यह अनुवाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से किया गया है। इसके अलावा, यह डॉ. मुस्तफा खत्ताब के "स्पष्ट कुरआन" पर आधारित है।

Surah 70 - المَعَارِج

Al-Ma’ârij (सूरह 70)

المَعَارِج (Pathways of ˹Heavenly˺ Ascent)

मक्की सूरहमक्की सूरह

परिचय

यह मक्की सूरह, जिसका नाम आयत 3 से लिया गया है, क़यामत के दिन (आयत 1-2) और पैगंबर (ﷺ) (आयत 36-37) का उपहास करने के लिए मुशरिकों की निंदा करती है। क़यामत की सच्चाई की पुनः पुष्टि की गई है, और उसके बाद होने वाली भयावहताओं का भी वर्णन किया गया है। जहन्नमियों और जन्नतियों के गुणों का वर्णन किया गया है (आयत 16-35 में)। पैगंबर (ﷺ) को आश्वस्त किया गया है, जबकि मुशरिकों को चेतावनी दी गई है—ये दोनों विषय अगली सूरह में नूह (ﷺ) की कहानी में समाहित हैं। अल्लाह के नाम से जो परम कृपालु, अत्यंत दयावान है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है।

एक उपहास करने वाला क़यामत के दिन की मांग करता है।

1. एक माँगने वाले ने एक ऐसे अज़ाब की माँग की है जो अवश्य आएगा। 2. काफ़िरों के लिए—जिसे कोई टाल नहीं सकता— 3. अल्लाह की ओर से, जो मेराजों का मालिक है। 4. जिसमें फ़रिश्ते और रूह उसकी ओर चढ़ेंगे, एक ऐसे दिन में जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष की होगी। 5. अतः सुंदर सब्र करो। 6. वे इसे (इस दिन को) सचमुच असंभव समझते हैं, 7. लेकिन हम इसे अवश्यंभावी मानते हैं।
سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ
١
لِّلْكَـٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌ
٢
مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ
٣
تَعْرُجُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ
٤
فَٱصْبِرْ صَبْرًا جَمِيلًا
٥
إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًا
٦
وَنَرَىٰهُ قَرِيبًا
٧

सूरह 70 - المَعَارِج (चढ़ाई के रास्ते) - आयतें 1-7


क़यामत के दिन की भयावहताएँ।

8. उस दिन आकाश पिघले हुए पीतल जैसा होगा। 9. और पहाड़ धुनी हुई ऊन की तरह होंगे। 10. और कोई घनिष्ठ मित्र किसी घनिष्ठ मित्र को नहीं पूछेगा, 11. उन्हें एक-दूसरे को दिखाया जाएगा। अपराधी चाहेंगे कि वे उस दिन की यातना से अपने बच्चों के बदले स्वयं को छुड़ा लें, 12. अपने जीवनसाथियों के बदले, अपने भाई-बहनों के बदले, 13. उनका कबीला जिसने उन्हें पनाह दी, 14. और धरती पर के सब लोग मिलकर, बस खुद को बचाने के लिए। 15. हरगिज़ नहीं! यक़ीनन एक भड़कती हुई आग होगी। 16. खोपड़ी की खाल उधेड़ना। 17. वह हर उस व्यक्ति को बुलाएगी जिसने (अल्लाह से) पीठ फेरी और (सत्य से) मुँह मोड़ा, 18. और जमा किया और बटोर कर रखा।
يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ
٨
وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ
٩
وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًا
١٠
يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ
١١
وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ
١٢
وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ
١٣
وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ يُنجِيهِ
١٤
كَلَّآ ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ
١٥
نَزَّاعَةً لِّلشَّوَىٰ
١٦
تَدْعُوا مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ
١٧
وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ
١٨

सूरह 70 - المَعَارِج (चढ़ाई के रास्ते) - आयतें 8-18


ईमान वालों की श्रेष्ठता।

19. निःसंदेह, मनुष्य को अधीर बनाया गया है: 20. जब उसे बुराई छूती है, तो वह व्यथित हो जाता है, 21. और जब उसे भलाई छूती है, तो वह रोकने वाला हो जाता है। 22. सिवाय उन के जो नमाज़ पढ़ते हैं, 23. जो अपनी नमाज़ों को पाबंदी से अदा करते हैं; 24. और जो अपने माल में से हक़ देते हैं 25. भिखारी और गरीबों को; 26. और जो क़यामत के दिन पर ईमान रखते हैं; 27. और वे जो अपने रब के अज़ाब से डरते हैं— 28. कोई भी अपने रब की सज़ा से बेखौफ न हो— 29. और जो अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करते हैं 30. सिवाय अपनी पत्नियों के या उन (दासियों) के जो उनके अधिकार में हैं, तो उन पर कोई दोष नहीं, 31. और जो इसके सिवा कुछ और चाहे, तो ऐसे ही लोग हद से बढ़ने वाले हैं। 32. और जो अपनी अमानतों और अपने अहदों का पास रखने वाले हैं; 33. और जो अपनी गवाहियों में सच्चे हैं; 34. और जो अपनी नमाज़ों को कायम रखते हैं। 35. ये जन्नतों में होंगे, इज़्ज़त के साथ।
۞ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا
١٩
إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًا
٢٠
وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا
٢١
إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ
٢٢
ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ
٢٣
وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّ مَّعْلُومٌ
٢٤
لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
٢٥
وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
٢٦
وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
٢٧
إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍ
٢٨
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ
٢٩
إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
٣٠
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُولَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
٣١
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
٣٢
وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَـٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ
٣٣
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
٣٤
أُولَـٰٓئِكَ فِى جَنَّـٰتٍ مُّكْرَمُونَ
٣٥

