The Heights
الأعْرَاف
الاعراف
Surah Al-A'râf for kids content
नबी हूद और उनकी क़ौम
65और आद के लोगों की ओर हमने उनके भाई हूद को भेजा।
उन्होंने कहा, 'ऐ मेरी क़ौम!
अल्लाह की इबादत करो—तुम्हारे लिए उसके सिवा कोई और माबूद नहीं।
तो क्या तुम डरोगे नहीं?
'
66उनकी क़ौम के काफ़िर सरदारों ने जवाब दिया, 'हम तो तुम्हें यक़ीनन बेवक़ूफ़ समझते हैं' और 'हम तुम्हें यक़ीनन झूठा समझते हैं।
'
67उन्होंने जवाब दिया, 'ऐ मेरी क़ौम!
मैं बेवक़ूफ़ नहीं हूँ!
बल्कि मैं तो सारे जहानों के रब का रसूल हूँ,'
68तुम्हें अपने रब के पैग़ाम पहुँचा रहा हूँ और तुम्हें सच्ची नसीहत दे रहा हूँ।
69क्या तुम्हें इस बात पर ताज्जुब है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे ही में से एक आदमी के ज़रिए तुम्हें नसीहत और चेतावनी आई है?
याद करो कि उसने तुम्हें नूह की क़ौम के बाद ज़मीन का वारिस बनाया और तुम्हें जिस्मानी ताक़त में बहुत बढ़ाया।
तो अल्लाह की नेमतों को याद रखो, ताकि तुम कामयाब हो सको।
'
70उन्होंने कहा, 'क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हम अकेले अल्लाह की इबादत करें और उसे छोड़ दें जिसकी हमारे बाप-दादा इबादत करते थे?
तो ले आओ हम पर वह (अज़ाब) जिससे तुम हमें डराते हो, अगर तुम सच्चे हो!
'
71उसने जवाब दिया, 'तुम पर तुम्हारे रब का अज़ाब और ग़ज़ब तो आ ही चुका है।
क्या तुम मुझसे उन नामों के बारे में झगड़ते हो जिन्हें तुमने और तुम्हारे बाप-दादाओं ने गढ़ लिया है—जिसके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा?
तो अब इंतज़ार करो!
मैं भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करने वालों में से हूँ।
'
72तो हमने उसे और उसके साथ वालों को अपनी रहमत से बचा लिया और उन लोगों को जड़ से काट दिया जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और वे
ईमान लाने वाले नहीं थे।
وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمۡ هُودٗاۚ قَالَ يَٰقَوۡمِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنۡ إِلَٰهٍ غَيۡرُهُۥٓۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ65
قَالَ ٱلۡمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن قَوۡمِهِۦٓ إِنَّا لَنَرَىٰكَ فِي سَفَاهَةٖ وَإِنَّا لَنَظُنُّكَ مِنَ ٱلۡكَٰذِبِينَ66
قَالَ يَٰقَوۡمِ لَيۡسَ بِي سَفَاهَةٞ وَلَٰكِنِّي رَسُولٞ مِّن رَّبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ67
أُبَلِّغُكُمۡ رِسَٰلَٰتِ رَبِّي وَأَنَا۠ لَكُمۡ نَاصِحٌ أَمِينٌ68
أَوَعَجِبۡتُمۡ أَن جَآءَكُمۡ ذِكۡرٞ مِّن رَّبِّكُمۡ عَلَىٰ رَجُلٖ مِّنكُمۡ لِيُنذِرَكُمۡۚ وَٱذۡكُرُوٓاْ إِذۡ جَعَلَكُمۡ خُلَفَآءَ مِنۢ بَعۡدِ قَوۡمِ نُوحٖ وَزَادَكُمۡ فِي ٱلۡخَلۡقِ بَصۜۡطَةٗۖ فَٱذۡكُرُوٓاْ ءَالَآءَ ٱللَّهِ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ69
قَالُوٓاْ أَجِئۡتَنَا لِنَعۡبُدَ ٱللَّهَ وَحۡدَهُۥ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعۡبُدُ ءَابَآؤُنَا فَأۡتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ70
قَالَ قَدۡ وَقَعَ عَلَيۡكُم مِّن رَّبِّكُمۡ رِجۡسٞ وَغَضَبٌۖ أَتُجَٰدِلُونَنِي فِيٓ أَسۡمَآءٖ سَمَّيۡتُمُوهَآ أَنتُمۡ وَءَابَآؤُكُم مَّا نَزَّلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلۡطَٰنٖۚ فَٱنتَظِرُوٓاْ إِنِّي مَعَكُم مِّنَ ٱلۡمُنتَظِرِينَ71
فَأَنجَيۡنَٰهُ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥ بِرَحۡمَةٖ مِّنَّا وَقَطَعۡنَا دَابِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَاۖ وَمَا كَانُواْ مُؤۡمِنِينَ72

पैगंबर सालिह और उनकी क़ौम
73और समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई सालेह को भेजा।
उन्होंने कहा, "ऐ मेरी क़ौम!
अल्लाह की इबादत करो—उसके सिवा तुम्हारा कोई और माबूद नहीं।
तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ गया है: यह अल्लाह की ऊँटनी है तुम्हारे लिए एक निशानी के तौर पर।
तो उसे अल्लाह की ज़मीन पर आज़ादी से चरने दो और उसे कोई नुक़सान न पहुँचाओ, वरना तुम्हें एक दर्दनाक अज़ाब आ पकड़ेगा।
"
74याद करो जब उसने तुम्हें 'आद के बाद ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया और तुम्हें ज़मीन में बसाया, तो तुमने उसके मैदानों में महल बनाए और पहाड़ों में घर
तराशे।
तो हमेशा अल्लाह के एहसानों को याद रखो, और ज़मीन में फ़साद फैलाते न फिरो।
"
75उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने उन कमज़ोरों से पूछा जो उनमें से ईमान लाए थे, "क्या तुम्हें यक़ीन है कि सालेह को उसके रब ने भेजा है?
" उन्होंने जवाब दिया, "हम निश्चित रूप से उस संदेश पर ईमान रखते हैं जो उनके साथ भेजा गया है।
"
76घमंडियों ने कहा, "हम निश्चित रूप से 'जिस पर तुम ईमान लाए हो' उसका इनकार करते हैं।
"
77फिर उन्होंने ऊँटनी को मार डाला—अपने रब के आदेशों की अवज्ञा करते हुए—और चुनौती दी, "ऐ सालेह!
ले आओ हमारे पास वह जिससे तुम हमें डराते हो, अगर तुम वास्तव में एक रसूल हो।
"
78फिर उन्हें एक भीषण भूकंप ने आ पकड़ा, और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए।
79तो वह उनसे मुँह फेर कर चला गया, यह कहते हुए, "ऐ मेरी क़ौम!
मैंने तुम्हें अपने रब का पैग़ाम पहुँचा दिया था और तुम्हें 'खालिस' नसीहत दी थी, लेकिन तुम नसीहत देने वालों को पसंद नहीं करते थे।
"
وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمۡ صَٰلِحٗاۚ قَالَ يَٰقَوۡمِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنۡ إِلَٰهٍ غَيۡرُهُۥۖ قَدۡ جَآءَتۡكُم بَيِّنَةٞ مِّن رَّبِّكُمۡۖ هَٰذِهِۦ نَاقَةُ ٱللَّهِ لَكُمۡ ءَايَةٗۖ فَذَرُوهَا تَأۡكُلۡ فِيٓ أَرۡضِ ٱللَّهِۖ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٖ فَيَأۡخُذَكُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ73
وَٱذۡكُرُوٓاْ إِذۡ جَعَلَكُمۡ خُلَفَآءَ مِنۢ بَعۡدِ عَادٖ وَبَوَّأَكُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ تَتَّخِذُونَ مِن سُهُولِهَا قُصُورٗا وَتَنۡحِتُونَ ٱلۡجِبَالَ بُيُوتٗاۖ فَٱذۡكُرُوٓاْ ءَالَآءَ ٱللَّهِ وَلَا تَعۡثَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ مُفۡسِدِينَ74
قَالَ ٱلۡمَلَأُ ٱلَّذِينَ ٱسۡتَكۡبَرُواْ مِن قَوۡمِهِۦ لِلَّذِينَ ٱسۡتُضۡعِفُواْ لِمَنۡ ءَامَنَ مِنۡهُمۡ أَتَعۡلَمُونَ أَنَّ صَٰلِحٗا مُّرۡسَلٞ مِّن رَّبِّهِۦۚ قَالُوٓاْ إِنَّا بِمَآ أُرۡسِلَ بِهِۦ مُؤۡمِنُونَ75
قَالَ ٱلَّذِينَ ٱسۡتَكۡبَرُوٓاْ إِنَّا بِٱلَّذِيٓ ءَامَنتُم بِهِۦ كَٰفِرُونَ76
فَعَقَرُواْ ٱلنَّاقَةَ وَعَتَوۡاْ عَنۡ أَمۡرِ رَبِّهِمۡ وَقَالُواْ يَٰصَٰلِحُ ٱئۡتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ77
فَأَخَذَتۡهُمُ ٱلرَّجۡفَةُ فَأَصۡبَحُواْ فِي دَارِهِمۡ جَٰثِمِينَ78
فَتَوَلَّىٰ عَنۡهُمۡ وَقَالَ يَٰقَوۡمِ لَقَدۡ أَبۡلَغۡتُكُمۡ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحۡتُ لَكُمۡ وَلَٰكِن لَّا تُحِبُّونَ ٱلنَّٰصِحِينَ79
पैगंबर लूत और उनकी कौम
80और याद करो जब लूत ने अपनी कौम के पुरुषों को फटकारा, "तुम ऐसा घिनौना काम कैसे करते हो जो तुमसे पहले संसार में किसी ने नहीं किया?
