(अ.
स.
) को अस्वीकार कर दिया; उन्होंने उन्हें अल्लाह की सज़ा उन पर लाने की चुनौती दी; पुरुष अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षित थे, जिसका अर्थ था कि उन्होंने
अपनी पत्नियों की उपेक्षा की, जो अंततः अन्य महिलाओं के पीछे चली गईं; उन्होंने इसे अपनी सभाओं में सार्वजनिक रूप से किया; और उन्होंने इस प्रथा को उन
यात्रियों पर थोपा जो उनके शहरों से गुज़रते थे।
- •
अल्लाह ही वह है जिसने हमें बनाया और वही इस जीवन और अगले जीवन में हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है, यह तय करता है।
हम यहाँ उसे प्रसन्न करने, जीवन का आनंद लेने और अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिए हैं।
मुसलमानों को एक पुरुष और एक महिला के बीच विवाह के माध्यम से स्वस्थ संबंध बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
लक्ष्य ऐसे मज़बूत परिवार शुरू करना है जो अल्लाह की सेवा करें और विश्वास की मशाल को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।
इस्लाम में कुछ प्रथाओं को पाप माना जाता है—जिनमें सबसे बुरा अल्लाह के साथ दूसरों को बराबर ठहराना है।
अन्य पापों में शराब पीना, अपने माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करना, विवाह के बाहर एक पुरुष और एक महिला के बीच रोमांटिक संबंध रखना, और समान लिंग के
व्यक्ति के साथ रोमांटिक संबंध रखना शामिल है।
- •
मुसलमानों के रूप में हमारा काम दूसरों को इस्लाम के बारे में सिखाना है, उन्हें केवल वही करने के लिए बुलाना है जो अल्लाह को प्रसन्न करता है,
उन्हें उसकी क्षमा के लिए प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करना है, और उन्हें उसकी दया में आशा देना है।
नबी लूत और उनकी क़ौम
160लूत की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया।
161जब उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह से डरोगे नहीं?
"
162मैं यक़ीनन तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
163तो अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो।
164मैं तुमसे इस पर कोई अज्र नहीं माँगता।
मेरा अज्र तो बस रब्बुल आलमीन के पास है।
165तुम अपनी वासना दूसरे पुरुषों से क्यों शांत करते हो,
166उन पत्नियों को छोड़कर जिन्हें तुम्हारे रब ने तुम्हारे लिए पैदा किया है?
वास्तव में, तुम सारी हदें पार कर चुके हो।
167उन्होंने धमकी दी, "ऐ लूत, अगर तुम बाज़ नहीं आते, तो तुम्हें ज़रूर निकाल दिया जाएगा।
"
168लूत ने जवाब दिया, "मैं यकीनन उन लोगों में से हूँ जो तुम्हारे इस 'घृणित' कार्य से घृणा करते हैं।
"
169मेरे रब!
मुझे और मेरे परिवार को उनके इस कार्य की बुराई से बचा ले।
170तो हमने उसे और उसके समस्त परिवार को बचा लिया,
171सिवाय एक बूढ़ी स्त्री के, जो पीछे रह जाने वालों में से थी।
172फिर हमने बाकियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
173और उन पर एक वर्षा बरसाई।
और कितनी बुरी थी वह वर्षा उन पर जिन्हें चेतावनी दी गई थी!
174निःसंदेह इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाए।
175और निःसंदेह आपका रब ही सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयालु है।
كَذَّبَتۡ قَوۡمُ لُوطٍ ٱلۡمُرۡسَلِينَ160
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ لُوطٌ أَلَا تَتَّقُونَ161
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِين162
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ163
وَمَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ164
أَتَأۡتُونَ ٱلذُّكۡرَانَ مِنَ ٱلۡعَٰلَمِينَ165
وَتَذَرُونَ مَا خَلَقَ لَكُمۡ رَبُّكُم مِّنۡ أَزۡوَٰجِكُمۚ بَلۡ أَنتُمۡ قَوۡمٌ عَادُونَ166
قَالُواْ لَئِن لَّمۡ تَنتَهِ يَٰلُوطُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُخۡرَجِينَ167
قَالَ إِنِّي لِعَمَلِكُم مِّنَ ٱلۡقَالِينَ168
رَبِّ نَجِّنِي وَأَهۡلِي مِمَّا يَعۡمَلُونَ169
فَنَجَّيۡنَٰهُ وَأَهۡلَهُۥٓ أَجۡمَعِينَ170
إِلَّا عَجُوزٗا فِي ٱلۡغَٰبِرِينَ171
ثُمَّ دَمَّرۡنَا ٱلۡأٓخَرِينَ172
وَأَمۡطَرۡنَا عَلَيۡهِم مَّطَرٗاۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلۡمُنذَرِينَ173
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ174
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ175
पैगंबर शुऐब और मुनकिर
176ऐका वालों ने रसूलों को झुठलाया।
177जब शुऐब ने उनसे फ़रमाया, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरोगे?