सूरह 70 - المَعَارِج (चढ़ाई के रास्ते) - आयतें 19-35


उपहास करने वालों को चेतावनी।

36. तो क्या हुआ है इन काफ़िरों को कि ये आपकी तरफ़ (ऐ पैग़म्बर) दौड़े चले आ रहे हैं? 37. दाहिनी ओर से और बाईं ओर से, गिरोहों में (तुम्हारा उपहास करने के लिए)? 38. क्या उनमें से हर एक उम्मीद करता है कि उसे नेमतों के बाग़ में दाख़िल किया जाए? 39. हरगिज़ नहीं! बेशक, वे भली-भाँति जानते हैं कि हमने उन्हें किस चीज़ से पैदा किया है। 40. तो, मैं मशरिक़ों और मग़रिबों के रब की क़सम खाता हूँ कि हम यक़ीनन क़ादिर हैं 41. कि उन्हें उनसे बेहतर से बदल दें, और हमें कोई रोक नहीं सकता। 42. तो उन्हें छोड़ दो कि वे व्यर्थ में लगे रहें और खेलते रहें जब तक कि वे अपने उस दिन का सामना न कर लें जिसकी उन्हें धमकी दी गई है। 43. जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी से निकलेंगे, मानो किसी मूर्ति की ओर दौड़ रहे हों। 44. उनकी आँखें झुकी होंगी, वे ज़िल्लत से पूरी तरह ढके होंगे। यही वह दिन है जिसकी उन्हें चेतावनी दी जाती रही है।
فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ
٣٦
عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ
٣٧
أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍ
٣٨
كَلَّآ ۖ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ
٣٩
فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَـٰرِقِ وَٱلْمَغَـٰرِبِ إِنَّا لَقَـٰدِرُونَ
٤٠
عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
٤١
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
٤٢
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍ يُوفِضُونَ
٤٣
خَـٰشِعَةً أَبْصَـٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا يُوعَدُونَ
٤٤

सूरह 70 - المَعَارِج (चढ़ाई के रास्ते) - आयतें 36-44


Full text of Surah Al-Ma'ârij with translation

Surah Al-Ma'ârij, verse 1

سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ
एक माँगने वाले ने एक ऐसे अज़ाब की माँग की है जो अवश्य आएगा।

Surah Al-Ma'ârij, verse 2

لِّلْكَـٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌ
काफ़िरों के लिए—जिसे कोई टाल नहीं सकता—

Surah Al-Ma'ârij, verse 3

مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ
अल्लाह की ओर से, जो मेराजों का मालिक है।

Surah Al-Ma'ârij, verse 4

تَعْرُجُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ
जिसमें फ़रिश्ते और रूह उसकी ओर चढ़ेंगे, एक ऐसे दिन में जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष की होगी।

Surah Al-Ma'ârij, verse 5

فَٱصْبِرْ صَبْرًا جَمِيلًا
अतः सुंदर सब्र करो।

Surah Al-Ma'ârij, verse 6

إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًا
वे इसे (इस दिन को) सचमुच असंभव समझते हैं,

Surah Al-Ma'ârij, verse 7

وَنَرَىٰهُ قَرِيبًا
लेकिन हम इसे अवश्यंभावी मानते हैं।

Surah Al-Ma'ârij, verse 8

يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ
उस दिन आकाश पिघले हुए पीतल जैसा होगा।

Surah Al-Ma'ârij, verse 9

وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ
और पहाड़ धुनी हुई ऊन की तरह होंगे।

Surah Al-Ma'ârij, verse 10

وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًا
और कोई घनिष्ठ मित्र किसी घनिष्ठ मित्र को नहीं पूछेगा,

Surah Al-Ma'ârij, verse 11

يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ
उन्हें एक-दूसरे को दिखाया जाएगा। अपराधी चाहेंगे कि वे उस दिन की यातना से अपने बच्चों के बदले स्वयं को छुड़ा लें,

Surah Al-Ma'ârij, verse 12

وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ
अपने जीवनसाथियों के बदले, अपने भाई-बहनों के बदले,

Surah Al-Ma'ârij, verse 13

وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ
उनका कबीला जिसने उन्हें पनाह दी,

Surah Al-Ma'ârij, verse 14

وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ يُنجِيهِ
और धरती पर के सब लोग मिलकर, बस खुद को बचाने के लिए।