"
81तुम अपनी पत्नियों को छोड़कर पुरुषों से अपनी वासना शांत करते हो!
बल्कि तुम तो हद से ज़्यादा सरकश लोग हो।
82लेकिन उसकी कौम का जवाब बस यही था कि उन्होंने कहा, "इन्हें अपनी ज़मीन से निकाल दो!
ये ऐसे लोग हैं जो पाक रहना चाहते हैं!
"
83तो हमने उसे और उसके घरवालों को बचा लिया सिवाय उसकी पत्नी के, जो बर्बाद होने वालों में से थी।
84और हमने उन पर अज़ाब बरसाया।
देखो मुजरिमों का क्या अंजाम हुआ!
وَلُوطًا إِذۡ قَالَ لِقَوۡمِهِۦٓ أَتَأۡتُونَ ٱلۡفَٰحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنۡ أَحَدٖ مِّنَ ٱلۡعَٰلَمِينَ80
إِنَّكُمۡ لَتَأۡتُونَ ٱلرِّجَالَ شَهۡوَةٗ مِّن دُونِ ٱلنِّسَآءِۚ بَلۡ أَنتُمۡ قَوۡمٞ مُّسۡرِفُونَ81
وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوۡمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓاْ أَخۡرِجُوهُم مِّن قَرۡيَتِكُمۡۖ إِنَّهُمۡ أُنَاسٞ يَتَطَهَّرُونَ82
فَأَنجَيۡنَٰهُ وَأَهۡلَهُۥٓ إِلَّا ٱمۡرَأَتَهُۥ كَانَتۡ مِنَ ٱلۡغَٰبِرِينَ83
وَأَمۡطَرۡنَا عَلَيۡهِم مَّطَرٗاۖ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُجۡرِمِينَ84
नबी शुऐब और उनकी क़ौम
85और मदयन के लोगों की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा।
उन्होंने कहा, "ऐ मेरी क़ौम!
अल्लाह की इबादत करो—तुम्हारे लिए उसके सिवा कोई और माबूद नहीं।
तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे पास एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है।
अतः पूरा नाप और तौल दो, लोगों को उनकी चीज़ों में कम न दो, और ज़मीन में सुधार के बाद उसमें फ़साद न फैलाओ।
यह तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम ईमान रखते हो।
86और हर रास्ते पर मत बैठो, लोगों को डराते हुए और अल्लाह पर ईमान लाने वालों को उसके मार्ग से रोकते हुए, और उसे टेढ़ा बनाने की कोशिश
करते हुए।
याद करो जब तुम थोड़े थे, तो उसने तुम्हें संख्या में बढ़ा दिया।
और देखो कि फ़साद फैलाने वालों का क्या अंजाम हुआ!
87अब जबकि तुम में से कुछ उस पर ईमान लाए हैं जिसके साथ मुझे भेजा गया है जबकि दूसरे इनकार करते हैं, तो प्रतीक्षा करो जब तक अल्लाह
हमारे बीच फ़ैसला न कर दे।
वह सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है।
"
88उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने धमकी दी, "ऐ शुऐब!
हम तुम्हें और तुम्हारे साथी ईमान वालों को अपनी ज़मीन से ज़रूर निकाल देंगे, जब तक तुम हमारे धर्म में वापस न आ जाओ।
" उन्होंने जवाब दिया, "क्या!
भले ही हम उससे घृणा करते हों?
"
89हम अल्लाह पर झूठ गढ़ने वाले होंगे यदि हम तुम्हारे धर्म में वापस लौटें जबकि अल्लाह ने हमें उससे बचा लिया है।
हमारे लिए उसमें वापस लौटना संभव नहीं, जब तक कि अल्लाह—हमारा रब—यह न चाहे।
हमारे रब का हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान है।
अल्लाह पर ही हमारा भरोसा है।
ऐ हमारे रब!
हमारे और हमारी क़ौम के बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दे।
तू सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है।
"
90उनकी क़ौम के काफ़िर सरदारों ने (दूसरों को) चेतावनी दी, "अगर तुम शुऐब का अनुसरण करोगे, तो यक़ीनन घाटे में रहोगे!
"
91फिर उन्हें एक भयानक भूकंप ने आ पकड़ा और वे अपने घरों में बेजान होकर गिर पड़े।
92जिन्होंने शुऐब को झुठलाया, वे ऐसे मिटा दिए गए मानो वे वहाँ कभी रहे ही न थे।
शुऐब को झुठलाने वाले ही सच्चे घाटे वाले थे।
93तो वह उनसे मुँह फेरकर बोला, "ऐ मेरी क़ौम!
मैं तुम्हें अपने रब के पैग़ाम पहुँचा चुका हूँ और तुम्हें सच्ची नसीहत दी थी।
तो मैं उन लोगों पर कैसे अफ़सोस करूँ जिन्होंने ईमान लाने से इनकार किया?
"
وَإِلَىٰ مَدۡيَنَ أَخَاهُمۡ شُعَيۡبٗاۚ قَالَ يَٰقَوۡمِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنۡ إِلَٰهٍ غَيۡرُهُۥۖ قَدۡ جَآءَتۡكُم بَيِّنَةٞ مِّن رَّبِّكُمۡۖ فَأَوۡفُواْ ٱلۡكَيۡلَ وَٱلۡمِيزَانَ وَلَا تَبۡخَسُواْ ٱلنَّاسَ أَشۡيَآءَهُمۡ وَلَا تُفۡسِدُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ بَعۡدَ إِصۡلَٰحِهَاۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ85
وَلَا تَقۡعُدُواْ بِكُلِّ صِرَٰطٖ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ مَنۡ ءَامَنَ بِهِۦ وَتَبۡغُونَهَا عِوَجٗاۚ وَٱذۡكُرُوٓاْ إِذۡ كُنتُمۡ قَلِيلٗا فَكَثَّرَكُمۡۖ وَٱنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُفۡسِدِينَ86
وَإِن كَانَ طَآئِفَةٞ مِّنكُمۡ ءَامَنُواْ بِٱلَّذِيٓ أُرۡسِلۡتُ بِهِۦ وَطَآئِفَةٞ لَّمۡ يُؤۡمِنُواْ فَٱصۡبِرُواْ حَتَّىٰ يَحۡكُمَ ٱللَّهُ بَيۡنَنَاۚ وَهُوَ خَيۡرُ ٱلۡحَٰكِمِينَ87
قَالَ ٱلۡمَلَأُ ٱلَّذِينَ ٱسۡتَكۡبَرُواْ مِن قَوۡمِهِۦ لَنُخۡرِجَنَّكَ يَٰشُعَيۡبُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَكَ مِن قَرۡيَتِنَآ أَوۡ لَتَعُودُنَّ فِي مِلَّتِنَاۚ قَالَ أَوَلَوۡ كُنَّا كَٰرِهِينَ88
قَدِ ٱفۡتَرَيۡنَا عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا إِنۡ عُدۡنَا فِي مِلَّتِكُم بَعۡدَ إِذۡ نَجَّىٰنَا ٱللَّهُ مِنۡهَاۚ وَمَا يَكُونُ لَنَآ أَن نَّعُودَ فِيهَآ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّنَاۚ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيۡءٍ عِلۡمًاۚ عَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلۡنَاۚ رَبَّنَا ٱفۡتَحۡ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَ قَوۡمِنَا بِٱلۡحَقِّ وَأَنتَ خَيۡرُ ٱلۡفَٰتِحِينَ89
وَقَالَ ٱلۡمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن قَوۡمِهِۦ لَئِنِ ٱتَّبَعۡتُمۡ شُعَيۡبًا إِنَّكُمۡ إِذٗا لَّخَٰسِرُونَ90
فَأَخَذَتۡهُمُ ٱلرَّجۡفَةُ فَأَصۡبَحُواْ فِي دَارِهِمۡ جَٰثِمِينَ91
ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ شُعَيۡبٗا كَأَن لَّمۡ يَغۡنَوۡاْ فِيهَاۚ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ شُعَيۡبٗا كَانُواْ هُمُ ٱلۡخَٰسِرِينَ92
فَتَوَلَّىٰ عَنۡهُمۡ وَقَالَ يَٰقَوۡمِ لَقَدۡ أَبۡلَغۡتُكُمۡ رِسَٰلَٰتِ رَبِّي وَنَصَحۡتُ لَكُمۡۖ فَكَيۡفَ ءَاسَىٰ عَلَىٰ قَوۡمٖ كَٰفِرِينَ93
इनकार करने वालों को इतिहास से सबक लेना चाहिए।
94जब भी हमने किसी बस्ती में कोई नबी भेजा, हमने उसके लोगों को कष्ट और कठिनाई से आज़माया, ताकि शायद वे गिड़गिड़ाएँ।
95फिर हमने उनकी तंगी को खुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे खूब फलने-फूलने लगे और कहने लगे (झूठमूठ), 'हमारे बाप-दादाओं पर भी सुख-दुख के दिन आए
थे।
' तो हमने उन्हें अचानक आ पकड़ा जब उन्हें इसका गुमान भी न था।
96अगर उन बस्तियों के लोग ईमान लाते और तक़वा इख़्तियार करते, तो हम उन पर आसमान और ज़मीन से बरकतें खोल देते।
लेकिन उन्होंने झुठलाया, तो हमने उन्हें उनके करतूतों के कारण तबाह कर दिया।
97क्या उन बस्तियों के लोग बेख़ौफ़ हो गए थे कि हमारा अज़ाब उन पर रात को नहीं आएगा जबकि वे सोए हुए होंगे?
