Surah Al-Mumtaḥanah, verse 1
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوِّى وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَآءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِم بِٱلْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَآءَكُم مِّنَ ٱلْحَقِّ يُخْرِجُونَ ٱلرَّسُولَ وَإِيَّاكُمْ ۙ أَن تُؤْمِنُوا بِٱللَّهِ رَبِّكُمْ إِن كُنتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَـٰدًا فِى سَبِيلِى وَٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِى ۚ تُسِرُّونَ إِلَيْهِم بِٱلْمَوَدَّةِ وَأَنَا۠ أَعْلَمُ بِمَآ أَخْفَيْتُمْ وَمَآ أَعْلَنتُمْ ۚ وَمَن يَفْعَلْهُ مِنكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ
ऐ ईमान वालो! मेरे और अपने दुश्मनों को दोस्त न बनाओ, उनसे मुहब्बत का इज़हार करते हुए, जबकि वे उस हक़ को झुठला चुके हैं जो तुम्हारे पास आया है। उन्होंने रसूल को और तुम्हें (मक्का से) निकाल दिया, सिर्फ़ इस बात पर कि तुम अल्लाह, अपने रब पर ईमान रखते हो। अगर तुम मेरी राह में जिहाद करने और मेरी रज़ा (प्रसन्नता) चाहने के लिए हिजरत करके निकले हो, (तो उन्हें दोस्त न बनाओ,) उनके प्रति मुहब्बत के कारण काफ़िरों को (ईमान वालों के) भेद बताते हो, जबकि मैं खूब जानता हूँ जो कुछ तुम छुपाते हो और जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो। और तुम में से जो कोई ऐसा करेगा, वह यक़ीनन सीधी राह से भटक गया।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 2
إِن يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا لَكُمْ أَعْدَآءً وَيَبْسُطُوٓا إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ وَأَلْسِنَتَهُم بِٱلسُّوٓءِ وَوَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَ
अगर वे तुम पर ग़ालिब आ जाएँ, तो वे तुम्हारे (खुले) दुश्मन बन जाएँगे, अपने हाथों और ज़बानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए खोल देंगे, और चाहेंगे कि तुम ईमान छोड़ दो।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 3
لَن تَنفَعَكُمْ أَرْحَامُكُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُكُمْ ۚ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
क़यामत के दिन न तुम्हारे रिश्तेदार और न तुम्हारी औलाद तुम्हें कोई फ़ायदा पहुँचाएगी—वह (अल्लाह) तुम (सब) के दरमियान फ़ैसला करेगा। और अल्लाह तुम्हारे हर अमल को खूब देखने वाला है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 4
قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِىٓ إِبْرَٰهِيمَ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥٓ إِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَءَٰٓؤُا مِنكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ ٱلْعَدَٰوَةُ وَٱلْبَغْضَآءُ أَبَدًا حَتَّىٰ تُؤْمِنُوا بِٱللَّهِ وَحْدَهُۥٓ إِلَّا قَوْلَ إِبْرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ لَأَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَآ أَمْلِكُ لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ ۖ رَّبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَإِلَيْكَ أَنَبْنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ
तुम्हारे लिए इब्राहीम में और उनके साथियों में एक उत्तम आदर्श है, जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा, “हम तुमसे और उन सब से बिल्कुल बेज़ार हैं जिनकी तुम अल्लाह के सिवा इबादत करते हो। हम तुम्हें अस्वीकार करते हैं। हमारे और तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो गई है, और यह तब तक रहेगी जब तक तुम अकेले अल्लाह पर ईमान न ले आओ।” सिवाय इब्राहीम के अपने पिता से कहने के, “मैं तुम्हारे लिए माफ़ी माँगूँगा, लेकिन मैं तुम्हें अल्लाह से बचाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकता।” (ईमानवालों ने दुआ की,) “ऐ हमारे रब! तुझ पर ही हमने भरोसा किया। और तेरी ही ओर हम रुजू होते हैं। और तेरी ही ओर अंतिम वापसी है।”
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 5
رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا وَٱغْفِرْ لَنَا رَبَّنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
ऐ हमारे रब! हमें काफ़िरों के लिए फ़ितना न बना। हमें बख़्श दे, ऐ हमारे रब! बेशक तू ही ज़बरदस्त, हिकमत वाला है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 6
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيهِمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُوا ٱللَّهَ وَٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ ۚ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ٱلْحَمِيدُ
बेशक तुम्हारे लिए उनमें एक उत्तम आदर्श है हर उस शख़्स के लिए जो अल्लाह और आख़िरत के दिन की उम्मीद रखता है। और जो कोई मुँह मोड़ेगा, तो बेशक अल्लाह ही बेनियाज़, क़ाबिले-तारीफ़ है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 7
۞ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ ٱلَّذِينَ عَادَيْتُم مِّنْهُم مَّوَدَّةً ۚ وَٱللَّهُ قَدِيرٌ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
