Aṭ-Ṭalâq - Divorce
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हे नबी!
जब तुम औरतों को तलाक़ दो, तो उन्हें उनकी इद्दत (प्रतीक्षा अवधि) का ध्यान रखते हुए तलाक़ दो और उसे सही-सही गिनो। और अल्लाह से डरो, जो तुम्हारा रब है। उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे खुद निकलें—सिवाय इसके कि वे कोई खुली बेहयाई करें। ये अल्लाह की हदें हैं। और जो कोई अल्लाह की हदों को लाँघता है, उसने यकीनन अपनी ही जान पर ज़ुल्म किया। तुम नहीं जानते, शायद अल्लाह इसके बाद कोई (दिल का) बदलाव पैदा कर दे। फिर जब वे अपनी इद्दत की अवधि पूरी करने के करीब हों, तो उन्हें सम्मानपूर्वक रोक लो या सम्मानपूर्वक उनसे अलग हो जाओ। और अपने में से दो भरोसेमंद आदमियों को गवाह बना लो—और (गवाहों को चाहिए कि) वे अल्लाह के लिए सच्ची गवाही दें। यह उस हर शख्स को नसीहत दी जाती है, जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है। और जो कोई अल्लाह का तक़वा (भय) रखता है, अल्लाह उसके लिए एक रास्ता निकाल देगा, और उसे ऐसी जगह से रिज़्क़ देगा जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। और जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है, तो वह (अल्लाह) उसके लिए काफी है। यकीनन अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ के लिए एक तक़दीर (निश्चित माप) मुक़र्रर कर रखी है।