98या क्या वे बेख़ौफ़ हो गए थे कि हमारा अज़ाब उन पर दिन में नहीं आएगा जबकि वे खेल-कूद में लगे होंगे?
99क्या वे अल्लाह की चाल से 'वास्तव में' बेखौफ थे?
अल्लाह की चाल से कोई भी बेखौफ नहीं होता सिवाय घाटा उठाने वालों के।
100क्या उन लोगों को यह बात ज़ाहिर नहीं हुई जो ज़मीन के वारिस बने उसके (पूर्ववर्ती) लोगों के विनाश के बाद कि—अगर हम चाहें—तो हम उन्हें भी उनके
गुनाहों के लिए सज़ा दे सकते हैं और उनके दिलों पर मुहर लगा दें ताकि वे 'सत्य' न सुन सकें?
101ऐ पैगंबर, हमने आपको उन बस्तियों के कुछ वृत्तांत सुनाए हैं।
उनके रसूल निश्चित रूप से उनके पास खुली निशानियों के साथ आए थे, फिर भी वे उस पर ईमान नहीं लाए जिस पर वे पहले ही इनकार कर
चुके थे।
इस प्रकार अल्लाह काफ़िरों के दिलों पर मुहर लगा देता है।
102हमने उनमें से अधिकतर को अपने अहद पूरे करते हुए नहीं पाया।
इसके बजाय, हमने उनमें से अधिकतर को वास्तव में फ़ासिक़ पाया।
وَمَآ أَرۡسَلۡنَا فِي قَرۡيَةٖ مِّن نَّبِيٍّ إِلَّآ أَخَذۡنَآ أَهۡلَهَا بِٱلۡبَأۡسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمۡ يَضَّرَّعُونَ94
ثُمَّ بَدَّلۡنَا مَكَانَ ٱلسَّيِّئَةِ ٱلۡحَسَنَةَ حَتَّىٰ عَفَواْ وَّقَالُواْ قَدۡ مَسَّ ءَابَآءَنَا ٱلضَّرَّآءُ وَٱلسَّرَّآءُ فَأَخَذۡنَٰهُم بَغۡتَةٗ وَهُمۡ لَا يَشۡعُرُونَ95
وَلَوۡ أَنَّ أَهۡلَ ٱلۡقُرَىٰٓ ءَامَنُواْ وَٱتَّقَوۡاْ لَفَتَحۡنَا عَلَيۡهِم بَرَكَٰتٖ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ وَلَٰكِن كَذَّبُواْ فَأَخَذۡنَٰهُم بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ96
أَفَأَمِنَ أَهۡلُ ٱلۡقُرَىٰٓ أَن يَأۡتِيَهُم بَأۡسُنَا بَيَٰتٗا وَهُمۡ نَآئِمُونَ97
أَوَ أَمِنَ أَهۡلُ ٱلۡقُرَىٰٓ أَن يَأۡتِيَهُم بَأۡسُنَا ضُحٗى وَهُمۡ يَلۡعَبُونَ98
أَفَأَمِنُواْ مَكۡرَ ٱللَّهِۚ فَلَا يَأۡمَنُ مَكۡرَ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلۡقَوۡمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ99
أَوَ لَمۡ يَهۡدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلۡأَرۡضَ مِنۢ بَعۡدِ أَهۡلِهَآ أَن لَّوۡ نَشَآءُ أَصَبۡنَٰهُم بِذُنُوبِهِمۡۚ وَنَطۡبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَسۡمَعُونَ100
تِلۡكَ ٱلۡقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيۡكَ مِنۡ أَنۢبَآئِهَاۚ وَلَقَدۡ جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَمَا كَانُواْ لِيُؤۡمِنُواْ بِمَا كَذَّبُواْ مِن قَبۡلُۚ كَذَٰلِكَ يَطۡبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلۡكَٰفِرِينَ101
وَمَا وَجَدۡنَا لِأَكۡثَرِهِم مِّنۡ عَهۡدٖۖ وَإِن وَجَدۡنَآ أَكۡثَرَهُمۡ لَفَٰسِقِينَ102

ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, "अगर बनी इस्राईल ने यूसुफ के समय मिस्र में आरामदायक जीवन जिया, तो मूसा के समय उन पर अत्याचार क्यों हुए?
" इसका जवाब यह हो सकता है (और अल्लाह ही बेहतर जानता है):
- •
बनी इस्राईल (या'कूब) यूसुफ और मूसा के समय के बीच लगभग 400 साल तक मिस्र में रहे।
यूसुफ के समय, मिस्र पर हिक्सोस आक्रमणकारियों का शासन था।
जैसा कि हम सूरह **12** में देखेंगे, यूसुफ को मिस्र का मुख्य मंत्री नियुक्त किया गया था, और हिक्सोस राजाओं ने उनका और उनके परिवार का अच्छी तरह
ख्याल रखा।
- •
यूसुफ के बहुत समय बाद, मिस्रवासी उन आक्रमणकारियों को निकालने में सफल रहे, और बनी इस्राईल पर अत्याचार करना शुरू कर दिया क्योंकि वे हिक्सोस के मित्र रहे
थे।
- •
इसके अलावा, जैसा कि हमने सूरह **28** में उल्लेख किया है, फिरौन ने एक सपना देखा था कि उसका शासन एक ऐसे लड़के द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा
जो बनी इस्राईल में पैदा होने वाला था।
यही कारण है कि उसने उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया, उनके बेटों को मार डाला और उनकी औरतों को जीवित रखा।
{इमाम इब्न कसीर}
पैगंबर मूसा बनाम फिरौन के जादूगर
103फिर उनके बाद हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरौन और उसके सरदारों के पास भेजा, लेकिन उन्होंने उन्हें ठुकरा कर अन्याय किया।
देखो, बिगाड़ने वालों का क्या अंजाम हुआ!
104मूसा ने घोषणा की, "ऐ फ़िरौन!
मैं वास्तव में सारे जहानों के रब की ओर से एक रसूल हूँ।
"
105अल्लाह के विषय में सत्य के अतिरिक्त कुछ न कहना मेरा कर्तव्य है।
मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ, अतः बनी इस्राईल को मेरे साथ जाने दो।
106फ़िरौन ने माँग की, "यदि तुम कोई निशानी लेकर आए हो, तो हमें दिखाओ यदि तुम्हारी बात सच है।
"
107तो मूसा ने अपनी लाठी फेंकी और—देखो!
—वह एक असली साँप बन गई।
108फिर उसने अपना हाथ अपने गिरेबान से निकाला तो वह देखने वालों के लिए चमकता हुआ सफेद था।
109फ़िरऔन की क़ौम के सरदारों ने कहा, "यह तो यक़ीनन एक माहिर जादूगर है,
110जो तुम सबको तुम्हारी ज़मीन से निकालना चाहता है।
" तो फ़िरऔन ने पूछा, "तुम्हारी क्या राय है?
"
111उन्होंने जवाब दिया, "उसे और उसके भाई को रोक रखो, और सभी शहरों में अपने आदमी भेजो,
112ताकि वे तुम्हारे पास हर माहिर जादूगर को ले आएँ।
"
113फिर जादूगर फ़िरौन के पास आए, कहने लगे, "क्या हमें एक 'मुनासिब' इनाम मिलेगा अगर हम जीते?
"
114उसने जवाब दिया, "हाँ, और तुम तो मेरे बहुत क़रीबियों में से हो जाओगे।
"
115उन्होंने पूछा, "ऐ मूसा!
क्या तुम डालोगे, या हम पहले डालने वाले हों?
"
116मूसा ने कहा, "तुम पहले।
" तो जब उन्होंने डाला, तो उन्होंने लोगों की आँखों पर जादू कर दिया, उन्हें भयभीत कर दिया, और एक बड़ा जादू कर दिखाया।
117फिर हमने मूसा पर वह्यी की कि "अपनी लाठी डालो।
" तो क्या देखते हैं कि वह उनके बनाए हुए को निगले जा रही थी!
118तो सत्य की विजय हुई, और उनका भ्रम विफल रहा।
119और इस प्रकार फ़िरऔन और उसके लोग वहीं पराजित हुए और अपमानित हुए,
120तब जादूगर सजदे में गिर पड़े।
121उन्होंने घोषणा की, "हम अब सारे जहानों के रब पर ईमान लाए हैं,
122मूसा और हारून के रब पर।
"
123फ़िरौन ने धमकी दी, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुमने मेरी अनुमति के बिना उस पर ईमान ले आए?