Surah Al-Ma'ârij, verse 15

كَلَّآ ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ
हरगिज़ नहीं! यक़ीनन एक भड़कती हुई आग होगी।

Surah Al-Ma'ârij, verse 16

نَزَّاعَةً لِّلشَّوَىٰ
खोपड़ी की खाल उधेड़ना।

Surah Al-Ma'ârij, verse 17

تَدْعُوا مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ
वह हर उस व्यक्ति को बुलाएगी जिसने (अल्लाह से) पीठ फेरी और (सत्य से) मुँह मोड़ा,

Surah Al-Ma'ârij, verse 18

وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ
और जमा किया और बटोर कर रखा।

Surah Al-Ma'ârij, verse 19

۞ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا
निःसंदेह, मनुष्य को अधीर बनाया गया है:

Surah Al-Ma'ârij, verse 20

إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًا
जब उसे बुराई छूती है, तो वह व्यथित हो जाता है,

Surah Al-Ma'ârij, verse 21

وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا
और जब उसे भलाई छूती है, तो वह रोकने वाला हो जाता है।

Surah Al-Ma'ârij, verse 22

إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ
सिवाय उन के जो नमाज़ पढ़ते हैं,

Surah Al-Ma'ârij, verse 23

ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ
जो अपनी नमाज़ों को पाबंदी से अदा करते हैं;

Surah Al-Ma'ârij, verse 24

وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّ مَّعْلُومٌ
और जो अपने माल में से हक़ देते हैं

Surah Al-Ma'ârij, verse 25

لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
भिखारी और गरीबों को;

Surah Al-Ma'ârij, verse 26

وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
और जो क़यामत के दिन पर ईमान रखते हैं;

Surah Al-Ma'ârij, verse 27

وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
और वे जो अपने रब के अज़ाब से डरते हैं—

Surah Al-Ma'ârij, verse 28

إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍ
कोई भी अपने रब की सज़ा से बेखौफ न हो—

Surah Al-Ma'ârij, verse 29

وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ
और जो अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करते हैं

Surah Al-Ma'ârij, verse 30

إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
सिवाय अपनी पत्नियों के या उन (दासियों) के जो उनके अधिकार में हैं, तो उन पर कोई दोष नहीं,

Surah Al-Ma'ârij, verse 31

فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُولَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
और जो इसके सिवा कुछ और चाहे, तो ऐसे ही लोग हद से बढ़ने वाले हैं।

Surah Al-Ma'ârij, verse 32

وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
और जो अपनी अमानतों और अपने अहदों का पास रखने वाले हैं;

Surah Al-Ma'ârij, verse 33

وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَـٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ
और जो अपनी गवाहियों में सच्चे हैं;

Surah Al-Ma'ârij, verse 34

وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
और जो अपनी नमाज़ों को कायम रखते हैं।

Surah Al-Ma'ârij, verse 35

أُولَـٰٓئِكَ فِى جَنَّـٰتٍ مُّكْرَمُونَ
ये जन्नतों में होंगे, इज़्ज़त के साथ।

Surah Al-Ma'ârij, verse 36

فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ
तो क्या हुआ है इन काफ़िरों को कि ये आपकी तरफ़ (ऐ पैग़म्बर) दौड़े चले आ रहे हैं?

Surah Al-Ma'ârij, verse 37

عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ
दाहिनी ओर से और बाईं ओर से, गिरोहों में (तुम्हारा उपहास करने के लिए)?

Surah Al-Ma'ârij, verse 38

أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍ
क्या उनमें से हर एक उम्मीद करता है कि उसे नेमतों के बाग़ में दाख़िल किया जाए?

Surah Al-Ma'ârij, verse 39

كَلَّآ ۖ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ
हरगिज़ नहीं! बेशक, वे भली-भाँति जानते हैं कि हमने उन्हें किस चीज़ से पैदा किया है।

Surah Al-Ma'ârij, verse 40

فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَـٰرِقِ وَٱلْمَغَـٰرِبِ إِنَّا لَقَـٰدِرُونَ
तो, मैं मशरिक़ों और मग़रिबों के रब की क़सम खाता हूँ कि हम यक़ीनन क़ादिर हैं

Surah Al-Ma'ârij, verse 41

عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
कि उन्हें उनसे बेहतर से बदल दें, और हमें कोई रोक नहीं सकता।

Surah Al-Ma'ârij, verse 42

فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
तो उन्हें छोड़ दो कि वे व्यर्थ में लगे रहें और खेलते रहें जब तक कि वे अपने उस दिन का सामना न कर लें जिसकी उन्हें धमकी दी गई है।

Surah Al-Ma'ârij, verse 43

يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍ يُوفِضُونَ
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी से निकलेंगे, मानो किसी मूर्ति की ओर दौड़ रहे हों।

Surah Al-Ma'ârij, verse 44

خَـٰشِعَةً أَبْصَـٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا يُوعَدُونَ
उनकी आँखें झुकी होंगी, वे ज़िल्लत से पूरी तरह ढके होंगे। यही वह दिन है जिसकी उन्हें चेतावनी दी जाती रही है।