"
178मैं यक़ीनन तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
179तो अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो।
180मैं तुमसे इस पर कोई मज़दूरी नहीं माँगता।
मेरा अज्र तो केवल सारे जहानों के रब के पास है।
181पूरा माप दो और दूसरों को हानि मत पहुँचाओ।
182ठीक तराजू से तोलो,
183और लोगों को उनकी चीज़ों से वंचित मत करो।
धरती में फ़साद मत फैलाओ।
184और उस से डरो जिसने तुम्हें और पिछले सभी लोगों को पैदा किया।
185उन्होंने जवाब दिया, "तुम पर तो बस जादू कर दिया गया है!
"
186तुम तो हमारे जैसे ही एक इंसान हो, और हम समझते हैं कि तुम यक़ीनन झूठे हो।
187तो हम पर आसमान से 'जानलेवा' टुकड़े गिरा दो, अगर तुम सच्चे हो।
"⁹
188शुऐब ने जवाब दिया, "मेरा रब भली-भाँति जानता है जो कुछ भी तुम करते हो।
"
189वे उसे झुठलाते रहे, तो उन्हें 'जानलेवा' बादल वाले दिन की सज़ा ने आ घेरा।
वह सचमुच एक भयानक दिन की सज़ा थी।
¹⁰
190यक़ीनन इसमें एक निशानी है।
फिर भी उनमें से अधिकतर ईमान नहीं लाते।
191और तुम्हारा रब यकीनन सर्वशक्तिमान, परम दयालु है।
كَذَّبَ أَصۡحَٰبُ لَۡٔيۡكَةِ ٱلۡمُرۡسَلِينَ176
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ شُعَيۡبٌ أَلَا تَتَّقُونَ177
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِين178
فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ179
وَمَآ أَسَۡٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ180
أَوۡفُواْ ٱلۡكَيۡلَ وَلَا تَكُونُواْ مِنَ ٱلۡمُخۡسِرِينَ181
وَزِنُواْ بِٱلۡقِسۡطَاسِ ٱلۡمُسۡتَقِيمِ182
وَلَا تَبۡخَسُواْ ٱلنَّاسَ أَشۡيَآءَهُمۡ وَلَا تَعۡثَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ مُفۡسِدِينَ183
وَٱتَّقُواْ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلۡجِبِلَّةَ ٱلۡأَوَّلِينَ184
قَالُوٓاْ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلۡمُسَحَّرِينَ185
وَمَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٞ مِّثۡلُنَا وَإِن نَّظُنُّكَ لَمِنَ ٱلۡكَٰذِبِينَ186
فَأَسۡقِطۡ عَلَيۡنَا كِسَفٗا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ187
قَالَ رَبِّيٓ أَعۡلَمُ بِمَا تَعۡمَلُونَ188
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمۡ عَذَابُ يَوۡمِ ٱلظُّلَّةِۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَذَابَ يَوۡمٍ عَظِيمٍ189
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ190
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ191
कुरान अल्लाह से है।
192यह क़ुरआन वास्तव में सारे जहानों के रब की ओर से अवतरित हुआ है,
193जिसे विश्वसनीय रूह जिब्रील ने उतारा,
194आपके दिल पर, ऐ नबी, ताकि आप चेतावनी देने वालों में से हों,
195स्पष्ट अरबी भाषा में।
196और निःसंदेह इसका उल्लेख पहले वालों की किताबों में भी किया गया है।
197क्या यह उनके लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं है कि इसे 'बनी इस्राईल के विद्वानों द्वारा पहले ही पहचान लिया गया है?
'¹¹
198यदि हम इसे किसी अजमी पर नाज़िल करते,
199और वह उसे इनकार करने वालों को 'स्पष्ट अरबी में' पढ़कर सुनाता, तब भी वे इस पर ईमान न लाते!