यह अवश्य ही कोई साज़िश है जो तुमने शहर में रची है ताकि इसके निवासियों को बाहर निकालो, लेकिन जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा।
"
124"मैं निश्चित रूप से तुम्हारे हाथ और पैर एक-दूसरे के विपरीत दिशा से काट डालूँगा, फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा।
"
125उन्होंने जवाब दिया, "हम अपने रब की ओर लौट रहे हैं।
126तुम हम पर सिर्फ़ इसलिए नाराज़ हो कि जब हमारे पास हमारे रब की निशानियाँ आईं तो हमने उन पर ईमान ले आए।
ऐ हमारे रब!
हम पर धैर्य उंडेल दे, और हमें इस हाल में मौत दे कि हम 'तेरे' आज्ञाकारी हों।
"
ثُمَّ بَعَثۡنَا مِنۢ بَعۡدِهِم مُّوسَىٰ بَِٔايَٰتِنَآ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِيْهِۦ فَظَلَمُواْ بِهَاۖ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُفۡسِدِينَ103
وَقَالَ مُوسَىٰ يَٰفِرۡعَوۡنُ إِنِّي رَسُولٞ مِّن رَّبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ104
حَقِيقٌ عَلَىٰٓ أَن لَّآ أَقُولَ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلۡحَقَّۚ قَدۡ جِئۡتُكُم بِبَيِّنَةٖ مِّن رَّبِّكُمۡ فَأَرۡسِلۡ مَعِيَ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ105
قَالَ إِن كُنتَ جِئۡتَ بَِٔايَةٖ فَأۡتِ بِهَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ106
فَأَلۡقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ ثُعۡبَانٞ مُّبِينٞ107
وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِيَ بَيۡضَآءُ لِلنَّٰظِرِينَ108
قَالَ ٱلۡمَلَأُ مِن قَوۡمِ فِرۡعَوۡنَ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرٌ عَلِيمٞ109
يُرِيدُ أَن يُخۡرِجَكُم مِّنۡ أَرۡضِكُمۡۖ فَمَاذَا تَأۡمُرُونَ110
قَالُوٓاْ أَرۡجِهۡ وَأَخَاهُ وَأَرۡسِلۡ فِي ٱلۡمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ111
يَأۡتُوكَ بِكُلِّ سَٰحِرٍ عَلِيم112
وَجَآءَ ٱلسَّحَرَةُ فِرۡعَوۡنَ قَالُوٓاْ إِنَّ لَنَا لَأَجۡرًا إِن كُنَّا نَحۡنُ ٱلۡغَٰلِبِينَ113
قَالَ نَعَمۡ وَإِنَّكُمۡ لَمِنَ ٱلۡمُقَرَّبِينَ114
قَالُواْ يَٰمُوسَىٰٓ إِمَّآ أَن تُلۡقِيَ وَإِمَّآ أَن نَّكُونَ نَحۡنُ ٱلۡمُلۡقِينَ115
قَالَ أَلۡقُواْۖ فَلَمَّآ أَلۡقَوۡاْ سَحَرُوٓاْ أَعۡيُنَ ٱلنَّاسِ وَٱسۡتَرۡهَبُوهُمۡ وَجَآءُو بِسِحۡرٍ عَظِيم116
وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنۡ أَلۡقِ عَصَاكَۖ فَإِذَا هِيَ تَلۡقَفُ مَا يَأۡفِكُونَ117
فَوَقَعَ ٱلۡحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ118
فَغُلِبُواْ هُنَالِكَ وَٱنقَلَبُواْ صَٰغِرِينَ119
وَأُلۡقِيَ ٱلسَّحَرَةُ سَٰجِدِينَ120
قَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ121
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ122
قَالَ فِرۡعَوۡنُ ءَامَنتُم بِهِۦ قَبۡلَ أَنۡ ءَاذَنَ لَكُمۡۖ إِنَّ هَٰذَا لَمَكۡرٞ مَّكَرۡتُمُوهُ فِي ٱلۡمَدِينَةِ لِتُخۡرِجُواْ مِنۡهَآ أَهۡلَهَاۖ فَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَ123
لَأُقَطِّعَنَّ أَيۡدِيَكُمۡ وَأَرۡجُلَكُم مِّنۡ خِلَٰفٖ ثُمَّ لَأُصَلِّبَنَّكُمۡ أَجۡمَعِينَ124
قَالُوٓاْ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ125
وَمَا تَنقِمُ مِنَّآ إِلَّآ أَنۡ ءَامَنَّا بَِٔايَٰتِ رَبِّنَا لَمَّا جَآءَتۡنَاۚ رَبَّنَآ أَفۡرِغۡ عَلَيۡنَا صَبۡرٗا وَتَوَفَّنَا مُسۡلِمِينَ126

फ़िरौन के ज़ुल्म के लिए मिस्र को सज़ा
127फ़िरौन की क़ौम के सरदारों ने एतराज़ किया, "क्या आप मूसा और उसकी क़ौम को ज़मीन में फ़साद फैलाने दोगे और आपको और आपके देवताओं को छोड़ देने
दोगे?
" उसने जवाब दिया, "हम उनके बेटों को क़त्ल करेंगे और उनकी औरतों को ज़िंदा रखेंगे।
हम उन्हें पूरी तरह अपने क़ाबू में रखेंगे।
"
128मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "अल्लाह से मदद मांगो और सब्र करो।
यक़ीनन ज़मीन अल्लाह ही की है।
वह इसे अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अता करता है।
आख़िरकार नेक लोग ही कामयाब होंगे।
"
129उन्होंने शिकायत की, "हमें हमेशा सताया गया है—आपके आने से पहले भी और आपके आने के बाद भी।
" उसने जवाब दिया, "शायद तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मन को हलाक कर दे और तुम्हें ज़मीन का वारिस बना दे ताकि देखे कि तुम क्या करते हो।
"
130और यक़ीनन, हमने फ़िरौन की क़ौम को सूखे और फ़सलों की कमी से सज़ा दी ताकि वे होश में आ जाएँ।
131जब उन्हें कोई भलाई मिलती, तो वे कहते, "यह हमारा हक़ है।
" लेकिन जब उन्हें कोई बुराई पहुँचती, तो वे उसका इल्ज़ाम मूसा और उसके साथियों पर लगाते।
यह सब अल्लाह की तरफ़ से है, लेकिन उनमें से ज़्यादातर नहीं जानते थे।
132उन्होंने कहा, "हम तुम पर कभी ईमान नहीं लाएँगे, चाहे तुम हमें बहकाने के लिए कोई भी निशानी ले आओ।
"
133तो हमने उन पर बाढ़, टिड्डियाँ, जूँ, मेंढक और रक्त (खून) एक के बाद एक निशानी के रूप में भेजे।
फिर भी वे घमंड करते रहे और एक अपराधी क़ौम थे।
134जब भी उन पर कोई आफ़त आती, वे कहते, "ऐ मूसा!
