Al-Mumtaḥanah - The Test of Faith
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ऐ ईमान वालो!
मेरे और अपने दुश्मनों को दोस्त न बनाओ, उनसे मुहब्बत का इज़हार करते हुए, जबकि वे उस हक़ को झुठला चुके हैं जो तुम्हारे पास आया है। उन्होंने रसूल को और तुम्हें (मक्का से) निकाल दिया, सिर्फ़ इस बात पर कि तुम अल्लाह, अपने रब पर ईमान रखते हो। अगर तुम मेरी राह में जिहाद करने और मेरी रज़ा (प्रसन्नता) चाहने के लिए हिजरत करके निकले हो, (तो उन्हें दोस्त न बनाओ,) उनके प्रति मुहब्बत के कारण काफ़िरों को (ईमान वालों के) भेद बताते हो, जबकि मैं खूब जानता हूँ जो कुछ तुम छुपाते हो और जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो। और तुम में से जो कोई ऐसा करेगा, वह यक़ीनन सीधी राह से भटक गया। अगर वे तुम पर ग़ालिब आ जाएँ, तो वे तुम्हारे (खुले) दुश्मन बन जाएँगे, अपने हाथों और ज़बानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए खोल देंगे, और चाहेंगे कि तुम ईमान छोड़ दो। क़यामत के दिन न तुम्हारे रिश्तेदार और न तुम्हारी औलाद तुम्हें कोई फ़ायदा पहुँचाएगी—वह (अल्लाह) तुम (सब) के दरमियान फ़ैसला करेगा। और अल्लाह तुम्हारे हर अमल को खूब देखने वाला है।