200इसी तरह हम इनकार को दुष्टों के दिलों में 'घुसने' देते हैं।
201वे इस पर ईमान नहीं लाएंगे जब तक वे दर्दनाक अज़ाब को नहीं देख लेते,
202जो उन्हें अचानक आ पकड़ेगा जब उन्हें इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं होगी।
203तब वे पुकारेंगे, "हाय!
क्या हमें कुछ और मोहलत मिल सकती है?
"
وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ192
نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلۡأَمِينُ193
عَلَىٰ قَلۡبِكَ لِتَكُونَ مِنَ ٱلۡمُنذِرِينَ194
بِلِسَانٍ عَرَبِيّٖ مُّبِين195
وَإِنَّهُۥ لَفِي زُبُرِ ٱلۡأَوَّلِينَ196
أَوَ لَمۡ يَكُن لَّهُمۡ ءَايَةً أَن يَعۡلَمَهُۥ عُلَمَٰٓؤُاْ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ197
وَلَوۡ نَزَّلۡنَٰهُ عَلَىٰ بَعۡضِ ٱلۡأَعۡجَمِينَ198
فَقَرَأَهُۥ عَلَيۡهِم مَّا كَانُواْ بِهِۦ مُؤۡمِنِينَ199
كَذَٰلِكَ سَلَكۡنَٰهُ فِي قُلُوبِ ٱلۡمُجۡرِمِينَ200
لَا يُؤۡمِنُونَ بِهِۦ حَتَّىٰ يَرَوُاْ ٱلۡعَذَابَ ٱلۡأَلِيمَ201
فَيَأۡتِيَهُم بَغۡتَةٗ وَهُمۡ لَا يَشۡعُرُونَ202
فَيَقُولُواْ هَلۡ نَحۡنُ مُنظَرُونَ203
मक्कावासियों को चेतावनी
204क्या वे सचमुच हमारे अज़ाब को जल्दी लाना चाहते हैं?
205ऐ पैग़म्बर, सोचो यदि हम उन्हें वर्षों तक भोगने दें,
206फिर वह अज़ाब जिसका उनसे वादा किया गया था, सचमुच उन पर आ पड़ा:
207क्या वह सारा पिछला भोग उन्हें ज़रा भी मदद करेगा?
208हमने कभी किसी बस्ती को डराने वाले भेजे बिना तबाह नहीं किया।
209पहले अपने लोगों को याद दिलाने के लिए; हम कभी ज़ुल्म नहीं करते।
أَفَبِعَذَابِنَا يَسۡتَعۡجِلُونَ204
أَفَرَءَيۡتَ إِن مَّتَّعۡنَٰهُمۡ سِنِينَ205
ثُمَّ جَآءَهُم مَّا كَانُواْ يُوعَدُونَ206
مَآ أَغۡنَىٰ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يُمَتَّعُونَ207
وَمَآ أَهۡلَكۡنَا مِن قَرۡيَةٍ إِلَّا لَهَا مُنذِرُونَ208
ذِكۡرَىٰ وَمَا كُنَّا ظَٰلِمِينَ209
क़ुरान अल्लाह का कलाम है।
210इस 'कुरान' को शैतान लेकर नहीं उतरे थे।
211उनके लिए यह संभव नहीं है, और वे ऐसा कर ही नहीं सकते।
212उन्हें इसे चोरी-छिपे सुनने से भी सख़्त मनाही है।
وَمَا تَنَزَّلَتۡ بِهِ ٱلشَّيَٰطِينُ210
وَمَا يَنۢبَغِي لَهُمۡ وَمَا يَسۡتَطِيعُونَ211
إِنَّهُمۡ عَنِ ٱلسَّمۡعِ لَمَعۡزُولُونَ212
नबी को नसीहत
213तो अल्लाह के सिवा किसी और माबूद को कभी न पुकारो, अन्यथा तुम दंडितों में से होगे।
214और अपने निकटतम संबंधियों को आगाह करो,
215और उन मोमिनों के साथ नरमी बरतो जो तुम्हारी पैरवी करते हैं।
216लेकिन अगर वे तुम्हारी नाफरमानी करें, तो कहो, 'मैं तुम्हारे कर्मों से बरी हूँ।
'
217उस सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयालु पर भरोसा रखो,
218वह तुम्हें देखता है जब तुम रात में इबादत के लिए खड़े होते हो,
219और नमाज़ में तुम्हारे उठने-बैठने को, अन्य इबादत करने वालों के साथ।
220बेशक वह सब कुछ सुनता और जानता है।
فَلَا تَدۡعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ فَتَكُونَ مِنَ ٱلۡمُعَذَّبِينَ213
وَأَنذِرۡ عَشِيرَتَكَ ٱلۡأَقۡرَبِينَ214
وَٱخۡفِضۡ جَنَاحَكَ لِمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ215
فَإِنۡ عَصَوۡكَ فَقُلۡ إِنِّي بَرِيٓءٞ مِّمَّا تَعۡمَلُونَ216
وَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱلۡعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ217
ٱلَّذِي يَرَىٰكَ حِينَ تَقُومُ218
وَتَقَلُّبَكَ فِي ٱلسَّٰجِدِينَ219
إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ220
शैतान और काहिन
221क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि शैतान किस पर उतरते हैं?