हमारे लिए अपने रब से दुआ करो, उस प्रतिज्ञा के कारण जो उसने तुमसे की है।
यदि तुम हमसे यह आफ़त दूर कर दो, तो हम अवश्य तुम पर ईमान लाएँगे और बनी इसराईल को तुम्हारे साथ जाने देंगे।
"
135लेकिन जैसे ही हमने उनसे उनकी आफ़त दूर की—जब तक कि वे अपनी निश्चित अवधि तक न पहुँचे—उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी।
136तो हमने उन्हें दंडित किया, उन्हें समुद्र में डुबोकर, क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे बेपरवाह रहे।
137और हमने उन लोगों को, जिन्हें कमज़ोर समझा गया था, ज़मीन के पूरब और पश्चिम का वारिस बनाया, जिसमें हमने बरकत रखी थी।
और यूँ तुम्हारे रब का नेक वादा बनी इस्राईल से पूरा हुआ, इस वजह से कि उन्होंने सब्र किया था।
और हमने फ़िरऔन और उसकी क़ौम के बनाए हुए और उनके तामीर किए हुए को तबाह कर दिया।
وَقَالَ ٱلۡمَلَأُ مِن قَوۡمِ فِرۡعَوۡنَ أَتَذَرُ مُوسَىٰ وَقَوۡمَهُۥ لِيُفۡسِدُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَيَذَرَكَ وَءَالِهَتَكَۚ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبۡنَآءَهُمۡ وَنَسۡتَحۡيِۦ نِسَآءَهُمۡ وَإِنَّا فَوۡقَهُمۡ قَٰهِرُونَ127
قَالَ مُوسَىٰ لِقَوۡمِهِ ٱسۡتَعِينُواْ بِٱللَّهِ وَٱصۡبِرُوٓاْۖ إِنَّ ٱلۡأَرۡضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦۖ وَٱلۡعَٰقِبَةُ لِلۡمُتَّقِينَ128
قَالُوٓاْ أُوذِينَا مِن قَبۡلِ أَن تَأۡتِيَنَا وَمِنۢ بَعۡدِ مَا جِئۡتَنَاۚ قَالَ عَسَىٰ رَبُّكُمۡ أَن يُهۡلِكَ عَدُوَّكُمۡ وَيَسۡتَخۡلِفَكُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَيَنظُرَ كَيۡفَ تَعۡمَلُونَ129
وَلَقَدۡ أَخَذۡنَآ ءَالَ فِرۡعَوۡنَ بِٱلسِّنِينَ وَنَقۡصٖ مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمۡ يَذَّكَّرُونَ130
فَإِذَا جَآءَتۡهُمُ ٱلۡحَسَنَةُ قَالُواْ لَنَا هَٰذِهِۦۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةٞ يَطَّيَّرُواْ بِمُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓۗ أَلَآ إِنَّمَا طَٰٓئِرُهُمۡ عِندَ ٱللَّهِ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ131
وَقَالُواْ مَهۡمَا تَأۡتِنَا بِهِۦ مِنۡ ءَايَةٖ لِّتَسۡحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحۡنُ لَكَ بِمُؤۡمِنِينَ132
فَأَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمُ ٱلطُّوفَانَ وَٱلۡجَرَادَ وَٱلۡقُمَّلَ وَٱلضَّفَادِعَ وَٱلدَّمَ ءَايَٰتٖ مُّفَصَّلَٰتٖ فَٱسۡتَكۡبَرُواْ وَكَانُواْ قَوۡمٗا مُّجۡرِمِينَ133
وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيۡهِمُ ٱلرِّجۡزُ قَالُواْ يَٰمُوسَى ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَۖ لَئِن كَشَفۡتَ عَنَّا ٱلرِّجۡزَ لَنُؤۡمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرۡسِلَنَّ مَعَكَ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ134
فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُمُ ٱلرِّجۡزَ إِلَىٰٓ أَجَلٍ هُم بَٰلِغُوهُ إِذَا هُمۡ يَنكُثُونَ135
فَٱنتَقَمۡنَا مِنۡهُمۡ فَأَغۡرَقۡنَٰهُمۡ فِي ٱلۡيَمِّ بِأَنَّهُمۡ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَا وَكَانُواْ عَنۡهَا غَٰفِلِينَ136
وَأَوۡرَثۡنَا ٱلۡقَوۡمَ ٱلَّذِينَ كَانُواْ يُسۡتَضۡعَفُونَ مَشَٰرِقَ ٱلۡأَرۡضِ وَمَغَٰرِبَهَا ٱلَّتِي بَٰرَكۡنَا فِيهَاۖ وَتَمَّتۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ ٱلۡحُسۡنَىٰ عَلَىٰ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ بِمَا صَبَرُواْۖ وَدَمَّرۡنَا مَا كَانَ يَصۡنَعُ فِرۡعَوۡنُ وَقَوۡمُهُۥ وَمَا كَانُواْ يَعۡرِشُونَ137
मूसा की क़ौम की बुत की माँग
138हमने बनी इस्राईल को समुद्र पार कराया, और वे ऐसे लोगों के पास पहुँचे जो मूर्तियों की पूजा कर रहे थे।
उन्होंने माँग की, "ऐ मूसा!
हमारे लिए भी एक देवता बना दे जैसा इनके देवता हैं।
" उसने जवाब दिया, "क्या!
तुम तो सचमुच एक जाहिल कौम हो!
"
139जो कुछ ये अनुसरण करते हैं वह बिखर जाएगा, और जो कुछ ये करते हैं वह व्यर्थ हो जाएगा।
"
140उसने आगे कहा, "मैं तुम्हारे लिए अल्लाह के सिवा कोई और देवता कैसे तलाश करूँ, जबकि उसने तुम्हें सारे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की है?
"
141और 'याद करो' जब हमने तुम्हें फ़िरऔन की कौम से बचाया था, जो तुम्हें एक भयानक अज़ाब दे रहे थे—तुम्हारे बेटों को क़त्ल कर रहे थे और तुम्हारी
औरतों को जीवित छोड़ रहे थे।
वह तुम्हारे रब की ओर से एक बड़ी आज़माइश थी।
وَجَٰوَزۡنَا بِبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٱلۡبَحۡرَ فَأَتَوۡاْ عَلَىٰ قَوۡمٖ يَعۡكُفُونَ عَلَىٰٓ أَصۡنَامٖ لَّهُمۡۚ قَالُواْ يَٰمُوسَى ٱجۡعَل لَّنَآ إِلَٰهٗا كَمَا لَهُمۡ ءَالِهَةٞۚ قَالَ إِنَّكُمۡ قَوۡمٞ تَجۡهَلُونَ138
إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ مُتَبَّرٞ مَّا هُمۡ فِيهِ وَبَٰطِلٞ مَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ139
قَالَ أَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡغِيكُمۡ إِلَٰهٗا وَهُوَ فَضَّلَكُمۡ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ140
وَإِذۡ أَنجَيۡنَٰكُم مِّنۡ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ يَسُومُونَكُمۡ سُوٓءَ ٱلۡعَذَابِ يُقَتِّلُونَ أَبۡنَآءَكُمۡ وَيَسۡتَحۡيُونَ نِسَآءَكُمۡۚ وَفِي ذَٰلِكُم بَلَآءٞ مِّن رَّبِّكُمۡ عَظِيمٞ141
मूसा अलैहिस्सलाम की अल्लाह से मुलाक़ात
142हमने मूसा के लिए तीस रातों का वादा किया, फिर दस और जोड़कर उसके रब की चालीस रातों की अवधि पूरी की।
इससे पहले मूसा ने अपने भाई हारून से कहा, "मेरी क़ौम में मेरा स्थान लो, सुधार करो, और फ़सादियों के रास्ते पर मत चलो।
"
143जब मूसा हमारे निर्धारित समय पर आया और उसके रब ने उससे बात की, तो उसने कहा, "मेरे रब!
मुझे दिखा दे ताकि मैं तुझे देख सकूँ।
" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे हरगिज़ नहीं देख सकते!
लेकिन उस पहाड़ की ओर देखो: अगर वह अपनी जगह पर क़ायम रहा, तो तुम मुझे देख पाओगे।
" जब उसके रब ने पहाड़ पर अपनी ज्योति प्रकट की, तो वह चूर-चूर हो गया और मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा।
जब उसे होश आया, तो वह पुकार उठा, "तू पाक है!
मैं तेरी ओर तौबा करता हूँ, और मैं ईमान लाने वालों में सबसे पहला हूँ।
"
144अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा!
मैंने तुम्हें लोगों पर अपनी रिसालत और अपनी बातचीत से पहले ही सम्मानित किया है।
तो जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है उसे मज़बूती से थाम लो और शुक्रगुज़ार बनो।
"
145हमने उसके लिए तख़्तियों पर हर चीज़ का स्पष्टीकरण और हर चीज़ की तफ़सील लिखी।
हमने फ़रमाया, "इसे मज़बूती से थाम लो, और अपनी क़ौम से कहो कि वे इसकी बेहतरीन शिक्षाओं का पालन करें।
मैं तुम्हें उन सरकशों का अंजाम दिखाऊँगा।
"
146मैं अपनी आयतों से उन लोगों को फेर दूँगा जो ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर करते हैं।
और अगर वे हर निशानी भी देख लें, तो भी वे उन पर ईमान नहीं लाएँगे।
अगर वे हिदायत का रास्ता देखें, तो उसे नहीं अपनाते।
लेकिन अगर वे गुमराह का रास्ता देखें, तो उसे अपना लेते हैं।
यह इसलिए है क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे।
147जो हमारी आयतों को और आख़िरत में अल्लाह से मुलाक़ात को झुठलाते हैं, उनके आमाल ज़ाया हो जाएँगे।
क्या यह उनके किए का बदला नहीं है?
۞ وَوَٰعَدۡنَا مُوسَىٰ ثَلَٰثِينَ لَيۡلَةٗ وَأَتۡمَمۡنَٰهَا بِعَشۡرٖ فَتَمَّ مِيقَٰتُ رَبِّهِۦٓ أَرۡبَعِينَ لَيۡلَةٗۚ وَقَالَ مُوسَىٰ لِأَخِيهِ هَٰرُونَ ٱخۡلُفۡنِي فِي قَوۡمِي وَأَصۡلِحۡ وَلَا تَتَّبِعۡ سَبِيلَ ٱلۡمُفۡسِدِينَ142
وَلَمَّا جَآءَ مُوسَىٰ لِمِيقَٰتِنَا وَكَلَّمَهُۥ رَبُّهُۥ قَالَ رَبِّ أَرِنِيٓ أَنظُرۡ إِلَيۡكَۚ قَالَ لَن تَرَىٰنِي وَلَٰكِنِ ٱنظُرۡ إِلَى ٱلۡجَبَلِ فَإِنِ ٱسۡتَقَرَّ مَكَانَهُۥ فَسَوۡفَ تَرَىٰنِيۚ فَلَمَّا تَجَلَّىٰ رَبُّهُۥ لِلۡجَبَلِ جَعَلَهُۥ دَكّٗا وَخَرَّ مُوسَىٰ صَعِقٗاۚ فَلَمَّآ أَفَاقَ قَالَ سُبۡحَٰنَكَ تُبۡتُ إِلَيۡكَ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ143
قَالَ يَٰمُوسَىٰٓ إِنِّي ٱصۡطَفَيۡتُكَ عَلَى ٱلنَّاسِ بِرِسَٰلَٰتِي وَبِكَلَٰمِي فَخُذۡ مَآ ءَاتَيۡتُكَ وَكُن مِّنَ ٱلشَّٰكِرِينَ144
وَكَتَبۡنَا لَهُۥ فِي ٱلۡأَلۡوَاحِ مِن كُلِّ شَيۡءٖ مَّوۡعِظَةٗ وَتَفۡصِيلٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ فَخُذۡهَا بِقُوَّةٖ وَأۡمُرۡ قَوۡمَكَ يَأۡخُذُواْ بِأَحۡسَنِهَاۚ سَأُوْرِيكُمۡ دَارَ ٱلۡفَٰسِقِينَ145
سَأَصۡرِفُ عَنۡ ءَايَٰتِيَ ٱلَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّ وَإِن يَرَوۡاْ كُلَّ ءَايَةٖ لَّا يُؤۡمِنُواْ بِهَا وَإِن يَرَوۡاْ سَبِيلَ ٱلرُّشۡدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلٗا وَإِن يَرَوۡاْ سَبِيلَ ٱلۡغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلٗاۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَا وَكَانُواْ عَنۡهَا غَٰفِلِينَ146
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بَِٔايَٰتِنَا وَلِقَآءِ ٱلۡأٓخِرَةِ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡۚ هَلۡ يُجۡزَوۡنَ إِلَّا مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ147


ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, 'मूसा के लोगों ने सोने के बछड़े की पूजा क्यों की?