हो सकता है कि अल्लाह तुम्हारे और उन लोगों के बीच, जिन्हें तुम (अब) दुश्मन समझते हो, प्रेम उत्पन्न कर दे। और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है। और अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 8
لَّا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمْ يُقَـٰتِلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوٓا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ
अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ भलाई और न्याय करने से नहीं रोकता जिन्होंने न तुमसे लड़ाई की और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला। निःसंदेह अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 9
إِنَّمَا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ قَـٰتَلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَأَخْرَجُوكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ وَظَـٰهَرُوا عَلَىٰٓ إِخْرَاجِكُمْ أَن تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
अल्लाह तुम्हें केवल उन लोगों से दोस्ती करने से रोकता है जिन्होंने तुम्हारे धर्म के लिए तुमसे लड़ाई की, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला, या ऐसा करने में (दूसरों का) समर्थन किया। और जो कोई उन्हें मित्र बनाता है, तो वही लोग वास्तव में ज़ालिम हैं।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 10
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا إِذَا جَآءَكُمُ ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ مُهَـٰجِرَٰتٍ فَٱمْتَحِنُوهُنَّ ۖ ٱللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَـٰنِهِنَّ ۖ فَإِنْ عَلِمْتُمُوهُنَّ مُؤْمِنَـٰتٍ فَلَا تَرْجِعُوهُنَّ إِلَى ٱلْكُفَّارِ ۖ لَا هُنَّ حِلٌّ لَّهُمْ وَلَا هُمْ يَحِلُّونَ لَهُنَّ ۖ وَءَاتُوهُم مَّآ أَنفَقُوا ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ أَن تَنكِحُوهُنَّ إِذَآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ ۚ وَلَا تُمْسِكُوا بِعِصَمِ ٱلْكَوَافِرِ وَسْـَٔلُوا مَآ أَنفَقْتُمْ وَلْيَسْـَٔلُوا مَآ أَنفَقُوا ۚ ذَٰلِكُمْ حُكْمُ ٱللَّهِ ۖ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानवालो! जब तुम्हारे पास ईमानवाली औरतें हिजरत करके आएँ, तो उनकी नीयत की जाँच कर लो—उनका ईमान अल्लाह ही बेहतर जानता है—और यदि तुम उन्हें ईमानवाली पाओ, तो उन्हें काफ़िरों के पास वापस न भेजो। ये (औरतें) काफ़िरों के लिए हलाल नहीं हैं, और न काफ़िर उनके लिए हलाल (पति) हैं। (लेकिन) काफ़िरों को वह (मेहर) लौटा दो जो उन्होंने खर्च किया था। और तुम पर कोई गुनाह नहीं यदि तुम उनसे विवाह करो, बशर्ते कि तुम उन्हें उनका मेहर अदा कर दो। और मुशरिक औरतों से विवाह संबंध बनाए न रखो। (लेकिन) जो (मेहर) तुमने खर्च किया था, उसकी वापसी की माँग करो, और काफ़िरों को भी ऐसा ही करने दो। यह अल्लाह का फ़ैसला है—वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है। और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 11
وَإِن فَاتَكُمْ شَىْءٌ مِّنْ أَزْوَٰجِكُمْ إِلَى ٱلْكُفَّارِ فَعَاقَبْتُمْ فَـَٔاتُوا ٱلَّذِينَ ذَهَبَتْ أَزْوَٰجُهُم مِّثْلَ مَآ أَنفَقُوا ۚ وَٱتَّقُوا ٱللَّهَ ٱلَّذِىٓ أَنتُم بِهِۦ مُؤْمِنُونَ
और यदि तुम्हारी कोई पत्नी काफ़िरों के पास चली जाए, और बाद में तुम्हें उनसे (काफ़िरों से) ग़नीमत (लूट का माल) मिले, तो उन लोगों को, जिनकी पत्नियाँ चली गई हैं, उतना ही (मेहर) लौटा दो जितना उन्होंने खर्च किया था। और अल्लाह से डरो, जिस पर तुम ईमान रखते हो।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 12
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِذَا جَآءَكَ ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَىٰٓ أَن لَّا يُشْرِكْنَ بِٱللَّهِ شَيْـًٔا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْنِينَ وَلَا يَقْتُلْنَ أَوْلَـٰدَهُنَّ وَلَا يَأْتِينَ بِبُهْتَـٰنٍ يَفْتَرِينَهُۥ بَيْنَ أَيْدِيهِنَّ وَأَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْصِينَكَ فِى مَعْرُوفٍ ۙ فَبَايِعْهُنَّ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُنَّ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
ऐ पैग़म्बर! जब ईमानवाली औरतें तुम्हारे पास आएँ, तुमसे इस बात पर बैअत (प्रतिज्ञा) करने के लिए कि वे अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं करेंगी, और न चोरी करेंगी, और न व्यभिचार करेंगी, और न अपनी औलाद को क़त्ल करेंगी, और न अपने पतियों पर झूठा इल्ज़ाम लगाकर (अवैध) बच्चों को उनकी तरफ़ मंसूब करेंगी, और न किसी भी नेक काम में तुम्हारी अवज्ञा करेंगी, तो उनकी बैअत क़बूल कर लो, और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी माँगो। बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला, निहायत मेहरबान है।
Surah Al-Mumtaḥanah, verse 13
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا لَا تَتَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا مِنَ ٱلْـَٔاخِرَةِ كَمَا يَئِسَ ٱلْكُفَّارُ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْقُبُورِ
ऐ ईमानवालो! उन लोगों से मित्रता मत करो जिन पर अल्लाह अप्रसन्न है। उन्हें तो आख़िरत (परलोक) से पहले ही कोई आशा नहीं रही, जैसे कि क़ब्रों में पड़े हुए काफ़िरों को।