222वे हर गुनाहगार झूठे पर उतरते हैं,
223जो आधी-अधूरी बातें सुनते हैं, और अधिकतर झूठ ही फैलाते हैं।
هَلۡ أُنَبِّئُكُمۡ عَلَىٰ مَن تَنَزَّلُ ٱلشَّيَٰطِينُ221
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٖ222
يُلۡقُونَ ٱلسَّمۡعَ وَأَكۡثَرُهُمۡ كَٰذِبُونَ223
हिन्दी बच्चों की अध्ययन मार्गदर्शिका
हिन्दी बच्चों के लिए कुरान अध्ययन: यह पृष्ठ हिन्दी परिवारों को सरल व्याख्या, अरबी आयत, हिन्दी अर्थ, तिलावत और दैनिक अभ्यास के साथ कुरान सीखने में मदद करता
है।
सूरह और आयत के नाम अरबी हो सकते हैं, लेकिन मुख्य सीखने की दिशा, दोहराव, पारिवारिक चर्चा और बच्चों की समझ हिन्दी संदर्भ में दी गई है।
हिन्दी पाठ मार्गदर्शन: हर भाग में अरबी आयत के साथ हिन्दी अर्थ, बच्चों के लिए सरल शिक्षा, छोटे प्रश्न, दोहराव और परिवार में चर्चा का रास्ता दिया गया
है।
यदि किसी क्रॉलर को कई अरबी शब्द दिखें, तो ये हिन्दी अनुच्छेद पृष्ठ की मुख्य भाषा स्पष्ट करते हैं: हिन्दी कुरान अध्ययन, हिन्दी अनुवाद, बच्चों का पाठ, तिलावत
और दैनिक अभ्यास।
How to study Surah Ash-Shu'arâ' with children
इस बच्चों के कुरान पाठ को चरणबद्ध तरीके से पढ़ें: पहले सरल व्याख्या पढ़ें, फिर अरबी आयत देखें, ज़रूरत हो तो तिलावत सुनें, और अंत में बच्चे से
मुख्य शिक्षा अपने शब्दों में दोहराने को कहें।
माता-पिता हर बार एक छोटा भाग चुन सकते हैं।
बच्चे से एक आसान प्रश्न पूछें, आयत का अर्थ फिर पढ़ें, और फिर उसी सूरह के पूरे पाठ या पास की दूसरी बच्चों की पाठ सामग्री की ओर
बढ़ें।
हिन्दी अध्ययन संदर्भ में यह पृष्ठ कुरान, सूरह, आयत, सरल व्याख्या, तिलावत, पारिवारिक चर्चा और दैनिक अभ्यास को जोड़ता है।
अरबी पाठ के साथ हिन्दी व्याख्या पढ़ने से बच्चों को अर्थ याद रखने में सहायता मिलती है।
हिन्दी बच्चों के कुरान पाठ में हिन्दी प्रश्न, हिन्दी व्याख्या, हिन्दी अनुवाद, परिवार में चर्चा, छोटी पुनरावृत्ति और तिलावत सुनने के चरण रखे गए हैं ताकि पृष्ठ का
मुख्य भाषा संकेत स्पष्ट रहे।
सूरह नाम या आयत अरबी में हो सकते हैं, लेकिन सीखने की दिशा हिन्दी है।
हिन्दी परिवार इस पृष्ठ से बच्चे को कुरान का अर्थ, आचरण, दुआ, दोहराव और दैनिक अभ्यास सिखा सकते हैं।