' बनी इस्राईल लगभग 4 सदियों तक मिस्र में रहते थे।
उनमें से कुछ फिरौन के लोगों की बुरी प्रथाओं से प्रभावित थे, जिसमें मूर्ति-पूजा भी शामिल थी।
चूंकि मूसा के लोगों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता था, कुछ ने अपने मिस्री आकाओं के देवताओं की पूजा करनी शुरू कर दी।
यही कारण है कि जैसे ही अल्लाह ने उन्हें मिस्र से बचाया, उन्होंने मूसा से उनके लिए एक मूर्ति बनाने को कहा।
आयतों 138-140 के अनुसार, उन्होंने एक मूर्ति की मांग की जब वे कुछ लोगों के पास से गुज़रे जो गायों के आकार की मूर्तियों की पूजा कर रहे
थे।
बाद में, सामिरी ने मूसा की अनुपस्थिति का फायदा उठाया और उनके लिए एक सोने का बछड़ा बनाया, जिसे उन्होंने पूजा की वस्तु के रूप में स्वीकार किया।
(इमाम इब्न 'अशूर) 22 सामिरी मूसा के लोगों में से एक गुमराह व्यक्ति था (20:83-97)।

ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, 'हमें सूरह 4 में बताया गया था कि कुरान सुसंगत है।
हारून ने आयत 7:150 में जो जवाब दिया, वह 20:94 में दिए गए जवाब से अलग कैसे है?
' जैसा कि इस सूरह में पहले बताया गया है, किसी विशेष विषय (उदाहरण के लिए, मूसा का जीवन या जन्नत के सुख) की पूरी तस्वीर पाने के
लिए, हमें उस विषय से संबंधित सभी विवरणों को विभिन्न सूरहों में पढ़ना होगा।
इमाम इब्न आशूर के अनुसार, हारून ने कुल 2 कारण बताए कि उन्होंने अपने लोगों को बछड़े की पूजा बंद करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया: 1.
उन्हें डर था कि लोग उन्हें मार डालेंगे (7:150)।
2.
उन्हें डर था कि यदि उन्हें मार दिया गया तो लोग आपस में बंट जाएंगे और लड़ेंगे (20:94)।
तो, जानकारी के ये दोनों अंश वास्तव में एक-दूसरे को पूरा करते हैं, और एक ही बात पर आकर टिकते हैं: अपने लोगों के बीच एकता बनाए रखने
की उनकी इच्छा।
सुनहरे बछड़े की परीक्षा
148मूसा की अनुपस्थिति में, उसकी कौम ने अपने सोने के आभूषणों से एक बछड़े जैसी दिखने और आवाज़ करने वाली मूर्ति बनाई।
क्या उन्होंने नहीं देखा कि वह उनसे बात नहीं कर सकती थी और न ही किसी तरह उनका मार्गदर्शन कर सकती थी?
फिर भी, उन्होंने उसे एक ईश्वर मान लिया, बहुत बड़ा अन्याय किया।
149बाद में, जब वे पछतावे से भर गए और महसूस किया कि वे भटक गए थे, तो वे रो पड़े, 'यदि हमारा रब हम पर दया नहीं करेगा
और हमें क्षमा नहीं करेगा, तो हम निश्चित रूप से नुकसान उठाने वालों में से होंगे।
'
150पहले, जब मूसा अपनी कौम के पास अत्यंत क्रोधित और निराश होकर वापस आया, तो उसने कहा, 'तुमने मेरी अनुपस्थिति में यह क्या बुरा काम किया!
क्या तुम अपने रब के अज़ाब के लिए इतने उतावले थे?
' फिर उसने तख्तियाँ फेंक दीं और अपने भाई को बालों से पकड़कर अपनी ओर खींचा।
हारून ने जवाब दिया, 'हे मेरी माँ के बेटे!
इन लोगों ने मुझे घेर लिया था और मुझे मारने ही वाले थे।
तो मेरे शत्रुओं को प्रसन्न होने का अवसर मत दो, और मुझे उन ज़ालिमों में शामिल मत करो।
'
151मूसा ने दुआ की, 'मेरे रब!
मुझे और मेरे भाई को बख़्श दे, और हमें अपनी रहमत में दाख़िल कर।
तू सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।
'
152जिन्होंने 'सोने के' बछड़े की पूजा की, वे अपने रब के ग़ज़ब का शिकार होंगे और इस दुनिया में रुसवाई का भी।
हम इसी तरह उन लोगों को बदला देते हैं जो मनगढ़ंत बातें बनाते हैं।
153जो लोग बुराई करते हैं, फिर उसके बाद तौबा करते हैं और ईमान लाते हैं, तो निश्चय ही तुम्हारा रब (पालनहार) बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान है।
وَٱتَّخَذَ قَوۡمُ مُوسَىٰ مِنۢ بَعۡدِهِۦ مِنۡ حُلِيِّهِمۡ عِجۡلٗا جَسَدٗا لَّهُۥ خُوَارٌۚ أَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّهُۥ لَا يُكَلِّمُهُمۡ وَلَا يَهۡدِيهِمۡ سَبِيلًاۘ ٱتَّخَذُوهُ وَكَانُواْ ظَٰلِمِينَ148
وَلَمَّا سُقِطَ فِيٓ أَيۡدِيهِمۡ وَرَأَوۡاْ أَنَّهُمۡ قَدۡ ضَلُّواْ قَالُواْ لَئِن لَّمۡ يَرۡحَمۡنَا رَبُّنَا وَيَغۡفِرۡ لَنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ149
وَلَمَّا رَجَعَ مُوسَىٰٓ إِلَىٰ قَوۡمِهِۦ غَضۡبَٰنَ أَسِفٗا قَالَ بِئۡسَمَا خَلَفۡتُمُونِي مِنۢ بَعۡدِيٓۖ أَعَجِلۡتُمۡ أَمۡرَ رَبِّكُمۡۖ وَأَلۡقَى ٱلۡأَلۡوَاحَ وَأَخَذَ بِرَأۡسِ أَخِيهِ يَجُرُّهُۥٓ إِلَيۡهِۚ قَالَ ٱبۡنَ أُمَّ إِنَّ ٱلۡقَوۡمَ ٱسۡتَضۡعَفُونِي وَكَادُواْ يَقۡتُلُونَنِي فَلَا تُشۡمِتۡ بِيَ ٱلۡأَعۡدَآءَ وَلَا تَجۡعَلۡنِي مَعَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلظَّٰلِمِينَ150
قَالَ رَبِّ ٱغۡفِرۡ لِي وَلِأَخِي وَأَدۡخِلۡنَا فِي رَحۡمَتِكَۖ وَأَنتَ أَرۡحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ151
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ ٱلۡعِجۡلَ سَيَنَالُهُمۡ غَضَبٞ مِّن رَّبِّهِمۡ وَذِلَّةٞ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَكَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡمُفۡتَرِينَ152
وَٱلَّذِينَ عَمِلُواْ ٱلسَّئَِّاتِ ثُمَّ تَابُواْ مِنۢ بَعۡدِهَا وَءَامَنُوٓاْ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعۡدِهَا لَغَفُورٞ رَّحِيمٞ153

ज्ञान की बातें
- •
निम्नलिखित परिच्छेद उस पैगंबर के बारे में बात करता है जो पूरे विश्व के लिए रहमत बनकर आए।
यहूदियों और ईसाइयों को अंतिम पैगंबर के रूप में उन पर विश्वास करने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
भले ही उनकी किताबें सदियों से विकृत हो गई हैं, फिर भी वे उन किताबों में उनके कुछ संदर्भ पा सकते हैं।
- •
मुस्लिम विद्वान इन संदर्भों के उदाहरण के रूप में बाइबिल से अंश उद्धृत करते हैं (जिसमें व्यवस्थाविवरण 18:15-18 और 33:2, यशायाह 42, और यूहन्ना 14:16 शामिल हैं)।
हालांकि, बाइबिल के विद्वान इन अंशों की अलग तरह से व्याख्या करते हैं।
- •
इमाम अल-कुर्तुबी के अनुसार, यहूदियों के पास कई कठोर नियम और प्रथाएँ थीं।
उदाहरण के लिए, उन्हें सब्त (शनिवार) पर काम करने की अनुमति नहीं थी, उनके कई अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान था (जिसमें सब्त का उल्लंघन और अनजाने
में हत्या शामिल है), कुछ अच्छे खाद्य पदार्थ उनके लिए वर्जित थे, और उनके पापियों के लिए अल्लाह की क्षमा प्राप्त करना अत्यंत कठिन था।
आयत 157 के अनुसार, पैगंबर उनके लिए चीज़ों को आसान बनाने और उन्हें उन बोझों से मुक्त करने के लिए आए।

ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, 'क्या यह बेहतर नहीं होता अगर पैगंबर पढ़े-लिखे होते?
' सूरह 29:48 के अनुसार, पैगंबर उम्मी थे (पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे)।
अगर वे पढ़े-लिखे होते, तो मूर्ति-पूजक कहते, 'उन्होंने यह कुरान अन्य आसमानी किताबों से नक़ल किया होगा।
' इसके अलावा, जब आज के कुछ इनकार करने वाले पैगंबर द्वारा बताए गए कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को पढ़ते हैं, तो वे तर्क देते, 'उन्होंने शायद इसे कहीं
पढ़ा होगा' जबकि उस समय वे तथ्य ज्ञात नहीं थे।
- •
उदाहरण के लिए,

ज्ञान की बातें
- •
कोई पूछ सकता है, 'यदि आपकी बात सच है, तो पैगंबर ने कुछ लोगों को ऊँट का मूत्र पीने के लिए क्यों कहा?
' इस सवाल का जवाब देने के लिए, आइए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करें: पैगंबर ने उन लोगों को इसे कॉफी की तरह पीने के लिए नहीं कहा
था।
वे पेट की बीमारी से बीमार पड़ गए थे, और उन्होंने उन्हें उपचार के लिए विशिष्ट ऊँटों (जो कुछ खास पौधे खाते थे) का दूध और मूत्र पीने
के लिए कहा, और वे बीमार लोग वास्तव में ठीक हो गए।
(इमाम अल-बुखारी और इमाम मुस्लिम)
- •
कॉफी की बात करें तो, आपके लिए एक दिलचस्प तथ्य यह है।
दुनिया की 2 सबसे महंगी किस्में हैं: 1) ब्लैक आइवरी कॉफी (2,500 डॉलर प्रति किलोग्राम), जो थाईलैंड में हाथियों द्वारा पचाई गई फलियों से उनके गोबर से चुनकर
बनाई जाती है।
2) कोपी लुवाक कॉफी (1,300 डॉलर प्रति किलोग्राम), जो इंडोनेशिया में सिवेट बिल्लियों द्वारा पचाई गई फलियों से बनाई जाती है।
(सीईओ मैगज़ीन: https://bit.
ly/3WWE5S8)।
- •
कुछ जानवरों के मूत्र का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवा के रूप में उपयोग किया गया है।
उदाहरण के लिए, पीएमयू नामक एक दवा गर्भवती घोड़ियों के मूत्र से बनाई जाती है और इसका उत्पादन फाइजर (न्यूयॉर्क, यूएसए) द्वारा किया जाता है, जो दुनिया की
सबसे बड़ी दवा कंपनियों में से एक है।

ईमान की परीक्षा
154जब मूसा का क्रोध शांत हुआ, तो उसने तख़्तियाँ उठाईं, जिनमें उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दया थी जो अपने रब का आदर करते हैं।
155मूसा ने अपनी क़ौम में से सत्तर आदमियों को हमारी नियुक्ति के लिए चुना।
बाद में, जब वे एक भूकंप से हिल गए, तो वह चिल्लाया, "मेरे रब!
यदि तू चाहता, तो तू उन्हें बहुत पहले ही नष्ट कर सकता था, और मुझे भी।
क्या तू हमें उसके लिए नष्ट करेगा जो हम में से मूर्खों ने किया है?
यह तो तेरी ओर से केवल एक परीक्षा है—जिसके द्वारा तू जिसे चाहता है भटकने देता है और जिसे चाहता है मार्गदर्शन देता है।
तू हमारा संरक्षक है।
तो हमें क्षमा कर और हम पर दया कर।
तू क्षमा करने वालों में सबसे उत्तम है।
156हमें इस दुनिया और आख़िरत में भलाई अता कर।
हम सचमुच तेरी ओर लौट आए हैं।
" अल्लाह ने उत्तर दिया, "जहाँ तक मेरी सज़ा का सवाल है, मैं उसे जिस पर चाहता हूँ, उस पर उतारता हूँ।
लेकिन मेरी दया हर चीज़ को घेरे हुए है।
मैं यह 'दया' उन लोगों को दूँगा जो बुराई से बचते हैं, ज़कात देते हैं, और हमारी आयतों पर विश्वास करते हैं।
157वे वे लोग हैं जो रसूल का अनुसरण करते हैं—वह नबी जो पढ़ या लिख नहीं सकता—वह जिसे वे अपनी तौरात और इंजील में वर्णित पाते हैं।
वह उन्हें सही काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है और उन्हें गलत काम करने से रोकता है, उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल करता है और उनके
लिए बुरी चीज़ों को हराम करता है, और उन्हें उनके कठोर नियमों और प्रथाओं से राहत देता है।
केवल वे लोग जो उस पर विश्वास करते हैं, उसका आदर करते हैं और उसका समर्थन करते हैं, और उस पर उतारे गए प्रकाश का अनुसरण करते हैं,
वे ही सफल होंगे।
158कहो, ऐ पैगंबर, 'ऐ इंसानों!
मैं तुम सभी के लिए अल्लाह की ओर से एक रसूल के रूप में भेजा गया हूँ—वह जो आकाशों और पृथ्वी के राज्य का मालिक है।
उसके सिवा कोई पूज्य नहीं।
वह जीवन देता है और मृत्यु देता है।
' तो अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करो—वह नबी जो पढ़ या लिख नहीं सकता—वह जो अल्लाह और उसकी आयतों पर विश्वास करता है।
और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम सही मार्गदर्शन पा सको।
وَلَمَّا سَكَتَ عَن مُّوسَى ٱلۡغَضَبُ أَخَذَ ٱلۡأَلۡوَاحَۖ وَفِي نُسۡخَتِهَا هُدٗى وَرَحۡمَةٞ لِّلَّذِينَ هُمۡ لِرَبِّهِمۡ يَرۡهَبُونَ154
وَٱخۡتَارَ مُوسَىٰ قَوۡمَهُۥ سَبۡعِينَ رَجُلٗا لِّمِيقَٰتِنَاۖ فَلَمَّآ أَخَذَتۡهُمُ ٱلرَّجۡفَةُ قَالَ رَبِّ لَوۡ شِئۡتَ أَهۡلَكۡتَهُم مِّن قَبۡلُ وَإِيَّٰيَۖ أَتُهۡلِكُنَا بِمَا فَعَلَ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَّآۖ إِنۡ هِيَ إِلَّا فِتۡنَتُكَ تُضِلُّ بِهَا مَن تَشَآءُ وَتَهۡدِي مَن تَشَآءُۖ أَنتَ وَلِيُّنَا فَٱغۡفِرۡ لَنَا وَٱرۡحَمۡنَاۖ وَأَنتَ خَيۡرُ ٱلۡغَٰفِرِينَ155
وَٱكۡتُبۡ لَنَا فِي هَٰذِهِ ٱلدُّنۡيَا حَسَنَةٗ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ إِنَّا هُدۡنَآ إِلَيۡكَۚ قَالَ عَذَابِيٓ أُصِيبُ بِهِۦ مَنۡ أَشَآءُۖ وَرَحۡمَتِي وَسِعَتۡ كُلَّ شَيۡءٖۚ فَسَأَكۡتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلَّذِينَ هُم بَِٔايَٰتِنَا يُؤۡمِنُونَ156
ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلرَّسُولَ ٱلنَّبِيَّ ٱلۡأُمِّيَّ ٱلَّذِي يَجِدُونَهُۥ مَكۡتُوبًا عِندَهُمۡ فِي ٱلتَّوۡرَىٰةِ وَٱلۡإِنجِيلِ يَأۡمُرُهُم بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَىٰهُمۡ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ ٱلطَّيِّبَٰتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيۡهِمُ ٱلۡخَبَٰٓئِثَ وَيَضَعُ عَنۡهُمۡ إِصۡرَهُمۡ وَٱلۡأَغۡلَٰلَ ٱلَّتِي كَانَتۡ عَلَيۡهِمۡۚ فَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِهِۦ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَٱتَّبَعُواْ ٱلنُّورَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ مَعَهُۥٓ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ157
قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۖ فََٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِيِّ ٱلۡأُمِّيِّ ٱلَّذِي يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ158
एक और आज़माइश
159मूसा की क़ौम में कुछ ऐसे लोग हैं जो हक़ के साथ हिदायत करते हैं और उसी से इंसाफ़ करते हैं।
160हमने उन्हें बारह क़बीलों में बाँट दिया, हर एक अलग गिरोह के तौर पर।
और जब मूसा की क़ौम ने उनसे पानी माँगा, तो हमने उन्हें वह्यी की: 'अपनी लाठी से पत्थर पर मारो।
' तो बारह चश्मे फूट निकले।
हर क़बीले ने अपना पानी पीने का स्थान जान लिया।
हमने उन पर बादलों का साया किया और उन पर 'मन्न' और 'सलवा' (बटेर) उतारा, यह कहते हुए कि, 'उन पाक चीज़ों में से खाओ जो हमने तुम्हें
दी हैं।
' उन्होंने हम पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि उन्होंने खुद अपने आप पर ज़ुल्म किया।
161और 'याद करो' जब उनसे कहा गया, 'इस शहर में रहो और जहाँ से चाहो खाओ।
और कहो, 'हमारे गुनाह माफ़ कर दे,' और इस दरवाज़े से आजिज़ी के साथ दाख़िल हो।
हम तुम्हारे गुनाह माफ़ कर देंगे और नेकी करने वालों का सवाब बढ़ा देंगे।
'
162लेकिन उनमें से ज़ुल्म करने वालों ने उन बातों को बदल दिया जो उन्हें कहने का हुक्म दिया गया था।
तो हमने उन पर आसमान से अज़ाब भेजा उनके ज़ुल्म के बदले में।
وَمِن قَوۡمِ مُوسَىٰٓ أُمَّةٞ يَهۡدُونَ بِٱلۡحَقِّ وَبِهِۦ يَعۡدِلُونَ159
وَقَطَّعۡنَٰهُمُ ٱثۡنَتَيۡ عَشۡرَةَ أَسۡبَاطًا أُمَمٗاۚ وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ إِذِ ٱسۡتَسۡقَىٰهُ قَوۡمُهُۥٓ أَنِ ٱضۡرِب بِّعَصَاكَ ٱلۡحَجَرَۖ فَٱنۢبَجَسَتۡ مِنۡهُ ٱثۡنَتَا عَشۡرَةَ عَيۡنٗاۖ قَدۡ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٖ مَّشۡرَبَهُمۡۚ وَظَلَّلۡنَا عَلَيۡهِمُ ٱلۡغَمَٰمَ وَأَنزَلۡنَا عَلَيۡهِمُ ٱلۡمَنَّ وَٱلسَّلۡوَىٰۖ كُلُواْ مِن طَيِّبَٰتِ مَا رَزَقۡنَٰكُمۡۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ160
وَإِذۡ قِيلَ لَهُمُ ٱسۡكُنُواْ هَٰذِهِ ٱلۡقَرۡيَةَ وَكُلُواْ مِنۡهَا حَيۡثُ شِئۡتُمۡ وَقُولُواْ حِطَّةٞ وَٱدۡخُلُواْ ٱلۡبَابَ سُجَّدٗا نَّغۡفِرۡ لَكُمۡ خَطِيٓـَٰٔتِكُمۡۚ سَنَزِيدُ ٱلۡمُحۡسِنِينَ161
فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡهُمۡ قَوۡلًا غَيۡرَ ٱلَّذِي قِيلَ لَهُمۡ فَأَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ رِجۡزٗا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُواْ يَظۡلِمُونَ162

पृष्ठभूमि की कहानी
- •
ऐलाह (लाल सागर के किनारे एक प्राचीन शहर) के लोगों को सब्त (शनिवार, विश्राम का दिन) के दिन मछली पकड़ने से मना किया गया था।
हालांकि, शनिवार को मछलियाँ हर जगह होती थीं, जबकि सप्ताह के अन्य दिनों में कोई मछली नहीं दिखती थी।
इस निषेध से बचने के लिए, कुछ ने शुक्रवार को अपने जाल बिछाने और फिर रविवार को अपने जालों में फंसी मछलियों को इकट्ठा करने का फैसला किया।
इस प्रथा का विरोध करने वाले दो समूहों में बंट गए: एक समूह ने अपराधियों को सब्त का सम्मान करने के लिए समझाने की कोशिश की, लेकिन जब
उनकी सलाह को गंभीरता से नहीं लिया गया तो उन्होंने जल्द ही हार मान ली।
दूसरे समूह ने सब्त तोड़ने वालों को सलाह देना जारी रखा।
अंततः, अपराधियों को दंडित किया गया जबकि अन्य दो समूहों को बचा लिया गया।
(इमाम इब्न कसीर)

सब्त का इम्तिहान
163उनसे पूछिए, 'ऐ पैगंबर', उस बस्ती के बारे में जो समुद्र के किनारे थी, जिसके लोग सब्त (शनिवार) के नियम को तोड़ते थे।
जब सब्त के दिन मछलियाँ उनकी सतह पर तैरती हुई आती थीं, लेकिन दूसरे दिनों में नहीं आती थीं।
इस प्रकार हमने उन्हें उनकी अवज्ञा के कारण आज़माया।
164और याद करो जब उनमें से कुछ ईमानवालों ने दूसरों से पूछा, 'तुम उन लोगों को नसीहत क्यों देते हो जिन्हें अल्लाह या तो तबाह करने वाला है
या सख्त अज़ाब देने वाला है?
' उन्होंने जवाब दिया, 'तुम्हारे रब के सामने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए, और शायद वे बाज़ आ जाएँ।
'
165जब उन्होंने सभी चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया, तो हमने उन लोगों को बचा लिया जो बुराई से रोकते थे, और उन ज़ालिमों को उनकी हदें पार करने के
कारण एक भयानक अज़ाब से दंडित किया।
166अंत में, जब उन्होंने अपनी गलती बार-बार दोहराई, तो हमने उनसे कहा, 'धिक्कारे हुए बंदर बन जाओ!
'
وَسَۡٔلۡهُمۡ عَنِ ٱلۡقَرۡيَةِ ٱلَّتِي كَانَتۡ حَاضِرَةَ ٱلۡبَحۡرِ إِذۡ يَعۡدُونَ فِي ٱلسَّبۡتِ إِذۡ تَأۡتِيهِمۡ حِيتَانُهُمۡ يَوۡمَ سَبۡتِهِمۡ شُرَّعٗا وَيَوۡمَ لَا يَسۡبِتُونَ لَا تَأۡتِيهِمۡۚ كَذَٰلِكَ نَبۡلُوهُم بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُونَ163
وَإِذۡ قَالَتۡ أُمَّةٞ مِّنۡهُمۡ لِمَ تَعِظُونَ قَوۡمًا ٱللَّهُ مُهۡلِكُهُمۡ أَوۡ مُعَذِّبُهُمۡ عَذَابٗا شَدِيدٗاۖ قَالُواْ مَعۡذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمۡ وَلَعَلَّهُمۡ يَتَّقُونَ164
فَلَمَّا نَسُواْ مَا ذُكِّرُواْ بِهِۦٓ أَنجَيۡنَا ٱلَّذِينَ يَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلسُّوٓءِ وَأَخَذۡنَا ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ بِعَذَابِۢ بَِٔيسِۢ بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُون165
فَلَمَّا عَتَوۡاْ عَن مَّا نُهُواْ عَنۡهُ قُلۡنَا لَهُمۡ كُونُواْ قِرَدَةً خَٰسِِٔينَ166
हिन्दी बच्चों की अध्ययन मार्गदर्शिका
हिन्दी बच्चों के लिए कुरान अध्ययन: यह पृष्ठ हिन्दी परिवारों को सरल व्याख्या, अरबी आयत, हिन्दी अर्थ, तिलावत और दैनिक अभ्यास के साथ कुरान सीखने में मदद करता
है।
सूरह और आयत के नाम अरबी हो सकते हैं, लेकिन मुख्य सीखने की दिशा, दोहराव, पारिवारिक चर्चा और बच्चों की समझ हिन्दी संदर्भ में दी गई है।
हिन्दी पाठ मार्गदर्शन: हर भाग में अरबी आयत के साथ हिन्दी अर्थ, बच्चों के लिए सरल शिक्षा, छोटे प्रश्न, दोहराव और परिवार में चर्चा का रास्ता दिया गया
है।
यदि किसी क्रॉलर को कई अरबी शब्द दिखें, तो ये हिन्दी अनुच्छेद पृष्ठ की मुख्य भाषा स्पष्ट करते हैं: हिन्दी कुरान अध्ययन, हिन्दी अनुवाद, बच्चों का पाठ, तिलावत
और दैनिक अभ्यास।
Part 2 study note
This is part 2 of the children's lesson for Surah Al-A'râf.
It continues from the previous section with new verses, examples, and short review points for young learners.
If this is your first time studying the lesson, start with part 1 and then return here so the story, meaning, and practice sequence stay clear.
How to study Surah Al-A'râf with children
इस बच्चों के कुरान पाठ को चरणबद्ध तरीके से पढ़ें: पहले सरल व्याख्या पढ़ें, फिर अरबी आयत देखें, ज़रूरत हो तो तिलावत सुनें, और अंत में बच्चे से
मुख्य शिक्षा अपने शब्दों में दोहराने को कहें।
माता-पिता हर बार एक छोटा भाग चुन सकते हैं।
बच्चे से एक आसान प्रश्न पूछें, आयत का अर्थ फिर पढ़ें, और फिर उसी सूरह के पूरे पाठ या पास की दूसरी बच्चों की पाठ सामग्री की ओर
बढ़ें।
हिन्दी अध्ययन संदर्भ में यह पृष्ठ कुरान, सूरह, आयत, सरल व्याख्या, तिलावत, पारिवारिक चर्चा और दैनिक अभ्यास को जोड़ता है।
अरबी पाठ के साथ हिन्दी व्याख्या पढ़ने से बच्चों को अर्थ याद रखने में सहायता मिलती है।